शाहजहां की बनाई हुई दीगर इमारतों में दिल्ली की जामा मस्जिद सारे हिंदुस्तान की मस्जिदों में सबसे बड़ी और सबसे सुंदर है। शाहजहां ने इसे 1648 ई. में बनवाया था, लेकिन हिसाब से इसकी बुनियाद 1650 ई. में डाली गई। जनरल कनिंघम के अनुसार दिल्ली शहर की इमारतों में जामा मस्जिद और जीनत-उल-मस्जिद- यही दो इमारतें बढ़-चढ़कर हैं।

जामा मस्जिद लाल किले से कोई हजार गज के अंतर पर भोजला पहाड़ी पर खास बाजार के पश्चिमी सिरे पर बनी हुई है। मस्जिद लाल पत्थर के एक चबूतरे पर बनी हुई है, जो सतह जमीन से कोई तीस फुट ऊंचा और चौदह सौ मुरब्बा गज है। इसकी तामीर बादशाह के वजीर सादुल्लाह खां और फजल खां की देखरेख में हुई थी। कहा जाता है कि छह हजार राज, बेलदार, मजदूर और संगतराश छह बरस तक लगातार इसकी तामीर में जुटे रहे और बनाने में दस लाख रुपये खर्च हुए। इसमें पत्थर की कीमत शामिल नहीं है, क्योंकि हर किस्म का पत्थर राजाओं और नवाबों ने बादशाह को नजर किया था।

मस्जिद जब बनकर तैयार हुई तो ईद-उल-फितर करीब थी। मीर इमारत को शाही हुक्म पहुंचा कि हुजूर ईद की नमाज मस्जिद में पढ़ेंगे। हजारों मन मलबा पड़ा हुआ था। जगह-जगह पाड़ें बंधी हुई थीं। इतनी जल्दी सफाई होना मुमकिन न था। तुरंत हुक्म हुआ कि जिसके हाथ जो चीज लगे, उठा ले जाए। फिर क्या था, जरा-सी देर में मस्जिद साफ हो गई। तिनका तक बाकी न रहा। उसी वक्त झाड़-पोंछकर फर्श कर दिया गया और सजावट हो गई। बादशाह को सूचना दी गई कि मस्जिद आरास्ता है। सुबह ईद की नमाज का वक्त हुआ। शादियाने बजने लगे। बादशाह की सवारी निकली। किले के दरवाजे से मस्जिद के पूर्वी दरवाजे तक सवारों की कतार खड़ी थी। आगे-आगे नकीब और चोबदार, पीछे-पीछे शाहजादे निहायत शान के साथ मस्जिद में दाखिल हुए। चारों ओर से लोगों की भीड़ लग गई। मस्जिद भर गई। नमाज अदा हुई और जमात होने लगी। इमाम, अजान देने वाला, फरश करने वाला सब बादशाह की तरफ से मुकर्रर हो गए।

मस्जिद के तीन आलीशान दरवाजे पूर्व, दक्षिण तथा उत्तर में हैं और तीनों तरफ बड़ी लंबी और चौड़ी-चौड़ी सीढ़ियां हैं। उत्तरी दरवाजे की ओर 39 सीढ़ियां हैं। कुछ समय पहले तक इन सीढ़ियों पर नानबाई और कबाबी बैठा करते थे; तमाशे वालों और कथाकारों का जमघट लगा रहता था, जिनकी कहानियां सुनने को लोगों की टोलियां जमा रहती थीं। दक्षिणी दरवाजे की ओर 33 सीढ़ियां हैं, जहां कपड़ा बेचने वाले अपना फर्श बिछाकर बैठा करते थे।

इस ओर एक बड़ा मदरसा और एक बड़ा बाजार था, जो गदर के बाद गिरा दिया गया। मस्जिद का पूर्वी दरवाजा बादशाह के आने-जाने के लिए मखसूस था। उसकी 35 सीढ़ियां हैं। यहां शाम के वक्त मुर्गियां, कबूतर आदि बिका करते थे। यह गूजरी का बाजार कहलाता था। अब भी यहां शाम के वक्त खासी भीड़ रहती है। मस्जिद के तीनों तरफ काफी संख्या में दुकानें बनी हुई हैं, जिनमें पारचा फरोश, कबाड़ी, कबाब तथा दीगर सौदा बेचने वाले बैठते हैं।

