हिन्दुओं और मुसलमानों में पैदाइश की रस्मों में सिर्फ़ छोटी-मोटी बातों का फ़र्क था। दोनों सम्प्रदायों में लड़के की इच्छा बड़ी प्रबल थी। बाबर ने हिन्दाल की पैदाइश से पहले ही दो काग़ज़ के पुर्जे उठाए और उनमें से एक पर लड़के का नाम लिखा और दूसरे पर लड़की का। उसने आँख बंद करके एक पुर्जा उठाया तो ख़ुशी का ठिकाना न रहा जब उसने देखा कि उस पर लड़के का नाम लिखा हुआ था। उसने उसी समय शपथ ली कि अगर खुदा ने बेटा बख़्शा तो वह ख़्वाजा मुईनुउद्दीन चिश्ती की दरगाह पर हाज़िरी देगा। ख़्वाजा हसन देहलवी ने एक मनसवी में किसी दूसरे मुग़ल बादशाह की लड़के के लिए उत्कट अभिलाषा का वर्णन इस प्रकार किया है-

किया पंडितों ने जो अपना विचार

तो फिर उंगलियों पर किया कुछ शुमार

जनम पत्तरा शाह का देख कर

तुला और वृच्छक पर कर नजर

कहा रामजी की है तुझ पर नज़र

बच्चे की पैदाइश की रस्में दुलहन के गर्भवती होने के समय से ही शुरू हो जाती थी। इस ख़बर के फैलते ही रिश्तेदार बधाई देना शुरू कर देते थे। कुछ घरानों में पहली पैदाइश के लिए औरत को उसके मायके भेज दिया जाता था। यह रिवाज हिन्दू और मुसलमानों दोनों में था। रिहाइश में तब्दीली के ऐसे अवसरों पर अच्छा शगुन माना जाता था। अकबर की राजपूत बेगम को, जो सलीम यानी जहांगीर की मां थी, महल से फ़तेहपुर सीकरी में स्थित शेख सलीम चिश्ती के घर भेज दिया गया था।

अधिकतर घरानों में दाइयां ऐसे मौकों पर कई हफ्ते पहले से ही घर पर रहना शुरू कर देती थीं। पुरानी दिल्ली में कुंडेवालान की हाजन दाई सबसे मशहूर थी और उसे बड़ी तजुर्बेकार और होशियार दाई समझा जाता था। वह खास-खास घरों में ही जाती थी और हर वक़्त बनी-ठनी और जेवरात से लदी रहती थी। बच्चे के पैदा होने के एकाध घंटे के अंदर ही हिजड़े दरवाजे पर इकट्ठा हो जाते थे और नाच-गाकर बधाई देते थे। उनका नेग बंधा होता था, मगर घरवाले की हैसियत ऊंची होती तो मुंह मांगी रकम और कपड़े वगैरा लिए बिना नहीं टलते थे।

सतवांसा

सातवें महीने के शुरू में मुसलमानों में भी मायके वाले सधावर’ लेकर आते थे जिनमें सात तरह की तरकारियां, मेवे और पकवान होते थे। यह रस्म ख़ालिस हिन्दुआनी रस्म है। पहले गर्भवती को नहलाकर नए सिरे से दुलहन की तरह सजाते हैं और फिर सधावर में आई हुई चीज़ों से उसकी गोद भरते है। मायके वाले दूल्हे की बहनों को नेग के रुपए भी देते हैं। नेग की रस्म हिन्दुओं की है। फिर लड़की की ननदें नारियल तोड़ती हैं। अगर गरी सफ़ेद निकली तो यह समझा जाता था कि उजला फल यानी बेटा होगा।

नौमासा-

नवें महीने के शुरू में मायके से गर्भवती का जोड़ा और साज-सिंगार का सामान, जिसमें चांदी की नहरनी और तेल की चांदी की प्याली भी होती है और एक सुर्ख ओढ़नी मय फल और मेवा, ननदों के नेग, पंजीरी के रुपए भेजे जाते हैं। वाले पंजीरी बनाकर सबको बांटते हैं। सतवांसे की तरह गोद भरी जाती है। इस मौके पर दाई पेट पर तेल लगाती है और सब रिश्तेदारों से ‘हक’ पाती है। इसी समय प्रसूति से संबंधित सारा सामान भी मंगवाया जाता था। गर्भवती का एक पलंग एक ‘भाग्यवान कोने’ में रखवा दिया जाता था। पंजीरी जैसी हिन्दुओं में बनती थी, वैसी ही मुसलमानों में बनती थी यानी रखे और सूजी को घी में भूनकर खांड, छुहारे, गोंद, मखाने, गोला और सोंठ डालकर बनाते थे।

जन्म के बाद की रस्में-

बच्चे को पहले दिन शहद, दूसरे दिन घुट्टी और तीसरे रोज मां का दूध पिलाया जाता था। जच्चा के सिरहाने लोहे का टुकड़ा रख देते थे ताकि बच्चा और जच्चा दोनों बुरी नजर से सुरक्षित रहें। बुआ आटे के दूध से, जिसमें हरी दूब पड़ी होती थीं, छाती धुलवाती थी और फिर बालों की एक लट, जिसका उसे अलग नेग मिलता था। दूल्हे की बहनें यह गीत गाती–

बीरन भैया मैं तेरी मां जाई

सुनकर बधवा लेकर आई

छाती धुलाई कटोरी लूंगीं तो लट धुलाई रुपया

पांव धुलन को चेरी लुंगी तो खसम चढ़न को घोड़ा

जहांगीर के जन्म पर ये गीत गाए गए थे। इनमें भी हिन्दू भावनाएं गुंथी हुई हैं—-

1—मांगे जोधाजी का राज

लल्ला जी का माल न छुए

थाल भर मोती जोधा रानी लाई

वह भी न लेवे यह दाई

शाल दुशाले जोधारानी लाई

वह भी न लेवे….

