महरौली के बाहर की सरहदों पर एक तालाब है, जिसे हौज शम्सी कहते हैं। इसे 1230 ई. में सुलतान शम्सुद्दीन अल्तुतमिश ने बनवाया था। कहा जाता है कि सुलतान तालाब के लिए एक मुनासिब जगह तलाश करने के लिए चिन्तित था कि एक रात उसने सपने में हजरत अली को घोड़े पर चढ़े हुए देखा। उन्होंने उससे कहा कि तालाब इसी जगह बनवाओ जहां मैं तुमको सपने में नजर आ रहा हूं। अगली सुबह को अल्तुतमिश ने अपना यह सपना ख्वाजा बख्तियार काकी को सुनाया और उन्हें अपने साथ लेकर उस स्थान पर पहुंचा जिसका इशारा हजरत अली ने ख्वाब में किया था। वहाँ पहुँचकर दोनों क्या देखते हैं कि हजरत अली के घोड़े के सुमों का एक निशान यहाँ बना हुआ था और उसमें से पानी निकलकर वह रहा था। बस सुल्तान ने वहीं एक पेज और गुंबद बनवाना शुरू कर दिया।

अलाउद्दीन ख़िलजी के जमाने में यह तालाब कभी-कभी खुश्क हो जाता था। जब उसे इस बात का पता चला तो 1312 ई. में उसने उसकी पूरी सफ़ाई करवा डाली। उसकी वजह से पानी के आने में जो रुकावटें थीं वे दूर हो गई। बाद में फीरोजशाह तुगलक ने (1315-1388 ) उसकी पूरी मरम्मत करवाई। जिन नालियों और रास्तों से पानी आता था उन्हें अच्छी तरह खुलवाया गया और एक बाँध बनवाकर उसे नौलखी नाले के साथ जोड़ दिया गया जो तुगलकाबाद के किले को पानी मुहैया करता था। हौज शम्सी फिर पानी से लबालब भर गया और बरसात के मौसम में तो यह मीलों दूर से नज़र आया करता था।

उस समय से यह हौज तैराकी के खेलों का एक बड़ा केन्द्र बन गया। तैराकों और तमाशाइयों के हुजूम हर छुट्टी के दिन यहाँ इकट्ठे होते थे और मेला-सा लग जाता था। लेकिन केवल वही तैराक जिनमें बड़ी जान और होसला होता उसके गुंबद तक पहुँच सकते थे। गुंबद को नीचे से या जरा से फ़ासले से देखने से यह धोखा होता था कि सिर्फ चंद गज की ऊँचाई पर ही है। हौज शम्सी के पास ही इमारतों का एक झुरमुट था जिनका नाम झरना पड़ गया था। इसमें से बरसात के मौसम में हीज़ का सारा फालतू पानी नीचे गिरता था। मिर्जा फ़रहतुल्लाह वेग देहलवी ने अपनी एक रचना में इसकी तुलना बहिश्त (स्वर्ग) के एक स्थान से की है।

बाँध का पानी एक विशाल दालान की खोखली छत पर से होकर गुज़रता था। छत में असंख्य छेद थे, जिनमें से पानी बारिश की बूंदों की तरह बरसता था। दालान की दीवारों में सैकड़ों आले बने हुए थे, जिनमें जलते हुए चिरारा रख दिए जाते थे। जब पानी इन चिराग़ों के सामने पड़ता था तो ऐसा लगता था पिघला हुआ सोना ऊपर से नीचे गिर रहा है। छत की चारदीवारी के नीचे तेरह परनाले बने हुए थे, जिनमें से पानी एक बरामदे में से बहकर शोर मचाते हुए मोटी धारा के रूप में नीचे तालाब में गिरता था। मुग़ल बादशाहों ने इस जगह पर बारहदरी और एक आरामगाह बनवाई थी। मुहम्मदशाह रंगीला और उसके हरम की औरतें इस जगह की शैदाई थीं। मुग़ल शहजादियाँ इसी हौज़ में तैरना पसंद करती थीं।

कालांतर में यह बावली दिल्लीवालों के लिए एक पिकनिक स्थल या सैर-तफरीह का केन्द्र बन गई। कोई दिन ही ऐसा होता था जब यहाँ कोई भीड़ न होती हो। तैराक और गोताखोर हर रोज ही आते और पानी में और पानी की सतह के ऊपर तरह-तरह की कलाबाज़ियों का प्रदर्शन करते। दो लड़के हाथों में फूलों के गुलदस्ते लिए गोताखोर के दोनों कंधों पर खड़े होते। पलक झपकते ही वे लोग झरने से हौज में कूद पड़ते और फिर तो यह सिलसिला शुरू जाता और तैराक ऊपर चढ़-चढ़कर एक-के-बाद-एक दूसरे हौज़ में कूदते रहते।

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