चबूतरे के पश्चिम में मस्जिद की असल इमारत है, जिसके बाकी के तीनों भागों में खुले दालान बने हुए हैं और इन्हीं में हर तरफ एक-एक दरवाजा है, जिनमें से लोग आते-जाते हैं। इस मस्जिद का नक्शा अरब और कुस्तुनतुनिया की मस्जिदों की तर्ज का है। इसकी लंबाई करीब 261 फुट और चौड़ाई 90 फुट है। मस्जिद के तीन कमरखनुमा गुबंद हैं, जिन पर एक-एक पट्टी संगमूसा की और एक-एक संगमरमर की पड़ी हुई है और ऊपर सुनहरी कलस हैं। यह गुंबद लंबाई में नब्बे गज और चौड़ाई में तीस गज हैं। मस्जिद की दो बहुत ऊंची और खूबसूरत मीनारें लाल पत्थर की हैं, जिन पर खड़ी पट्टियां संगमरमर की हैं। इनकी ऊंचाई 130 फुट है। अंदर चक्करदार जीना है, जिसमें 130 सीढ़ियां है। मीनार के तीन खंड हैं। हर खंड के गिर्द खुला हुआ बरामदा है। चोटी पर की बुर्जी बारहदरी है। मस्जिद के पीछे चार और छोटी-छोटी बुर्जीदार मीनारें हैं। मस्जिद के बड़ी-बड़ी महराबों के सात दर हैं। मस्जिद के इजारे में तमाम संगमरमर लगा हुआ है। आगे के दालान में ग्यारह दर हैं। दालान 24 फुट चौड़ा है। इनमें की बीच की महराब एक दरवाजे की तरह चौड़ी और ऊंची है और उसके दोनों ओर पतली-पतली अष्टकोण बुर्जियां हैं। इन दरों के माथों पर संगमरमर की तख्तियां चार फुट लंबी और ढाई फुट चौड़ी हैं, जिन पर संगमूसा की पच्चीकारी के ग्यारह लेख हैं। इन लेखों में मस्जिद की तामीर के हालात और शाहजहां के राज्य काल की देनें और शाहजहां के गुणों का बखान है। मध्य की महराब पर केवल ‘रहबर’ खुदा हुआ है।

असल मस्जिद के दालान मस्जिद के फर्श से पांच फुट ऊंचे चबूतरे पर बने हुए हैं, जिनमें पश्चिम, उत्तर और दक्षिण- तीनों ओर से तीन-तीन सीढ़ियां चढ़कर अंदर दाखिल होते हैं। मस्जिद के अंदरूनी तमाम हिस्से में संगमरमर का फर्श है, जिसमें संगमरमर के मुसल्ले (नमाज पढ़ने के आसन) संगमूसा का हाशिया देकर बनाए गए हैं। हर आसन तीन फुट लंबा और डेढ़ फुट चौड़ा है। इनकी संख्या 411 है। बर्नियर कहता है कि मस्जिद के पिछवाड़े जो बड़े-बड़े पहाड़ी के नाहमवार पत्थर निकले हुए थे, उनको छुपाने के जिए सहन मस्जिद में भराव करके इमारत को बहुत ऊंची कुर्सी दी गई है, जिससे मस्जिद की शान और भी बढ़ गई है। मस्जिद सिर से पैर तक लाल पत्थर की बनी हुई है। बेशक, फर्श, महराब और गुंबद संगमरमर के हैं।

