1857 की क्रांति: विलियम डेलरिंपल ने अपनी किताब आखिरी मुगल में क्रांति के बारे में विस्तार से लिखा है। वो लिखते हैं कि दिल्ली के रेजिडेंट थियो मैटकाफ के लिए 11 मई का दिन उसके छह महीने लंबी छुट्टी पर कश्मीर जाने का पहला दिन होता। वह थकान और उदासी के बोझ से बीमार था। एक अजीब से सुन्नपन का बोझ उस पर सवार था। और उसकी बाईं आंख इतनी सूज गई थी कि अब उसे उस पर काला कपड़ा पहनना पड़ रहा था। दिल्ली के लोग उसे  काना मैटकाफ़” कहने लगे थे।

उसे हिंदुस्तान की बिगड़ती हुई हालत का खूब अंदाज़ा था। उसने हाल ही में अपने एक दोस्त से जो लंदन वापस जा रहा था, कहा था, “तुम बहुत खुशकिस्मत हो कि घर जा रहे हो। हमें या तो यहां से निकाल दिया जाएगा या फिर आखरी दम तक लड़ना पड़ेगा।” उसको आराम और छुट्टी की सख्त जरूरत थी और वह अपनी डाक पालकी में बैठकर जाने के लिए बेकरार था ताकि हिमालय की ठंडी और हरी-भरी वादियों में वह अपनी बहन और बेटे से मिल सके। सात साल में जबसे वह हिंदुस्तान आया था यह उसकी पहली लंबी छुट्टी थी । “

वह सुबह जल्दी उठ गया था और मैटकाफ हाउस को बंद करने के इंतज़ाम में लग गया था। सात बजे वह आराम से कचहरी रोड अपने दफ्तर की तरफ़ रवाना हुआ जहां उसे अपने मातहत को चार्ज देना था। लेकिन यह देखकर उसे बड़ी हैरत हुई कि कोर्ट खाली थे।

सिर्फ असिस्टेंट मजिस्ट्रेट आर्थर गैलोवे वहां मौजूद था और इंतज़ार कर रहा था और उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे। उसका कहना था कि खजाने के गार्ड को पिछली रात यह कहते हुए सुना गया था कि सरकार हमारे धर्म को बिगाड़ रही है और अब तो “जो होगा सो होगा”। और यमुना के पुल के दारोगा से यह ख़बर मिली थी कि मेरठ से बागी शहर की तरफ आ रहे हैं।”

थियो ने दरिया के किनारे वाली खिड़की से झांका तो गर्दी-गुबार के बीच दूर के किनारे से एक बड़ा पैदल फौज का दस्ता घुड़सवार सिपाहियों के पीछे के पास पहुंच चुका था और कश्तियों के पुल पार करने की तैयारी में था।

थियो फौरन अपनी बग्घी में सवार हुआ और तेज़ी से अस्लाहाखाने की तरफ रवाना हुआ जो दिल्ली कॉलेज की नई इमारत के पास थी, जहां पहले शाहजहां के बेटे दाराशिकोह की शानदार हवेली हुआ करती थी।” वहां उसकी अपने दोस्त बंगाल आर्टिलरी के लेफ्टिनेंट विलियम विलोबी से मुलाकात हुई, जो अस्लहाखाने का इंचार्ज था। थियो ने उससे कहा कि पुल के उस तरफ फ़ौरन दो तोपें लगा दो ताकि बाग़ी इस पार न आ सकें।

लेकिन जब उसने सहन के पिछले मीनार से जो दरिया के किनारे था, झांका तो दोनों ने देखा कि अब बहुत देर हो चुकी है। कई सौ बागी कतारों में पुल के ऊपर मार्च कर रहे थे और आगे वाले सिपाही पुल के इधर के किनारे पर कब्ज़ा कर चुके थे।” विलोबी को निर्देश देते हुए कि वह फौरन अस्लहाखाने को बंद करके उसकी मोर्चाबंदी कर दे, थियो सरपट गाड़ी दौड़ाता हुआ कलकत्ता गेट की तरफ़ गया जहां से पुल पार करके दिल्ली में दाखिल होने का रास्ता था ताकि उसको बंद कर सके।