हाथी घोड़े जोधारानी लाई

वह भी न लेवे…..

वह तो मांगे है आधा राज

महाबली राज- वह तो मांगे है आधा राज

2–मेरे बाबुल को लिखियो संदेस

झंडूला आज हुआ

बाबुल हमारी नगरी के बीरन वाले देस

झंडूला आज हुआ

रस भरी खिचड़ी ला मेरे बाबुल

नीवत बाजे द्वार

झंडूला आज हुआ

छठी और मुंडन—

मुंडन की रस्में वैसे ही मनाई जाती थीं जैसे कि हिन्दुओं में। छह रोज के बाद झंडूले को बुध या सोमवार को छठी नहलाई जाती थी। यह भी औरतों की ही रस्म थी। जच्चा नहा-धोकर पलंग पर बैठ जाती थी। घर में नाच-गाना होता और बाहर हिजड़े, भांड और कननचइयां अपना-अपना नाच दिखातीं। मौलवी सैयद अहमद साहब का खयाल है कि अकीका या मुंडन का रिवाज हिन्दुओं से नहीं लिया गया। क्योंकि हजरत मुहम्मद साहब के जमाने में भी यह रिवाज था।यह बात सही है लेकिन हिन्दुस्तान में बच्चे के बाल नाई से मुसलमान घरों में उसी तरह कटवाए जाते हैं जैसे हिन्दुओं के मुंडन में यानी नाई बाल भिगोता और फिर उस्तरे से बच्चे के बाल एक मोटी-सी रोटी पर लेता रहता। नेग वग़ैरा की रस्में भी वही थीं।

सोहर का गीत—-बच्चा पैदा होने के बाद छह दिन तक बारी-बारी से औरतें जागती और सोहर गाती रहती-

मोरे बाबुल को लिक्खो संदेस, झंडूला आज हुआ

बाबुल हमारे राजा के चाकर बीरन, बाले भइस भाई बच्चा है रूप

झंडूला आज हुआ

इस गीत का अर्थ यह है कि मेरे अब्बा को ख़बर भेज दो कि आज तुम्हारी बेटी के यहां लड़का पैदा हुआ है। मेरे अब्बा राजा के नौकर यानी अमीर और इज़्ज़तदार आदमी हैं और भाई अभी सयाना है। इसी तरह का एक गीत, जैसा कि ऊपर ज़िक्र आ चुका है, जहांगीर की पैदाइश पर गाया गया था। एक जच्चागीरी में जच्चा कहती है कि मेरे मायके और ससुराल के रिश्तेदारों को बुलाओ ताकि सब अपना-अपना फर्ज अदा करें-

बुलाओ री मेरी सास बड़ी को, वह आएं पलंग बिछाएं

पायल बाजे छनन छनन

बुलाओ री मेरी अम्मा बड़ी को, वह घी खिचड़ी लाएं

पायल बाजे छनन छनन

बुलाओ री मेरे अब्बा बड़े को, वह आए भांड़ नचाएं

पायल बाजे छनन छनन

बुलाओ री मेरे ससुर बड़े को, वह नौबत रखाएं, नेग चुकाएं

पायल बाजे छनन छनन

बुलाओ री मेरी ननद बड़ी को, वह आएं छतियां धुलाएं

पायल बाजे छनन छनन

बुलाओ री मेरे बहन बड़ी को, वह आएं कुरता-टोपी लाएं

पायल बाजे छनन छनन

डोमनियों की यह जच्चागीरी बड़ी लोकप्रिय थी। वे लहक-लहक कर गातीं-

मेरे लला के घूंघर वाले बाल

अम्मा जीवे, बाबा जीवे और जिए परिवार

मेरे लला के घूंघर वाले बाल

हंसली चूमूं, कठला चूमूं और चूमूं गले का हार

कुरता चूमूं टोपी चूमूं और चूमूं गोरे गाल

मेरे लला के घूंघर वाले बाल

इस जच्चागीरी में हिन्दू विश्वासों का स्पष्ट प्रमाण मिलता है-

उस हरियाले ने जनम लिया मैं तो पालना बनाऊंगी रे

अगर चंदन का मैं पालना बनाऊं, रेशम डोर झुलाऊंगी रे

इस बाबा प्यारे ने जनम लिया, मैं तो पालना बनाऊंगी रे

सोने रूपे की बाबुल खिचड़ी लइयो

सुघड़ जच्चा को मैं तारे दिखाऊंगी रे

इस गीत में लड़के की कृष्णजी के जन्म के रूप में कल्पना की गई है-

अलबेले ने मुझे दर्द दिया, सांवरिया ने मुझे दर्द दिया

पायलिया ने दर्द दिया

जाए कहो लड़के के बाबा से ऊंची नौबत धराओ रे

अलबेले ने मुझे दर्द दिया, पायलिया ने मुझे दर्द दिया

जाए कहो लड़के के नाना से रंगभरी खिचड़ी लाओ रे

अलबेले ने मुझे दर्द दिया

जाए कहो लड़के के मामूं से हंसली कड़े घड़ाओ रे

अलबेले ने मुझे दर्द दिया

जाए कहो लड़के की ख़ाला से कुरते टोपी लाओ रे

अलबेले ने मुझे दर्द दिया।।

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