मंबर के पास एक बड़ी महराब है। मंबर चार सीढ़ियों के संगमरमर के एक ही पत्थर में काटा हुआ है। इसमें कहीं जोड़ नहीं है। मस्जिद का सहन चारों ओर से घिरा हुआ है, जिसके हर तरफ महराबदार बीस-बीस चौड़े और उतने ही ऊंचे दालान हैं। इन दालानों के कोनों पर बारह-बारह जिलों के बुर्ज हैं, जिन पर संगमरमर के सुनहरी कलस लगे हुए थे। उत्तरी और दक्षिणी दोनों दरवाजे एक ही प्रकार के अर्द्ध-मुसम्मननुमा हैं। दरवाजे 50 फुट ऊंचे और इतने ही चौड़े हैं। इनकी गहराई 33 फुट है। इन दरवाजों के अंदर एक-एक छोटा दरवाजा दोनों और दोनों मंजिलों में है। दरवाजों के ऊपर कंगूरे और उन पर एक कतार छोटी संगमरमर की बुर्जियों की है, जिसके दोनों सिरों पर निहायत सुंदर और नाजुक मीनार है। मस्जिद का सदर दरवाजा सहन के पूर्व में है। यह दरवाजा बड़ा भारी मुसम्मन शक्ल का गुंबददार 50 फुट ऊंचा, 60 फुट चौड़ा और 50 फुट गहरा है। इसकी चौकोर शक्ल अजला को काटकर अठपहलू बना दी गई है। बाकी शक्ल-सूरत इस दरवाजे की वैसी ही है, जैसी कि दूसरे दरवाजों की है। मस्जिद के तीनों दरवाजों के पटों पर पीतल की मोटी-मोटी चादरें चढ़ी हुई हैं, जिन पर मुनब्बतकारी का काम है।

मस्जिद के सहन में लाल पत्थर के बड़े-बड़े चौके बिछे हुए हैं, जो 136 गज मुरब्बा हैं। इतना चौड़ा सहन होने पर भी इसमें ढलान इस खूबी से रखी गई है कि इधर वर्षा बरसी और उधर पानी निकला। क्या मजाल कि एक बूंद भी पानी खड़ा रहे। सहन के बीचोंबीच फर्श से एक हाथ ऊंचा, पंद्रह गज लंबा और बारह गज चौड़ा खालिस संगमरमर का हौज है। कभी इसमें फव्वारे लगे हुए थे। अब वे काम नहीं करते। पहले यह हौज रहट के कुएं से भरा जाता था, जो मस्जिद के उत्तर-पश्चिम के कोने में था। यद्यपि इतनी ऊंचाई थी, फिर भी पानी चढ़ता था और अंदर-ही-अंदर मस्जिद के सहन में पहुंचकर उसे लबालब भर देता था। यह कुआं 1803 ई. में खुश्क हो गया, जिसकी मरम्मत उस वक्त के ब्रिटिश रेजीडेंट मि. सैटन ने करा दी थी। यह कुआं भी शाहजहां ने पहाड़ी काटकर बनवाया था, जिस पर रहट लगा रहता था। अब वह नहीं रहा। अब तो नल द्वारा पानी भरा जाता है।

कहते हैं कि मस्जिद की मीनारें इस कारीगरी से बनाई गई हैं कि अगर दुर्घटनावश कोई मीनार गिर जाए तो सहन में गिरे ताकि मस्जिद की छत और गुंबदों को किसी प्रकार की हानि न पहुंचे। अनुभव से यह बात कई बार प्रमाणित हो चुकी है। इस मस्जिद की मरम्मत 1817 ई. में अकबर सानी के काल में हुई थी। दूसरी बार 1851 ई. में एक कड़ी टूट गई थी। 1833 ई. में मस्जिद के उत्तरी मीनार पर बिजली गिरने से मीनार और नीचे का फर्श टूट गया था, मगर इमारत को कोई हानि नहीं पहुंची और उसकी मरम्मत ब्रिटिश राज की ओर से हुई। चौथी बार 1895 ई. में दक्षिणी मीनार पर बिजली गिरी और बुर्जी को हानि पहुंची, लेकिन बाकी इमारत सुरक्षित रही। इस बार नवाब बहावलपुर ने चौदह हजार रुपये लगाकर मीनार की मरम्मत करवाई। 1887 से 1902 ई. के अर्से में नवाब रामपुर ने एक लाख पचपन हजार के खर्चे से मस्जिद की पूरी तरह मरम्मत करवाई और उसे नया करवा दिया। ऊपर जाकर मीनारों के ऊपर चढ़कर देखने से सारा शहर हथेली में नजर आता है। अलविदा के शुक्रवार को नमाज पढ़ने बड़ी भारी खलकत जमा होती है। दूर-दूर से मर्द औरतें नमाज पढ़ने आते हैं। तमाम मस्जिद और तीन तरफ की सीढ़ियां तथा रास्ते नमाजियों से घिर जाते हैं। यह नजारा देखने योग्य होता है। बस सिर-ही-सिर नजर आते हैं। एक कतार में सबका बैठना, उठना और सिजदा करना यह सब एक अजीब दृश्य उपस्थित करता है।

