दिल्ली में जब 1857 का विद्रोह शुरू हुआ। जब विद्रोही पहुंचे तो शुरू-शुरू में उनके जिहादी नारों का इतना जोश था कि उन्होंने सिपाहियों को भी मुजाहिदीन कहना शुरू कर दिया। मौलवी मुहम्मद बाकर ने देहली उर्दू अख़बार में इस बगावत को जिहाद का नाम दिया। उनका कहना था कि सारे सिपाहियों का नेतृत्व बहुत नाराज खुदा कर रहा है जो अंग्रेजों द्वारा सच्चे मजहब पर बार-बार हमला करने की वजह से बहुत नाखुश है। इसलिए दिल्ली के दूसरे शिक्षित शरीफ नागरिकों के विपरीत बाकर शुरू से ही बगावत के पूरी तरह से समर्थन में थे। वह सुबह आठ बजे से ही सड़क पर निकल आए थे। ताकि जो कुछ हो रहा था उसको तफ्सील से लिख सकें।

“यह नाचीज़ पत्रकार गोलियों की आवाजें सुनकर इस्लाम की खातिर जान पर खेलकर घर से बाहर निकला। उस वक्त इसे अपनी जान से बढ़कर अपने पढ़ने वालों की खातिर ज़्यादा से ज़्यादा जानकारी जुटाने की ज़्यादा फिक्र थी। बगैर किसी झिझक के वह उस हंगामे की तरफ बढ़ गया ताकि उसकी तफ्सील मालूम कर सके,” उन्होंने लिखा ।

कश्मीरी बाजार में भगदड़ मची थी। लोग इधर से उधर भाग रहे थे। बहुत से अंग्रेज हाथ में नंगी तलवारें लिए घबराहट में भाग रहे थे और उनके पीछे बहुत से तिलंगे बंदूकें संभाले उनका पीछा कर रहे थे। उनके बाद शहर के लोग-कोई हाथ में डंडा, तो कोई पलंग का पाया, या बांस की लाठियां लिए दौड़ रहे थे। शहर के कुछ लोग अंग्रेजों पर भी चीखते-चिल्लाते हुए पत्थर और ईंटें फेंक रहे थे। फल- मसाजिद के सामने करीब बीस तिलंगे खड़े थे और लोग मस्जिद की तरफ इशारा करके उन्हें बता रहे थे कि वहां कुछ अंग्रेज छिपे हैं। मैंने देखा कि वह मस्जिद के अंदर दाखिल हुए और उन सबको मौत के घाट उतार दिया। थोड़ी दूरी पर कॉलिन्स साहब की कोठी और सेंट जेम्स चर्च था जहां कोई तीन सौ तिलंगे और तुर्की सवार खड़े थे।

” वहां से सब लोग अलग-अलग जत्थों में फैल गए और सबसे पूछना शुरू किया कि अंग्रेज़ कहां छिपे हैं। अगर कोई कुछ भी सूचना देता तो वह फौरन उसके साथ हो लेते। फ्रेजर के डिप्टी थॉमस कॉलिन्स के घर के सब लोग मार डाले गए। सेंट जेम्स के चर्च की दीवार पर अभी तक लगी तख्ती के अनुसार, परिवार के कम से कम तेईस लोगों को ’11 मई 1857 के आसपास दिल्ली में नृशंसतापूर्वक मार डाला गया था। पास में ही फादर जेनिंग्स, दिल्ली बैंक के बेरेसफोर्ड परिवार और डॉ. चमन लाल, जिन्हें “देसी ईसाई और इस चर्च के उपासक’ बताया गया है, की तख्तियां भी मौजूद हैं। चर्च और कचहरी में भी ज़बर्दस्त लूटमार मची और वहां से भी हर चीज जो वह निकाल सकते थे, ले गए। कुर्सियां, मेजें, और फर्श के संगमरमर के स्लैब तक। थोड़ी देर बाद मुझे कमिश्नर के दफ्तर में चीफ क्लर्क निक्सन साहब की लाश नजर आई।

जब मेरी नजर दिल्ली कॉलेज की तरफ पड़ी तो देखा कि उसका सारा सामान, तस्वीरें, विभिन्न उपकरण, दवाएं, लैब का सामान, अंग्रेज़ी और फारसी की किताबें और और हजारों रुपए के नक्शे लूटे जा चुके थे। लोग इतने जोश में थे कि उन्होंने ज़मीन पर लगे पत्थरों और दरवाजों के कुब्ज़ों तक को भी उखाड़ लिया। हर तरफ से बंदूकों के चलने की आवाज़ सुनाई दे रही थी….

