मुस्लिम शासकों की बारहवीं दिल्ली (मौजूदा दिल्ली शाहजहांबाद)

लाल किले की तामीर के दस बरस बाद 1648 ई. में शाहजहांबाद शहर की बुनियाद पड़ी, जो अपने पुराने नाम दिल्ली से ही मशहूर है। यह उत्तर में 28 डिग्री, 38 डिग्री भूमध्य रेखा पर पूर्व में 77 डिग्री, 113 डिग्री रेखा पर स्थित है, जो कन्याकुमारी के करीब-करीब उत्तर में और काहिरा (मिस्र) तथा कॅटन दो प्राचीन शहरों की समरेखा पर पड़ता है। यह पंजाब प्रदेश के दक्षिण-पूर्व में यमुना नदी तथा अरावली की पहाड़ियों के बीच के भाग में आबाद है। आबादी की शक्ल अर्द्धगोलाकार है।

पोलियार ने इसे कमान की शक्ल का बताया है, जिसकी तांत का सिरा यमुना है। पूर्व का करीब करीब आधा भाग किले को समझना चाहिए। इसकी चारदीवारी का घेरा करीब साढ़े पांच मोल है। वान आलिंक ने दिल्ली को भारतवर्ष का रोम कहा और शहर की मस्जिदों, महलों, मंडवों, भवनों, बागों और बादशाहों तथा उनकी बेगमात की तथा मकबरों की बड़ी प्रशंसा की है।

फ्रैंकलिन लिखता है कि शहर और इसकी इमारतों तथा खंडहरात का बेहतरीन दृश्य पहाड़ो पर से होता है, जो शहर से तीन मील पर है। कहा जाता है, शहर सात बरस में बनकर तैयार हुआ था। बर्नियर, जिसने इस शहर को 1663 ई. में देखा था, लिखता है ‘कोई चालीस वर्ष पहले औरंगजेब के पिता शाहजहां ने इस शहर को बनाने का इरादा किया। इसलिए उसे बनाने बाले के नाम पर यह शाहजहांबाद या जहांबाद कहलाने लगा। शाहजहां ने आगरा की गर्मी से तंग आकर इस शहर को बसाने का इरादा किया। दिल्ली बिल्कुल एक नया शहर है, जो यमुना के किनारे आबाद है और हमारे शहर लायर के जोड़ का है। दरिया पर जाने के लिए किश्तियों का एक पुल है। शहर के एक तरफ तो दरिया रक्षक है, बाकी तीन ओर पत्थरों की फसील है। लेकिन शहर का घेरा पूरा नहीं है; क्योंकि न तो खाई है, न शहर की रक्षा के लिए और कोई प्रबंध किया गया है।

अलबत्ता सौ-सौ कदम के अंतर पर पुराने ढंग का एक-एक बुर्ज और एक-एक मिट्टी का घुस फसील के पीछे एक चबूतरे की शक्ल का बना हुआ है। फसील की चौड़ाई चार या पांच फ्रांसीसी फुट है। यह फसील न केवल शहर के चारों ओर है, बल्कि किले के गिर्द भी है। इस शहर के आसपास तीन-चार छोटी-छोटी बस्तियां भी हैं। अगर इस सबको मिला लिया जाए तो शहर का फैलाव बहुत बढ़ जाएगा। ‘

1803 ई. में जब जनरल लेक ने दिल्ली पर कब्जा कर लिया तो कर्नल डेविड आक्टर लोनी ने मराठों से रक्षा करने के लिए सारी फसील की मरम्मत करवाई और सब काम पुख्ता करवा दिया। मोचाँ को बढ़ाकर ऐसा कर दिया कि उन पर नौ-नौ तोपें चढ़ सकें। 1811 ई. में बुर्जों और फसील की मरम्मत फिर की गई और बड़ी-बड़ी घूंघट की दीवारें तोड़कर छोटे-छोटे मोर्चे बना दिए गए और चारों ओर खाई खोद दी गई। गाजीउद्दीन खां का मकबरा और मदरसा, जो चारदीवारी के बाहर अर्थात अजमेरी दरवाजे के बाहर था, उसको भी अंदर लेकर घेरे को पूरा कर दिया गया। कहा जाता है कि पुरानी फसील 1650 ई. में डेढ़ लाख रुपये से बनी थी। इसमें केवल बंदूकें छोड़ने की मोरियां बनाई गई थीं।

