पहेलियां बूझना और बुझवाना दिल्ली वालों का पुराना और बहुत प्रिय शौक था। पहेलियों में बच्चे भी दिलचस्पी लेते थे। आसान पहेलियां बुद्धिमान बालक तुरंत बूझ लेते थे। पहेलियां मानव समाज और रोजमर्रा की ज़िन्दगी में कब दाखिल हुई यह निश्चय के साथ कहना कठिन है। हां विद्वानों में अधिकांश इस बात पर एकमत हैं। कि पहेली और मुहावरे बहुत प्राचीन हैं और कमोबेश एक साथ ही इस्तेमाल में आए। पहेली बौद्धिक विकास का भी साधन थी और बुद्धि को प्रखरता प्रदान करती थी। नए दौर में पहेली का रिवाज भी समाप्त होता जा रहा है। कुछ पहेलिया देखिए-

चढ़ चौकी पर बैठी रानी, सिर पर आग बदन पर पानी

बार-बार सिर काटें जाका, है कोई पता बतावे वाका (बत्ती)

सुख कारन बना इक मंदर, पवन न जाये वाके अंदर

इस मंदर की रीत दिवानी, बिछावैं आग और ओढ़ें पानी (हम्माम)

नर से पैदा होवे नार, हर कोई रक्खे उससे प्यार

एक जमाना उसको खावे, खुसरो पेट में वह ना जावे (धूप)

नारी काट के नर किया सबसे रहे अकेला

चलो सखी री वां चल देखें नर नारी का मेला (कूआं)

मीठी मीठी बात बनावे ऐसा पुरुख वह किसको भावे

बूढ़ा वाला जो कोई आए उसके आगे सीस नवाए (नाई)

इक नारी के दो बालक दोनों एक ही रंग

इक फिरे इक ठारा है फिर भी दोनों संग (चक्की)

ये कुछ नए ढंग की पहेलियां भी देखिए-

माली जी का बाग़ लगा कोई तोड़ता नहीं (तारे)

सीतल पाटी बिछी कोई सोता नहीं (समुद्र)

जरा मौसमों पर बनी पहेलियां भी देखिए

गरमी से वह पैदा होवे धूप लगी लहराय

ऐ सखि वह इतना कोमल पवन लगी मुरझाय (पसीना)

इक कन्या ने बालक जाया वा बालक ने जगत सताया

मारा मरे न काटा जाय वा चालक को नार ही खाय (जाड़ा)

इन पहेलियों में उनके हल की ओर स्पष्ट इशारा है-

दर में, दीवार में गोशों में पली है

नाम उसका जो पूछो पोशीदा कली है (छिपकली)

एक अजब मैं देखी नार, अच्छे मुंह सब उसके यार

सर उसका सब कलम करें, काला मुंह कर आगे धरें (कलम)

राजा करन के बाग़ में देखे ऐसे फूल

काटों में लगते रहें कहीं न कोई बबूल (करनफूल)

अमीर खुसरो की ये दो पहेलियां भी उनकी ही विशिष्ट शैली में हैं-

चंद्रबदन, जख्मी तन, पांव बिना वह चलता है

अमीर खुसरो यां कहें वह होले होले चलता है (रुपया)

इधर चिलमन उधर चिलमन बीच कलेजा धड़के

अमीर खुसरो यों कहें वह दो-दो जंगल सरके (कैची)

पहेलियों की तादाद अनगिनत है। केवल कुछ विशेष पहेलियां यह बात उजागर करने के लिए दी गई हैं कि असल चीज़ या व्यक्ति को गुप्त रखने का जो कलात्मक प्रयास पहेली बनाने वाला करता है, वह वास्तव में प्रशंसनीय है। पहेली की रचना में काफ़ी बुद्धिमानी निहित होती है। पहेली को सुनते ही अगर पहेली का उत्तर सूझ गया तो वह पहेली या तो घिसी-पिटी होगी या फिर असल बात को गुप्त रखने में होशियारी नहीं दिखाई गई है। पहेली बनाने के लिए सिर्फ यही जरूरी नहीं है कि वह असल चीज या व्यक्ति को गोपनीय रखे बल्कि उस गुत्थी को सुलझाने के लिए उचित संकेत भी पहेली में समो दे। देखिए यह कितनी सुंदर और सरल पहेली है-

डाल दीजिए, देखा कीजिए—-(चिक)

इस पहेली में चित्रकारिता देखिए-

बाल नोचे, कपड़े फाड़े और मोती लिए उतार

यह बिपता कैसे बनी जो नंगी कर दे नार——(भुट्टा)

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