यहां अभी वक्त था। थियो का आला अफसर रेज़िडेंट साइमन फ्रेज़र अपने दो चीफ मजिस्ट्रेटों जॉन रॉस हचिन्सन और चार्ल्स ले बास के साथ वहां पहुंच चुका था और वह सिपाहियों के आने से पहले ही दरवाज़ा बंद कर चुके थे। वहां से थियो कदमों की आवाज़ सुन सकता था जब पैदल फौज के सिपाहियों ने वापस जाना शुरू किया क्योंकि वह ज़बरदस्ती दरवाज़ा खोलने में नाकाम रहे थे। अब वह यमुना के किनारे रेत पर चलते हुए दक्षिण की ओर जा रहे थे ताकि शहर में दाखिल होने का कोई और रास्ता ढूंढ़ सकें। यह चारों अंग्रेज़ दरवाज़े की मुंडेर पर खड़े अपनी दूरबीन से सिपाहियों को जाता देखते रहे और उनके पीछे स्नान करने वालों और बेचैन तमाशबीनों का मजमा था जो दरवाज़े और ज़फ़र के प्रिय अंगूरी बाग के बीच में जमा हो गए थे।

फ्रेज़र ने अंदाज़ा लगाया कि यह लोग अब या तो राजघाट या जीनतुल मसाजिद के दरवाज़े से अंदर दाखिल होने की कोशिश करेंगे। उसने थियो से कहा कि वह जितनी जल्दी मुमकिन हो किले की दक्षिणी ओर तरफ जाए और देखे कि वहां के दोनों दरवाज़े बंद करने का आदेश पहुंचा है और उस पर पालन हुआ है या नहीं। थियो जल्दी अपनी बग्घी में सवार होकर किले की दीवारों की आड़ में चलता गया, लेकिन अभी वह कुछ सौ गज़ ही गया होगा कि लाहौरी दरवाज़े और चांदनी चौक के चौराहे पर उसको दूसरी तरफ से कुछ बाग़ी सवार आते नज़र पड़े। यह शायद वही सवार थे जिन्होंने समन बुर्ज के नीचे ज़फ़र से फ़रियाद की थी। जो भी हो, वह शहर में दाखिल हो चुके थे और ईसाइयों की तलाश में थे। उनके हाथों में नंगी तलवारें थीं और वह नारे लगा रहे थे।

जब उन्होंने सर थियो को बग्घी में आता देखा तो उनमें से कुछ लोगों ने उस पर हमला करना चाहा और उसे और उसके घोड़े को गिराना चाहा लेकिन थियो ने अपना कोड़ा निकालकर उन पर बरसाना शुरू कर दिया। इतने में एक बड़ा मजमा किले के सामने वाले मैदान में जमा हो गया था और वह सब सफेद कपड़ों में थे जैसे कोई बड़ा मेला होने वाला हो। इसलिए उसने अपनी बग्घी बहुत तेज़ रफ़्तार से उनके बीच में घुसा दी। मगर जब उसने देखा कि घुड़सवार बाग़ी अब भी उसका पीछा कर रहे थे तो वह बग्घी से नीचे लोगों की भीड़ में कूद गया।

अब थियो ने अपना कोट उतारकर फेंक दिया और पतलून भी उतार दी ताकि वह मजमे से अलग न दिखाई दे और अपने बनियान और जांघिया में सिर नीचे किए चलता गया।”

वह कोहनियां मारता लोगों की भीड़ में बढ़ता गया जब तक उसको पुलिस के कुछ घुड़सवार लोग नहीं नज़र आए जो पेड़ों के नीचे खड़े हालात देख रहे थे। ज्वाइंट मजिस्ट्रेट होने की वजह से पुलिस उसकी मातहत थी, इसलिए उसने उनको हुक्म दिया कि वह बागियों पर हमला करें। लेकिन वह वहां से नहीं हिले। इसलिए उसने उनके अफसर को घोड़े से गिरा दिया और खुद उस पर सवार होकर शहर के अंदर कोतवाल की तलाश में चल पड़ा।