चूंकि अलविदा की नमाज के दिन इस कदर नमाजी जमा होते थे कि मस्जिद में नमाज पढ़वाने वाले की आवाज दूर तक नहीं जा सकती थी, इसलिए अकबर द्वितीय के बेटे शाहजादा सलीम ने 1829 ई. में मस्जिद के मध्य द्वार के सामने एक मकबरा संगबासी का बनवा दिया, ताकि आवाज दूर तक पहुंच सके।

मस्जिद के सहन में उत्तर-पश्चिम के कोने में संगमरमर पर भूगोल बना हुआ है। इसी तरफ के दालान के एक हुजरे में मोहम्मद साहब के स्मृति चिह्न रखे हुए हैं। पहले ये चिह्न सहन के उत्तर-पश्चिम वाले दालान में मस्जिद के बाएं हाथ रखे हुए थे, जिसके आगे औरंगजेब के अहद में अलमास अली खां ख्वाजा सरा ने लाल पत्थर की चौगिर्दा जाली का पर्दा लगवाकर उसे बंद करवा दिया था। उस पर तामीर करवाने की तारीख खुदी हुई थी। 1842 ई. में आंधी आने से यह पर्दा गिर पड़ा था, जिसको बहादुर शाह ने फिर से बनवाया और अब वहीं मौजूद है।

सहन के दक्षिण-पश्चिमी कोने में एक धूपघड़ी बनी हुई है, जो भूगोल के बिलमुकाबिल है। स्मृति चिह्न बहुत कदीमी बतलाए जाते हैं। बाज अमीर तैमूर को रोम के बादशाह से मिले और बाज कुस्तुनतुनिया से लाए गए। ये इस प्रकार हैं-

1. कुरान शरीफ के चंद पारे हजरत अली द्वारा लिखित, 2. चंद पारे हजरत इमाम हसन द्वारा लिखित 3. पूरी कुरान शरीफ इमाम हुसैन द्वारा लिखित, 4. चंद पारे हजरत इमाम जाफर द्वारा लिखित, 5. मवे मुबारक हजरत मोहम्मद साहब, 6. नयलीन शरीफ, 7. कदम शरीफ, 8. गिलाफ मजार हजरत मोहम्मद साहब, 9. पंजा शरीफ हजरत मौलवी अली शेरखुदा, 10. चादर हजरत फातिमा, और 11. गिलाफ काबा शरीफ।

ये सब वस्तुएं औरंगजेब के जमाने में मस्जिद में रखी गई थीं। बादशाह सदा इनके दर्शन को आया करते थे और अलविदा के दिन बारह अशरफियां नजर करते थे। शाहजहां के बाद हर बादशाह के जमाने में मस्जिद अच्छी हालत में रही, मगर कहते हैं कि बहादुर शाह जफर के काल में कुछ बदनजमी हो गई। 1857 के गदर में मस्जिद जब्त कर ली गई थी और नमाज बंद हो गई थी। मस्जिद पर पहरा बिठा दिया गया था। कई बरस यह हाल रहा। नवंबर 1862 ई. में अंग्रेजी हुकूमत ने इसे मुसलमानों को वापस किया और एक प्रबंधक कमेटी मुकर्रर कर दी।

मस्जिद के उत्तर में शाही औषधालय था और दक्षिण में शाही विद्यालय। ये दोनों इमारतें 1857 के गदर से पहले ही खंडहर हो चुकी थीं। गदर के बाद उन्हें गिरा दिया गया। ये मस्जिद के साथ-साथ 1650 ई. में तामीर हुई थीं। दक्षिणी द्वार के सामने एक बहुत बड़ा और चौड़ा बाजार हुआ करता था, जो इस दरवाजे से शुरू होकर तुर्कमान और दिल्ली दरवाजे तक चला गया था। बाजार अब भी मौजूद है, मगर उस जमाने की सी हालत अब नहीं रही।

