यह महल शायद अल्तमश ने अपने काल में बनवाया था, जो सबसे बड़ा शाही महल था । इस महल में अल्तमश की बेगम सुलताना रजिया की माता रहा करती थीं। जैसा कि बताया जा चुका है, सुलतान अलाउद्दीन मसऊद शाह को कने सफेद से लाकर उसकी ताजपोशी 1239 ई. में मुइउद्दीन बहरामशाह के जानशीन के तौर पर इसी महल में हुई। नासिरुद्दीन महमूद शाह ने, जो अलाउद्दीन का जानशीन था, अपना पहला दरवार इसी महल में किया। इस महल का अब कहीं पता नहीं चलता।

कुश्के सब्ज

यह सब्ज महल भी अल्तमश ने कुश्के फीरोजी के साथ बनवाया था। इसमें भी कई ताजपोशियां, दरबार और कत्ल हुए बताते हैं। इस महल का पहला जिक्र अल्तमश के लड़के नासिरुद्दीन महमूद शाह के राज्य काल में आता है, जो इस महल में तख्त पर बैठा और हलाकू के सफीर का यहां स्वागत किया, जबकि किलोखड़ी के किले से यहां तक बीस-बीस सिपाहियों की गहरी कतार खड़ी थी। फरिश्ते ने यह घटना कसे सफेद की बाबत लिखी है, जो अधिक विश्वसनीय है।

चबूतरा नासिरा

यह चबूतरा भी उसी जमाने में बना, जब ऊपर के दोनों महल बने। मगर इसे शायद नासिरुद्दीन महमूद शाह ने बनवाया। ये सब इमारतें पृथ्वीराज के किले में थीं। अलाउद्दीन खिलजी जब देवगिरि को लूटकर दिल्ली लौटा था तो सब माल इसी चबूतरे पर फैलाया गया था और एक छतरी दरबार करने के लिए बनाई गई थी। अब इस चबूतरे का भी पता नहीं चलता। जब जलालुद्दीन ने खुली बगावत की और किलोखड़ी के पास बहादुरपुर में अपने को किलेबंद कर लिया तो कैकबाद का मासूम बच्चा दिल्ली का बादशाह घोषित किया गया और उसने चंद महीनों तक अपना दरबार इस किले में किया।

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