और अब पूरे शहर में एक हंगामा बरपा था। दुकानदार जल्दी-जल्दी अपनी दुकानें बंद कर रहे थे, बाज़ारों में लूटमार मची थी, दरियागंज में अंग्रेज़ों के घरों से धुआं उठ रहा था और ब्रिटिश फौज का कोई निशान तक नहीं था जिसको थियो के ख़्याल में मेरठ से बागियों के पीछे आना चाहिए था। लेकिन थोड़ी देर में थियो ने सुना कि दिल्ली छावनी से हिंदुस्तानी सिपाही कश्मीरी गेट तक पहुंच गए हैं और वहां जमा होकर जवाबी हमले की तैयारी कर रहे हैं। थियो अपने बनियान और जांघिये में ही फिर से घोड़े पर सवार होकर गलियों और पीछे के रास्तों से गुज़रता उन सिपाहियों की तरफ कश्मीरी गेट की ओर बढ़ता गया जिनसे उसको उम्मीद थी कि वह उसको बचा लेंगे।

लेकिन किस्मत का करना कि जैसे ही वह एक मस्जिद के पास से गुज़र रहा था, किसी ने ऊपर से एक ईंट फेंकी जो ठीक उसकी गर्दन के पीछे लगी और वह घोड़े से गिर पड़ा और एक गढ़े में जा पड़ा, बेहरकत और खामोश | उधर थियो के रवाना होने के फौरन बाद ही साइमन फ्रेज़र ने भी गोलियां चलने और शहर के अंदर से सवारों के नारों की आवाजें सुनीं। ये जानकर कि सिपाही शहर के अंदर दाखिल हो चुके थे और कि वह और उसके साथी एक बंद दरवाज़े के सामने खड़े थे और दूसरी तरफ करीब ही कई सौ लोगों का बिफरा हुआ हुजूम था, फ्रेज़र मुंडेर से उतरा और उसने अपने सुरक्षा दस्ते के सवारों को बुलाया जो बज़ाहिर अंग्रेज़ों को पसंद करने वाले नवाब झज्जर ने उसको दिए थे, उसने आदेश दिया कि वह अपनी तलवारें निकालकर एक क़तार में सड़क पर आने वाले सवारों को रोकने के लिए खड़े हो जाएं। हचिन्सन, कैप्टन डगलस और ले बास सब निहत्थे थे। वह संतरी के कमरे के एक कोने में खड़े हो गए। एक चश्मदीद गवाह, ख़बरें पुकारने वाले चुन्नी लाल, का बयान है, “यह सब लोग अपनी-अपनी जगह पर खड़े थे कि सात घुड़सवार सिपाही और दो ऊंटसवार दरियागंज की तरफ़ से किले की तरफ़ आए और क़रीब पहुंचते ही उन्होंने अंग्रेज़ों पर गोली चलाना शुरू कर दिया। झज्जर के सवारों ने कोई रोक नहीं की और फ़ौरन भाग खड़े हुए।

हचिन्सन के दाएं बाजू में कोहनी के ऊपर गोली लगी।  फ्रेज़र गार्ड के कमरे में घुस गया और उसने गार्ड के हाथ से बंदूक छीनकर एक सिपाही पर गोली चलाकर उसको मार डाला। सवार को गिरते देखकर बाहर जमा भीड़ में एक गुस्से की लहर दौड़ गई और वह बहुत ख़ौफ़नाक अंदाज़ में उन लोगों की तरफ बढ़ने लगे। फ्रेज़र के सिपाही उन सबको छोड़कर भाग चुके थे और वह बंद दरवाज़े के सामने क़ैद खड़े थे, इसलिए उनके पास कोई और चारा नहीं था सिवाय इसके कि किले की खाई में कूद पड़ें। डगलस बहुत बुरी तरह गिरा और उसका टखना टूट गया। उसके पीछे कूदे उसके लठैत लाखन ने उसकी मदद की। एक तरफ़ लाखन और दूसरी तरफ़ ज़ख़्मी और ख़ून बहते हचिन्सन के सहारे वह लंगड़ाता हुआ खाई में चलता लाहौरी दरवाज़े की तरफ बढ़ने लगा।

