तेजी जी, आपका बेटा बहुत अच्छा बोलता है, उसे भेजिए” — जब नर्गिस ने अमिताभ बच्चन के लिए दिल से फोन किया
दी यंगिस्तान, नई दिल्ली।
Amitabh Bachchan: 1960 के दशक का आख़िरी पड़ाव था। भारत युद्ध से उबर रहा था, और फिल्मी दुनिया नई पीढ़ी के सितारों की तलाश में थी। ऐसे में एक कहानी शुरू होती है दिल्ली से — तेजी बच्चन और नर्गिस की गहरी दोस्ती से।
तेजी बच्चन सिर्फ हरिवंश राय बच्चन की पत्नी या अमिताभ की मां ही नहीं थीं, बल्कि समाजसेवा और मंचीय कला की एक जानी-पहचानी हस्ती थीं। भारत-चीन युद्ध के समय नागरिक समिति में नर्गिस और तेजी दोनों सक्रिय थीं। उसी दौरान दिल्ली और मुंबई में दोनों का आपसी मेलजोल गहरा हुआ। विचारों, संवेदनाओं और कला के प्रति समर्पण ने इस मित्रता को और पुख्ता किया।
अमिताभ उन दिनों कोलकाता में काम करते थे, लेकिन उनके भीतर अभिनेता बनने की ललक जोर पकड़ रही थी। तेजी को यह बात अच्छी तरह पता थी, लेकिन उन्होंने कभी नर्गिस से कोई सिफारिश नहीं की। इधर नर्गिस जब दिल्ली आईं, तो तेजी जी से एक मुलाकात में उन्होंने कहा—
“तेजी जी, आपका बेटा बहुत अच्छा बोलता है, उसे फिल्मों में कोशिश करनी चाहिए।”
तेजी ने मुस्कराकर बात टाल दी, लेकिन नर्गिस इस बात को भूल नहीं पाईं। कुछ समय बाद जब मुंबई लौटीं, तो उन्होंने एक फिल्म निर्माता से कहा— “आप एक स्क्रीन-टेस्ट लीजिए, मैं जानती हूं, वो लड़का कुछ करेगा।”
स्क्रीन-टेस्ट की तारीख तय हुई, और नर्गिस ने खुद तेजी जी को फोन किया—
“तेजी जी, अमिताभ को भेजिए, उसे स्क्रीन टेस्ट के लिए बुलाया है।”
तेजी बच्चन के लिए यह भावुक क्षण था। एक मां के रूप में और एक मित्र के रूप में नर्गिस का यह प्रयास उन्हें भीतर तक छू गया।
अमिताभ दिल्ली से मुंबई पहुंचे। मुंबई में न कोई स्वागत, न कोई परिचय। एक फाइव-स्टार होटल में रुके। दो दिन बाद सापतारा स्टूडियोज में स्क्रीन टेस्ट का दिन था। वक्त पर पहुंचे, सहायक आया, संवाद थमाए, कैमरा ऑन हुआ— अमिताभ ने पूरे आत्मविश्वास से टेस्ट दिया।
लेकिन इसके बाद जो हुआ, वह मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री की एक सच्चाई है। न कोई फीडबैक मिला, न कोई कॉल, न रिजल्ट। उस दौर की फ़िल्म इंडस्ट्री अपनी आत्ममुग्धता और बेरुखी के लिए मशहूर थी — और अमिताभ का पहला अनुभव इससे अछूता नहीं रहा।

तेजी बच्चन को भी न बताया गया कि उनके बेटे का क्या हुआ। न नर्गिस को जानकारी दी गई। यह उस दौर की परिपाटी थी — स्क्रीन टेस्ट की दुनिया में एक लंबी खामोशी के बाद सिर्फ किस्मत बोलती थी।
बाद में, नवनीत प्रधान के जरिये अमिताभ की मुलाकात मोहन सहगल से हुई, और वहीं से उन्हें पहली फिल्म सात हिंदुस्तानी मिली। लेकिन उस पहले टेस्ट और नर्गिस के किए फोन कॉल की गरिमा, अमिताभ कभी नहीं भूले। कई साल बाद जब वह सुपरस्टार बन गए, उन्होंने एक मुलाकात में कहा था—
“मां की एक दोस्त ने मुझे हीरो बनने की पहली सीढ़ी तक पहुंचाया था। जो नहीं हुआ, वह किस्मत थी; लेकिन जो कोशिश हुई, वह रिश्ते की ताकत थी।”
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