यह फसील चार वर्ष में तैयार हुई थी, लेकिन बरसात में यह गिर पड़ी और फिर सात साल में चार लाख की लागत से बनाई गई। यह फसील 1664 गज लंबी, 9 गज ऊंची और 4 गज चौड़ी थी, जिसमें तीस-तीस फुट व्यास के सत्ताइस बुर्ज, चौदह दरवाजे और चौदह खिड़कियां थीं। फ्रेंकलिन लिखता है कि उत्तर और पश्चिम की ओर शालीमार बाग से, दक्षिण और पूर्व में कुतुब मीनार से और अजमेरी दरवाजे से लेकर कुतुब तक बीस मील का घेरा था।

इसकी बाबत विशप हेवर ने लिखा है- ‘यह स्थान बरबादी और तबाही का भयानक दृश्य है; जहां तक नजर दौड़ती है, खंडहर ही खंडहर, मकबरे ही मकबरे, टूटी-फूटी इमारतें, खारे के पत्थरों के ढेर, संगमरमर के टुकड़े इस भूमि पर, जो पथरिया और चटियल मैदान हैं, बिखरे पड़े हैं। यदि हम

(1) कश्मीरी दरवाजे से चलें, जो शहर के उत्तर में है, तो नीचे बताए रास्ते से शहर का चक्कर लगा सकते हैं-

(2) मोरी दरवाजा उत्तर में जो 1867 ई. में ढहाकर मैदान बना दिया गया, (3) काबुली दरवाजा पश्चिम में यह भी तोड़ दिया गया, (4) लाहौरी दरवाजा- यह भी टूट गया, (5) अजमेरी दरवाजा- दक्षिण-पश्चिम में, (6) तुर्कमान दरवाजा- दक्षिण में, (7) दिल्ली दरवाजा- दक्षिण में, (8) खैराती दरवाजा (मस्जिद घटा)- पूर्व में, (9) राजघाट दरवाजा- पूर्व में दरिया की ओर, (10) कलकत्ती दरवाजा उत्तर-पूर्व में था, जहां से एक रास्ता 1852 में निकाला गया था। अब दो छोटे-छोटे दरवाजे रेल के नीचे बने हुए हैं, जिन पर इसका नाम लिखा है, (11) केला घाट दरवाजा- उत्तर-पश्चिम में दरिया की ओर (12) निगमबोध दरवाजा- उत्तर-पूर्व में दरिया की ओर, (13) पत्थर घाटी दरवाजा तोड़ दिया गया, और (14) बदर रौ दरवाजा- उत्तर-पूर्व में।

इन दरवाजों के अतिरिक्त निम्न 14 खिड़कियां थीं-

(1) खिड़की जीनत उल-मस्जिद- इस नाम की मस्जिद के नीचे (मस्जिद घटा), (2) खिड़की नवाब अहमद बख्श खां, (3) खिड़की नवाब गाजीउद्दीन खां, (4) खिड़की नसीरगंज, (5) नई खिड़की, (6) खिड़की शाहगंज, (7) खिड़की अजमेरी दरवाजा, (8) खिड़की सैयद भोला, (9) खिड़की बुलंद बाग, (10) खिड़की फराशखाना, (11) खिड़की अमीर खां, (12) खिड़की खलील खां, (13) खिड़की बहादुर अली खां, और (14) खिड़की निगमबोध |

दिल्ली शहर भोजला और झोझला नाम की दो पहाड़ियों पर बसाया गया है। भोजला पहाड़ी शहर के बीच में है, झोझला उत्तरी-पश्चिमी चारदीवारी से मिली हुई है। शहर जिस भू-भाग पर बसा हुआ है, उसका थोड़ा-सा ढलाव पश्चिम से पूर्व की ओर है, अर्थात पहाड़ी से यमुना की ओर। अली मरदान की नहर काबुली दरवाजे से शहर में दाखिल होकर शहर और किले- दोनों में दौड़ती थी और फिर दरिया में जा मिलती थी। किले की फसील से मिले हुए बहुत-से बागात थे, मगर जब बर्नियर आया था तो एक ही बाकी बचा था, जिसकी बाबत उसने लिखा है- ‘यह बाग बारह महीने हरे-भरे पौधों और फलों से सरसब्ज और भरा रहता था, जो किले की फसील के साथ एक खास लुत्फ दिखाता था।’

