बच्चे फिर नानी मां को घेरे बैठे हैं और कहानी की हठ कर रहे हैं। नानी मां ने बीच में न टोकने की शर्त लगा दी है और बच्चे चुपचाप बैठे हैं। नानी मां बोलीं, “बच्चो में आज तुमको दीवाली की कहानी सुनाऊंगी, सुनाते तो इसे दीवाली के मौके पर हैं पर तुम सोच लो आज ही दिवाली है।”

“सोच लिया”। बच्चे चिल्लाए और नानी मां ने कहानी शुरू कर दी। बच्चो, एक था राजा बड़ा सुंदर और बलवान उसका महल बड़ा सुंदर था। उसकी बहुत-सी रानियां थीं। सब रानियां बड़ी सुंदर थीं मगर उसकी पटरानी तो बहुत ही सुंदर थी और राजा उसे बहुत चाहता था। एक दिन उसने राजा से उपहार में नौलखा हार मांग लिया। राजा रानी की कोई बात नहीं टालता था, उसके पास धन की कमी तो थी नहीं। उसने शहर के सबसे मशहूर जौहरी को बुलाकर ऐसा नौलखा हार बनाने का हुक्म दिया जो उससे पहले कभी न बना हो।

जौहरी ने हीरों और जवाहिरात से जड़ा हुआ एक अनोखा और दुर्लभ नौलखा हार तैयार किया और राजा ने उससे खुश होकर न केवल उसे हार की क़ीमत दी, बल्कि एक बड़ी रकम इनाम के तौर पर भी दी। फिर राजा ने अपनी पटरानी को यह हार दिया। पटरानी की ख़ुशी का कोई पारावार न रहा।

पटरानी उस हार को हर समय पहने रहती और सोते हुए भी गले से न उतारती, हां सिर्फ नहाने के वक्त वह उसे उतारकर पास ही रख लेती। मगर नहाने के बाद उसे फ़ौरन पहन लेती। एक रोज वह महल के अंदर अपने तालाब में नहा रही थी तो तालाब के किनारे पर कोई मोर उतर आया जिसका रानी को पता नहीं लगा। वह मोर रानी के कपड़ों के पास पहुंचा गया और उसने अपनी चोंच में रानी का नौलखा हार उठा लिया और उड़ गया। मोर महल से बाहर निकल गया। रानी जब नहाकर निकली तो यह देखकर हैरान और परेशान रह गई कि उसका प्यारा हार गायब है। उसी वक़्त महल में शोर मच गया। सारे महल में हार ढूंढा गया, मगर बेकार।

शहर से बाहर एक गरीब बुढ़िया रहती थी, जिसके आगे-पीछे कोई नहीं था। उसने एक झोंपड़ा बना रखा था, जिसमें वह रहती थी। वह मांगकर गुजारा करती थी और जिस दिन उसे भीख नहीं मिलती थी वह भूखी ही सो जाती। उसके झोंपड़े की छत पर दुनिया भर का कूड़ा-कबाड़ पड़ा रहता था। उसी कबाड़ में जाने कब से एक मरा हुआ सांप भी पड़ा था। मोर हार को चोंच में दबाए उड़ता-उड़ता उधर आ पहुंचा और बुढ़िया की छत पर साँप देखा तो नौलखा हार बुढ़िया के झोंपड़े की छत पर कूड़े में डाल दिया और सांप को चोंच में पकड़कर उड़ गया।

उधर रानी का रो-रोकर बुरा हाल हो गया। राजा ने उसी तरह का दूसरा हार फ़ौरन बनवाने का वादा किया, मगर रानी को तो सिर्फ वही हार चाहिए था। राजा ने आखिरकार सारे शहर और आसपास के इलाकों में डोडी पिटवा दी कि जो कोई रानी का हार ढूंढकर लाएगा उसे मुँह माँगा इनाम मिलेगा। यह दिटोरा ग़रीब बुढ़िया ने भी सुना और उसने सोचा कि वह भी क्यों न हार की तलाश करे, शायद उसकी क़िस्मत फिर जाए। उसने उसी समय तलाश शुरू कर दी। बाद में उसे अपने झोंपड़े की छत पर पड़े कूड़े का ख़याल आया कि उसे भी देख लूँ। वह किसी तरह से ऊपर चढ़ी और उसने लकड़ी से ऊपर पड़े हुए कूड़े को खूब इधर-उधर किया तो नौलखा हार उसे मिला गया।

उसने किसी को नहीं बताया और हार को एक पोटली में बाँधकर राजा के महल की तरफ चल दी। उसने दरवानों से कहा कि वे राजा को ख़बर दें कि एक बुढ़िया आई है और वह नौलखा हार के बारे में राजा को बताएगी कि वह कहाँ है। राजा ने फौरन उसे महल में बुलवाया और जब बुढ़िया ने उसे पोटली में से निकालकर हार दिया तो राजा की ख़ुशी का ठिकाना न रहा। उसने फौरन अपनी पटरानी को बुलाया और हार उसे थमा दिया। राजा ने बुढ़िया से कहा, जो माँगना है माँग ले-धन, आलीशान मकान, हीरे-जवाहरात, जो चाहोगी मिलेगा। बुढ़िया हाथ जोड़कर बोली कि राजन, मैं सिर्फ़ यह चाहती हूँ कि आप यह मुनादी करा दें कि परसों दीवाली के दिन सब लोग रात को अंधेरा रखें और कोई दीया न जलाए। सारे शहर की रुई और तेल मेरे घर में आ जाए और मेरे ही घर उजाला हो। राजा इस माँग पर बड़ा हैरान हुआ, मगर उसने अपने ऐलान के अनुसार बुढ़िया की बात मानकर यह आज्ञा दे दी कि दीवाली के दिन बुढ़िया के सिवा और कोई रोशनी नहीं करेगा।

दिवाली आई मगर राजा की आज्ञा के अनुसार सारे नगर में किसी के घर में रोशनी नहीं हुई, सिर्फ़ बुढ़िया के झोंपड़े में रोशनी थी। चूँकि दिवाली वाले दिन लक्ष्मीजी सिर्फ़ बुढ़िया के घर पहुंचीं और उसका दरवाजा खटखटाया। बुढ़िया समझ गई कि लक्ष्मीजी आई हैं। उसने पूछा, ‘लक्ष्मीजी, बेटी बनकर आई हो या बहू?” लक्ष्मी जी समझ गई कि बुढ़िया ने दरवाजा खोल दिया। लक्ष्मीजी को देखते ही बुढ़िया के घर में मुद्दतों से बैठे दलिद्दर भाग गए।

‘हां बच्चो,’ नानी मां बोली, “जब घर में लक्ष्मीजी का वास हो गया और दलिद्दर भाग गया तो बुढ़िया अमीर हो गई।”

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