फ्रेज़र खाई में नहीं कूद पाया क्योंकि वह बहुत मोटा था। इसलिए वह बग्घी में सवार होकर भीड़ में घुस गया और उसे खुद ताज्जुब हुआ जब वह सही-सलामत उसमें से निकलकर दूसरी तरफ़ पहुंच गया। वहां से किले तक आधे मील की दूरी में उस पर कई सवारों ने हमला करना चाहा और गोलियां चलाई लेकिन उनका निशाना नहीं लगा और वह ख़ैरियत से किले के लाहौरी दरवाज़े पर पहुंच गया। वहां पादरी जेनिंग्स किले की सबसे ऊंची छतरी पर खड़ा दूरबीन से पूरे शहर का नज़ारा कर रहा था। उसकी बेटी ऐनी और उसकी दोस्त मिस क्लिफर्ड, जो दोनों फ्रेज़र के साथ गाती थीं, भी उसके पास खड़ी थीं।

लठैत माखन ने दोनों जख्मियों को खाई से निकाला। उसके बाद के उसके बयान में दर्ज है कि “डगलस ने जो ज्यादा जख्मी थे दर्खास्त की कि उनको ऊपर कुलियातखाने में ले जाया जाए, जब तक कि वह इस सदमे से उबर नहीं जाए। पादरी जेनिंग्स उनको देखने आए और उन्होंने और मि. हचिन्सन ने उनको दरवाज़े के ऊपर वाले कमरे में पहुंचाया।” वहां ऐनी और मिस क्लिफर्ड ने उनको बिस्तर पर लिटाया, उनको चाय दी और उनका टखना बांधा और हचिन्सन के ज़ख्मों की मरहम-पट्टी की ।

जब कप्तान डगलस को ऊपर ले जाया जा रहा था तो फ्रेज़र नीचे था और लाहौरी दरवाज़े की सुरक्षा व्यवस्था करने की फिक्र में था। उसने दरवाज़ा बंद करने का आदेश दिया और ज़फर को कहलवाया कि वह दो तोपें और एक हथियारबंद दस्ता भिजवा दें। उसने दो पालकियां भी मंगवाई ताकि मिस जेनिंग्स और मिस क्लिफर्ड को सुरक्षा से शाही जनानखाने में पहुंचा दिया जाए, “लेकिन वहां उस वक्त ऐसी अफरा-तफरी का आलम था कि ना ही गार्ड आए और ना ही पालकियां।”

उनके किसी आदेश की तामील नहीं हुई। किसी में आदेश मानने की इच्छा नहीं थी। बादशाह का अपना घराना भी बागी हो गया था और आदेश मानने को तैयार नहीं था। फ्रेज़र थोड़ी देर तो इंतज़ार करते रहे, फिर जब उन्होंने देखा कि किसी को उनके आदेश की परवाह नहीं है तो वह कैप्टन डगलस के कमरे की तरफ जाने के लिए मुड़े। उस वक़्त तक वहां बहुत मजमा हो गया था। उन्होंने उनको हट जाने का आदेश दिया। लाहौरी दरवाज़े पर देसी पैदल सवारों का एक दस्ता पहरा दे रहा था। उन्होंने उनको आदेश दिया कि दरवाज़ा बंद कर दें और अपनी बंदूकें तैयार रखें। उन्होंने ऐसा करने से इंकार कर दिया। फ्रेज़र साहब ने उनको बहुत सख्ती से डांटा, लेकिन वह ख़ामोश रहे।