सादुल्ला खां वजीर आजम शाहजहां का बनाया हुआ ‘चौकी शाही’ भी था, जिसका जिक्र बर्नियर ने यों किया है- ‘बाग से मिला हुआ चौक शाही है, जिसका एक रुख किले के दरवाजे की तरफ है और दूसरा सिरा दो बड़े बाजारों की तरफ खत्म होता है। इसी चौक के अहाते में उन उमराओं के खेमे लगे रहते हैं, जिनकी नशिस्त की बारी हर सप्ताह आती है। इसी मैदान में बहुत सुबह वे लोग शाही घोड़ों को टहलाते हैं और यहीं सवारों का बड़ा अफसर उन घोड़ों का मुआयना करता है, जो फौज में भरती किए जाते हैं। यहां एक बहुत बड़ा बाजार है, जिसमें हर प्रकार की वस्तुएं मिलती हैं, जैसे पेरिस में ‘पोट नाउफ’ में। यहां तमाशाई और सैलानी जमा रहते हैं। हिंदू और मुसलमान ज्योतिषी और नजूमी भी जमा होते हैं। ‘

अब इस चौक का कहीं पता भी नहीं है। किले के गिर्द दूर-दूर तक सारा मैदान साफ कर दिया गया है। लोग कहते हैं कि किले के लाहौरी दरवाजे के दोनों ओर, अर्थात उत्तर और दक्षिण में यह बाजार था। शहर के दो बड़े बाजार, जो शाही चौक पर आकर खत्म होते थे, उनके बारे में बर्नियर लिखता है- ‘जहां तक निगाह दौड़ती है, बाजार ही बाजार नजर आता है, लेकिन वह बाजार, जो लाहौरी दरवाजे की तरफ है (अर्थात चांदनी चौक), वह इनसे भी बहुत बड़ा है। दूसरा बाजार शहर के दिल्ली दरवाजे से लेकर शाही चौक तक है (अर्थात फैज बाजार)। बनवाट के लिहाज से दोनों बाजार एक ही प्रकार के हैं। सड़क के दोनों ओर ईंट और चूने की पक्की दुकानें बनी हुई हैं, जिनके बालाखाने (कमरे) बैठने का काम देते हैं। इन बाजारों में दुकानों के अतिरिक्त और कोई इमारत नहीं है। ये सब दुकानें अलहदा-अलहदा हैं।

बीच में पार्टीशन लगे हुए हैं। बीच में रास्ता नहीं है। दुकानों में दिन के वक्त कारीगर लोग अपना-अपना काम करते हैं, साहूकार लेन-देन व कारोबार करते हैं। ताजिर अपना माल असबाब, बरतन, इत्यादि दिखलाते हैं। इन दुकानों और कारखानों के पिछवाड़े सौदागरों के रहने के घर हैं, जिनमें सुंदर गलियां बन गई हैं। ये मकान आवश्यकतानुसार अच्छे-खासे बड़े हवादार और आराम देने वाले मालूम होते हैं, जो सड़क की धूल से दूर हैं। इन मकानों में से दुकानों की छतों पर जाने का रास्ता है, जहां लोग रात को सोते हैं, लेकिन सारे बाजार में इस प्रकार के मकानों का सिलसिला नहीं है। बाजारों के अतिरिक्त शहर के दूसरे हिस्सों में दोमंजिला मकान बहुत कम हैं। (मैगजीनों के मकान नीचे इसलिए बनाए गए हैं, ताकि सड़क पर से पूरी तरह दिखाई न दे सकेँ) । ‘

सादुल्लाह खां के नाम का भी एक चौक था। वह भी अब नहीं रहा। लेकिन मालूम हो सकता है कि उसके एक तरफ तो किले का दिल्ली दरवाजा और फौजी बाग था और दूसरी तरफ सुनहरी मस्जिद और पुराना कब्रिस्तान, जहां अब मेमोरियल क्रास है। इस चौक के दक्षिण की ओर दो और बाजार आकर मिलते थे। फैज बाजार उत्तर की ओर शहर के दिल्ली दरवाजे से किले के दिल्ली दरवाजे तक था और खास बाजार जामा मस्जिद और किले के दरवाजे के बीच में था। अलबत्ता बीच में कुछ थोड़ा-सा भाग छूटा हुआ था।

बर्नियर ने जिन दो बाजारों का जिक्र किया है, उनमें से एक बड़ा बाजार, अर्थात चांदनी चौक तो शहर के लाहौरी दरवाजे से किले के लाहौरी दरवाजे तक था और दूसरा शहर के दिल्ली दरवाजे से किले के लाहौरी दरवाजे तक था। इन दोनों बाजारों के भिन्न-भिन्न भाग भिन्न-भिन्न नामों से पुकारे जाते थे। वह भाग, जो किले के लाहौरी दरवाजे और दरीबे के खूनी दरवाजे के बीच में है, उर्दू बाजार कहलाता था। इस नाम का कारण यह प्रतीत होता है कि किसी जमाने में शहर के इस भाग में लश्करी लोग रहते थे। खूनी दरवाजे और कोतवाली के बीच के भाग को फूल की मंडी कहते थे। इस जगह उस जमाने में एक चौक बना हुआ था।