जहांआरा बेगम का बाग या मलका बाग (1650 ई.) जहांआरा बेगम का बनाया हुआ यह बाग चांदनी चौक के मध्य में स्थित है, जिसे 1650 ई. में शाहजहां की इसकी चहेती बेटी ने लगवाया था। अब इसका नाम मलका का बाग पड़ गया है। जमाने के उतार-चढ़ाव के कारण इस बाग की वह शक्ल नहीं रही, जो उस वक्त थी। बाग की लंबाई 970 गज और चौड़ाई 240 गज थी। इस बाग की वह चारदीवारी अब नहीं, जिसमें जाबजा बुर्ज बने हुए थे। गदर की लूट-खसोट में ये टूट-फूट गए। ये बुर्ज तीस फुट ऊंचे थे और पंद्रह फुट ऊंचे चबूतरे पर बने हुए थे। कटरा नील की तरफ बाग की दीवार में अभी तक उन बुजों में से एक बाकी दिखाई देता है। शहर दिल्ली की नहर, जो किसी जमाने में चांदनी चौक के बीच में से गुजरा करती थी, सारे बाग में फैली हुई थी। अब वह बंद हो गई है। इस बाग में तरह-तरह के मकान, सैरगाहें, बारहदरियां और नशीमन बने हुए थे। वे सब खत्म हो गए हैं। सिर्फ एक कमरा 50 फुट x 20 फुट का बाकी है, जिसमें आनरेरी मजिस्ट्रेट कचहरी होती है; कभी उसमें पुस्तकालय हुआ करता था।

अब तो उस जमाने के बाग की निशानी ही बाकी रह गई है। नाम तक बदल गया है। इसका बहुत बड़ा हिस्सा तो सड़कों की नजर हो गया है। कितनी ही म्युनिसिपल दफ्तरों की इमारतें बन गई हैं। सैकड़ों पुराने वृक्ष काट दिए गए। सरौली के आमों के पेड़ खास मशहूर थे, वे अब देखने को भी नहीं मिलते। ले-देकर रेलवे स्टेशन की ओर और कमेटी के दफ्तर की इमारत के बीच का भाग कुछ अच्छी हालत में है, जहां अब गांधीजी की मूर्ति लगा दी गई है। बाकी का बाग तो नाम मात्र का ही है। कौड़िया पुल की तरफ का बहुत हिस्सा सड़क में मिल गया, कुछ पर हार्डिंग पुस्तकालय बन गया। जो हिस्सा गांधी मैदान कहलाता है, वहां अब से पच्चीस-तीस वर्ष पहले तक बहुत सुंदर घास लगा मैदान था, जहां क्रिकेट के मैच हुआ करते थे। बड़े-बड़े साएदार वृक्ष लगे हुए थे।

5 मार्च 1931 को गांधी इर्विन पैक्ट के बाद इस मैदान में कई लाख की संख्या की एक बड़ी भारी सभा हुई थी, जिसमें महात्मा गांधी बोले थे। उन दिनों लाउड स्पीकर चले ही थे। आवाज सुनाई नहीं दे पाई। तभी से इस मैदान का नाम गांधी ग्राउंड पड़ा। अब तो इसमें आए दिन मेले, तमाशे, नुमाइशें, सभाएं होती रहती हैं। इसलिए घास इसमें जमने ही नहीं पाती। स्टेशन की तरफ का भी बहुत बड़ा हिस्सा सड़क और स्टेशन बढ़ाने में चला गया। उत्तर-पूर्व के कोने में एक कुआं हुआ करता था, वह अब स्टेशन की सड़क के दूसरी तरफ पहुंच गया है। स्टेशन के सामने जो मौजूदा सड़क है, वह बाग के अंदर हुआ करती थी और इस पर आमों के पेड़ लगे हुए थे। फतहपुरी की तरफ का हिस्सा भी कटकर सड़क में मिल गया है। धीरे-धीरे यह बाग सिकुड़ता जा रहा है। बाग के सात दरवाजे हैं- दो चांदनी चौक बाजार की तरफ, तीसरा फतहपुरी बाजार की तरफ, अहमदपाई की सराय के सामने, चौथा स्टेशन के सामने, पांचवां काठ के के सामने, छठा हार्डिंग पुस्तकालय के सामने, और सातवां पुल फव्वारे की तरफ। इनके अतिरिक्त और भी कई छोटे दरवाजे बन गए हैं।

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