भारत चीन युद्ध (india china war) के दौरान जब 19 नवम्बर, 1962 को बोम्डी-ला की चौकियाँ भी हाथ से निकल गई तो जनरल थापर तेजपुर में थे। वे दिल्ली गए और सीधे नेहरू से मिले। भारतीय सेना की श्रेष्ठतम मर्यादाओं का पालन करते हुए उन्होंने एक हारे हुए जनरल की तरह अपना इस्तीफा सौंपना चाहा। उन्हें बहुत दिनों बाद नेहरू (jawaharlal nehru) के चेहरे पर मुस्कराहट दिखाई दी। नेहरू ने सख्ती से उनका हाथ थामते हुए कहा, “थैंक्यू, लेकिन इसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं है।”

अगली सुबह वे नेहरू फिर मिले तो नेहरू ने कहा, “जनरल, याद है न कल त तुमने मुझसे क्या कहा था? मुझे तुम्हारा इस्तीफा राइटिंग में चाहिए।” थापर ने घर लौटकर अपनी बेटी से अपना इस्तीफा टाइप करवाया और दो घंटों के अन्दर ही इसे नेहरू के पास भेज दिया। मैंने नेहरू को लोकसभा में यह इस्तीफा लहराते देखा। इससे सदस्यों का गुस्ता शान्त करने में थोड़ी मदद मिली, जो नेहरू पर बहुत ज्यादा भड़के हुए थे। उनका बाल था कि थापर के जाने से कृष्ण मेनन संसद का निशाना बनने से बच जाएँगे। कुछ हद तक यही हुआ भी, और जब नेहरू ने उन्हें रक्षा मंत्रालय से रक्षा उत्पादन मंत्रालय में स्थानांतरित कर दिया तो मामला काफी हद तक ठंडा पड़ गया।

थापर अपने बचाव में एक बयान जारी करना चाहते थे। नेहरू ने उन्हें ऐसा करने से मना किया और उन्हें भरोसा दिलाया कि एक दिन उन्हें अपनी बात कहने का मौका जरूर मिलेगा।

थापर काफी समय से अपना हस्तलिखित बयान अपने पास रखे हुए थे, जिसमें उन्होंने बताया था उन्हें किस तरह गलत आश्वासन देकर और बिना तैयारी के उनकी मर्जी के खिलाफ इस लड़ाई में धकेला गया।

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