कोतवाली और तिराहे के बीच में चौपड़ का बाजार था। तिराहे और उसके नजदीक अशरफी का कटरा वास्तव में चांदनी चौक का सबसे पुररौनक भाग था। चांदनी चौक में घंटाघर वाली जगह एक हौज था। उससे आगे फतहपुरी की मस्जिद तक फतहपुरी बाजार कहलाता था। चांदनी चौक के बाजार के तमाम मकान ऊंचाई में यकसां थे और दुकानों में महराबदार दरवाजे और रंगीन सायबान थे। उत्तरी दरवाजे से रास्ता जहांआरा बेगम की सराय (मौजूदा कंपनी बाग) को जाता था और दक्षिणी दरवाजे से एक रास्ता शहर के एक बहुत आबाद और गुंजान हिस्से को जाता था, जो अब नई सड़क कहलाता है।

 हौज के चारों ओर बहुतायत से फल-फलारी, तरकारियां और मिठाई की दुकानें थीं। धीरे-धीरे यह बाजार अपने हिस्सों के साथ चांदनी चौक कहलाने लगा। चांदनी चौक बाजार शाहजहां की लड़की जहांआरा बेगम ने 1600 ई. में बनवाया था और उसके कई बरस बाद उसने एक बाग़ और सराय भी बनवाई थी। किले के लाहौरी दरवाजे से लेकर चांदनी चौक के आखिर तक यह बाजार 1520 गज लंबा और चालीस गज चौड़ा था, जिसके बीचोंबीच अलीमर्दा की नहर बहती थी। उसके दोनों ओर सरसब्ज सायेदार वृक्ष लगे हुए थे। अब न नहर रही, न वृक्ष (वृक्षों को 1912 ई. में डिप्टी कमिश्नर बीडन ने कटवा दिया)। चांदनी चौक के पूर्वी सिरे पर किले का लाहौरी दरवाजा था और दूसरे सिरे पर फतहपुरी बेगम की मस्जिद ।

बर्नियर ने जिस दूसरे बाजार का जिक्र किया है, वह किले के लाहौरी दरवाजे से लेकर शहर के दिल्ली दरवाजे तक था। लाहौरी दरवाजे से चौक सादुल्लाह खां तक इस बाजार का हिस्सा बिल्कुल मामूली था। बाकी हिस्सा जो उत्तरी हद पर था, उसका जिक्र चौक के साथ आएगा।

एक और दूसरा बड़ा बाजार वह था, जो किले के लाहौरी दरवाजे से उन इमारतों तक चला गया था, जिनमें से एक इमारत को जनरल लेक ने दिल्ली फतह करने के बाद रेजीडेंसी बना लिया था। यह बाजार आधा मील लंबा और तीस फुट चौड़ा था तथा इसके एक सिरे से दूसरे सिरे तक सायेदार वृक्ष दोनों ओर ऐसे लगे हुए थे कि एक सुंदर एवेन्यू बन गया था। खास बाजार का अब कोई हिस्सा बाकी नहीं रहा। 1857 के गदर के बाद जब किले के गिर्द जमीन को इमारतों से साफ किया गया तो चांदनी चौक तथा खास बाजार भी उसकी भेंट चढ़ गए। एक वह जमाना था कि इन दोनों बाजारों में सुबह से रात तक कंधे से कंधा छिलता था और दुकानें माल से खचाखच भरी रहती थीं, जिनमें हर किस्म का बहुमूल्य सामान रहता था।

त्योहारों के दिन जामा मस्जिद जब बादशाह की सवारी जाती थी तो इसी बाजार में से गुजरती थी। अब भी फैज बाजार का दो-तिहाई भाग बाकी है। बाजार के दोनों ओर दुकानें थी और बीच में से नहर बहती थी (अब नहीं रही)। जगह-जगह बड़ी-बड़ी इमारतों, महलों और मस्जिदों के खंडहर नजर आते थे। यह बाजार शाहजहां की बेगम अकबराबादी बेगम का बसाया हुआ था, जिसके नाम की एक मस्जिद भी यहां मौजूद थी। यह बाजार ग्यारह सौ गज लंबा और 30 गज चौड़ा था। यह और उर्दू बाजार साथ-ही-साथ और चांदनी चौक बाजार से पहले बने थे। इनमें जो नहर बहती थी, वह चार फुट चौड़ी और पांच फुट गहरी शाहजहां की बनवाई हुई थी। दिल्ली के बाजारों में फैज बाजार को यह गर्व प्राप्त था कि यहां की दुकानों में इराक, खुरासान और दूसरे बंदरगाहों के बेशुमार माल के अतिरिक्त यूरोप की चीजें भी बहुतायत के साथ मिलती थीं।