“उस वक्त तक बाहर लोगों और लड़कों की एक बड़ी भीड़ इकट्ठी हो गई थी। उन्होंने यह देखकर कि अंदर क्या हो रहा है, बड़ी गुस्ताखी से तालियां बजाना शुरू कर दिया। फेजर ने जब लोगों में इतना विरोध देखा तो वह वापस कैप्टन डगलस के कमरों की तरफ मुड़ गए। जैसे ही वह जीने के नीचे पहुंचे, एक संगतराश ने जिसका नाम हाजी था, अपनी तलवार उठाकर उन पर वार करना चाहा। फ्रेज़र के हाथ में एक म्यान चढ़ी तलवार थी। वह गुस्से में मुड़े और उस पर म्यान चढ़ी तलवार से ही हमला किया और दरवाज़े के पहरेदारों ने हवलदार को आवाज़ दी कि यह सब क्या हो रहा है। हवलदार ने दिखावे के लिए भीड़ को हटाने की कोशिश की। लेकिन जैसे ही फ्रेज़र साहब की पीठ उसकी तरफ हुई उसने संगतराश को इशारा किया कि अब मौका है फिर से वार करने का। बस इस प्रोत्साहन की देर थी कि वह फ्रेज़र साहब पर लपका और उसने अपनी तलवार से एक ऐसा गहरा और घातक ज़ख्म उनकी गर्दन की दाई तरफ लगाया कि एक वह एकदम गिर पड़े। और तीन आदमी जो क़रीब की कोठरियों में छिपे हुए थे, फ़ौरन बाहर निकले और उनके सिर, सीने और चेहरे पर तलवारों से इतने जख्म लगाए कि उनकी वहीं मौत हो गई।

माखन की गवाही थी कि “मैं सीढ़ियों के ऊपर था और यह सब नीचे हो रहा था। “उसके बाद मजमा ऊपर चढ़ने लगा जहां पादरी जेनिंग्स, कैप्टन डगलस और हचिन्सन आराम कर रहे थे। उन्होंने उन तीनों और दोनों लड़कियों को भी मार डाला। पादरी जेनिंग्स ने उठकर एक दूसरे जीने से नीचे भागना चाहा लेकिन वह वहां पहुंचने से पहले ही मारे गए। जब मैं कैप्टन डगलस के कमरे में गया तो मैंने देखा कि उनमें अभी जान बाक़ी थी लेकिन बादशाह के एक बैरे मम्दू ने भी यह देख लिया और उसने उनके माथे पर इतनी ज़ोर से सोंटा मारा कि वह फौरन ख़त्म हो गए। दूसरे कमरे में मैंने दूसरे लोगों की लाशें पड़ी देखीं जिसमें दोनों लड़कियां भी थीं। एक कमरे में हचिन्सन साहब की लाश पड़ी थी। सबकी लाशें ज़मीन पर थीं सिवाय कैप्टन डगलस के जो बिस्तर पर पड़े थे। यह सारे कत्ल फ्रेज़र साहब की मौत के बाद पंद्रह मिनट के अंदर हुए। अब सुबह के नौ और दस के बीच का वक्त था।

कत्ल के बाद लोगों ने उनका सामान लूटना शुरू कर दिया। मुझे अपनी जान का ख़तरा था, इसलिए मैं शहर की तरफ अपने घर जाने के लिए भागा और फिर मैंने कभी किले का रुख नहीं किया। जब तक पादरी जेनिंग्स की मौत हुई, तब तक धर्मपरिवर्तन करने वाले उसके दो ख़ास चेले भी मारे जा चुके थे। डॉक्टर चमन लाल अपने दरियागंज वाले अस्पताल में मरीजों को देख रहे थे। उसी वक्त घुड़सवार सिपाहियों का पहला दस्ता राजघाट गेट से शहर अंदर घुसा। शोरो-गुल सुनकर वह अस्पताल से बाहर निकले कि मालूम करें क्या हो रहा है। सड़क पर खड़े कुछ लोगों ने उनकी तरफ़ इशारा किया। फौरन एक सवार उतरा और उनको गिराकर उनके सीने पर बैठ गया और पूछा कि उनका क्या मजहब है। जब डॉक्टर लाल ने जवाब दिया कि वह ईसाई हैं तो उसने पिस्तौल निकालकर उनको मार डाला। फिर उन सबने उनके अस्पताल को लूटा और उसमें आग लगा दी।

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