11 मई की घटनाओं बयान करते हुए मुहम्मद बाकर की रिपोर्ट में एक जिज्ञास पत्रकार और युद्ध संवाददाता के साथ-साथ एक उपदेशक की झलक भी मिलती। 17 मई के अख़बार का लगभग पूरा मुखपृष्ठ कुरआन की आयतों से भरा था जिसमें खुदाई ताकत और सांसारिक घमंड की बुराई के साथ-साथ एक लंबी धार्मिक व्याख्या भी थी। बाकर नाहीं सिर्फ यह बयान करना चाहते थे कि क्या हुआ है बल्कि इसका भी विश्लेषण करना चाहते थे कि उन सब घटनाओं में किस तरह खुदाई हाथ है।

“कुछ लोग कसम खाकर कहते हैं कि तुर्की घुड़सवारों के आने के वक्त उन्होंने देखा कि कुछ ऊंटनियां उनके आगे हैं जिन पर हरे लिबास पहने लोग बैठे हैं। और फिर वह एकदम नज़र से गायब हो गई और सिर्फ घुड़सवार रह गए, जिन्होंने जो भी अंग्रेज़ मिला उसको मार दिया….

“सच तो यह है कि अंग्रेज़ों पर ख़ुदा का कहर टूटा है। उनके घमंड को खुदाई इंतकाम ने चूर-चूर कर दिया है। कुरआन शरीफ़ में लिखा है कि “ख़ुदा घमंड करने वालों को पसंद नहीं करता है।” वह इन ईसाइयों पर ऐसी प्रलय लाया है कि थोड़े ही समय में इस खूनखराबे ने उनको बिल्कुल तबाहो बर्बाद कर दिया। क्योंकि वह सब कुछ कर सकता है और उसने ही उनके तमाम इरादों और मक्कारियों को नाकाम कर दिया है। अब यह बहुत जरूरी है कि सब दिल्ली वाले ख़ुदा पर विश्वास रखें और अपनी सारी ताकत जिल्ले-सुबहानी, साया-ए-खुदावंद, शहंशाह सलामत बहादुर शाह जफर की वफादारी और खैरख्वाही में लगाएं और जो ऐसा करेगा उसको खुदावंद तआला की मदद और समर्थन हासिल होगा। इन हालात की वजह से मुहम्मद बाकर का 27 साला नौजवान बेटा मुहम्मद हुसैन भी, जो बाद में आज़ाद के नाम से जाना गया, बहुत उत्साहित था। अख़बार के दूसरे संस्करण में जो 24 मई को निकला उसमें आज़ाद की एक कविता पहली बार छपी। उसका शीर्षक था “सबक आमोज शिकस्त की तारीख” जो कुछ इस तरह थी:

कल ईसाइयों का उत्थान था,

दुनिया छीनना और दुनिया अता करना,

उनके पास इल्म था और हुनर,

उनके पास शान थी और शौकत

और उनके पास थी एक ताकतवर फौज

पर उसका क्या फायदा हुआ

 कहर की तलवार के सामने

उनका सारा इल्म उन्हें नहीं बचा पाया,

और उनके सारे मंसूबे बेकार हो गए.

उनकी साइंस और मालूमात किस काम की

पूर्व के तिलंगों ने यह सब ख़त्म कर दिया

एक ऐसा हादसा जो पहले किसी ने देखा नाहीं सुना

 देखो किस तरह आसमान की गर्दिश

अक्ल की आंखें खोल देती है

 और किस तरह हकीकत उनके सामने रौशन हो गई

ऐ आज़ाद यह सबक सीख,

उनके इल्म और ख़्वाबों के बावजूद

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