बर्नियर लिखता है- ‘इस शहर में बेशुमार बाजार और पेच-दर-पेच गलियां हैं। बाजारों की दुकानें समय-समय पर भिन्न-भिन्न व्यक्तियों द्वारा बनाई गई हैं। इसलिए सब यकसां नहीं हैं। फिर भी कई दुकानें बहुत बड़ी हैं, जिनकी सीधी कतार दूर तक चली गई है। शहर के छत्तीस मोहल्ले हैं, जिनमें से अधिकांश के नाम खास खास शहरियों के नामों पर रखे गए हैं।’ बर्नियर लिखता है- ‘इन मोहल्लों में जगह-जगह न्यायाधीश, अदालतों के कर्मचारी, मालदार व्यापारी और दूसरे लोगों के मकान फैले पड़े हैं।’

यहां के एक नमूने के मकान के बारे में बर्नियर लिखता है- ‘ऐसे मकान के सहन में हमेशा बाग, वृक्ष, हौज, फव्वारे व बड़ा सदर दरवाजा और सुंदर तहखाने होते हैं, जिनमें बड़े-बड़े फर्राशी पंखे लगे रहते हैं। सबसे बेहतर मकान वह समझा जाता है, जो शहर के बीच में हो, जिसमें एक बड़ा फूल बाग और चार बड़े-बड़े आदमकद ऊंचे चबूतरे भी हों और चारों तरफ से ऐसी हवा भी आती हो कि ठंडक रहे। हर अच्छे मकान में रात को सोने के लिए छतें बनी होती हैं और कोठों पर भी दालान होते हैं, ताकि बारिश के वक्त उनमें चले जाएं। उम्दा मकानों में आम तौर पर दरियों का फर्श होता है। दीवारों में बड़े-बड़े ताक बने होते हैं, जिनमें चीनी के फूलदान गमले लगे होते हैं। छतों में या तो मुलम्मा किया होता है या वे रंगीन होती हैं, लेकिन मकानों में कहीं जानवर की या इंसान की तसवीर नहीं होती, क्योंकि यह मुस्लिम धर्म के विरुद्ध है।

यों तो शहर में बड़े-बड़े रईसों और अमीरों के बेशुमार महल थे, मगर सबसे अधिक विख्यात कमरुद्दीन खां, अली मर्दान, गाजीउद्दीन खां, सआदत खां और सफदरजंग के महल थे। कर्नल पालीर 1793 ई. में कुछ अर्सा शाही मुलाजिम रहा। वह भी किसी एक महल में रहता था। उसकी बाबत उसने लिखा है- ‘यद्यपि यह महल खस्ता और तबाह हालत में है, लेकिन अब भी इसके बनाने वाले की शान का पता चलता है। इसकी ऊंची चारदीवारी के अंदर बहुत सारी जमीन घिरी हुई है और मकान के सहन में बड़े-बड़े ऊंचे और शानदार दरवाजे हैं। इस महल में नौकरों शागिर्द पेशा, मेहमानों और मुलाकातियों के रहने के लिए अलग-अलग हिस्से हैं। घोड़ों और हाथियों के अस्तबल जुदा-जुदा हैं। दीवानखाना और महल जनाना मकान के ये दो बड़े हिस्से हैं, जिनके बीच में आने-जाने का रास्ता है। हर मकान में हमाम और तहखाने का होना जरूरी है।’ बर्नियर लिखता है कि इन महलात के साथ-साथ कच्चे और छप्पर के बेशुमार छोटे-छोटे मकान भी होते थे, जिनमें गरीब लोग, छोटे दरजे के मुलाजिम, सिपाही, साईस वगैरा रहते थे, जिनकी संख्या का कुछ ठिकाना न था। छप्परों के कारण शहर में अक्सर आग लग जाया करती थी। इन्हीं कच्चे और फूस के घरों से दिल्ली की बस्ती चंद गांवों का संग्रह था या एक छावनी प्रतीत होती थी, जिसमें जगह-जगह पर बड़ी-बड़ी इमारतें भी खड़ी थीं।

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