बनैटी

बनैटी एक लंबी छड़ी होती है जो दोनों सिरों पर छोटी-सी मुट्ठी की तरह गोल होती है। उसको बीच में से पकड़कर सभी दिशाओं में घुमाया जाता है ताकि कोई विरोधी पास न आ सके। तफ़रीह-तमाशे के लिए बनेटी के दोनों सिरों पर मिट्टी के तेल में भिगोकर कपड़ा बाँध दिया जाता है और उसमें आग लगाकर बनैटी को घुमाते हैं। बनैटी वाला बहुत देर तक जलती हुई बनैटी को अपने सिर के ऊपर, दाएँ-बाएँ और आगे-पीछे घुमाता है मगर शोलों की पहुँच से बिल्कुल सुरक्षित रहता है उस समय दिल्ली का शायद ही कोई जुलूस या मेला ऐसा हो, जिसमें बनैटी का करतब न दिखाया जाता हो। जहाँ बनेटी घुमाई जाती, बच्चों और बड़ों की एक भीड़ उसे देखने के लिए इकट्ठी हो जाती।

बॉक

बॉक भी इसी तरह का एक खेल या करतब है। इसमें धातु की एक सलाख इस्तेमाल की जाती जो पाँच फुट लंबी होती है। इसे बाँक कहते हैं और खिलाड़ी इसे भी चारों तरफ तेजी से घुमाकर प्रतिस्पर्धियों को दूर रखता है। हालाँकि बनैटी और बाँक पहले की तरह अब लोकप्रिय नहीं हैं, बल्कि मिटते जा रहे हैं, फिर भी किसी-किसी जुलूस में अभी तक उसका प्रदर्शन देखने में आ जाता है। अरना उछाल ( पलटा खाकर अपने कंधे से विरोधी के हाथ को टहोका देकर वार करना) इसके मशहूर दाँव थे।

गुलबाजी

गुलबाजी को आमतौर पर बच्चों का खेल समझा जाता है या बागों में माली गुलेल का इस्तेमाल करके परिन्दों को भगाते हैं ताकि वे दरख्तों के फल न उजाड़ें। लेकिन प्राचीन दिल्ली में बहुत से शौकीन लोगों ने गुलेल को एक कला या खेल के तौर पर अपना लिया था और इसे दुश्मनों के खिलाफ या शिकार करने के लिए इस्तेमाल किया। बहादुरशाह जफर का बेटा मिर्जा शाहरुख बहुत उम्दा शिकारी था। एक सुबह उसने आसमान में परिन्दों की एक डार अपनी तरफ आती हुई देखी । शहजादे ने निशाना बांधा और झुंड के आखिर में एक परिन्दे को गोली मारने ही वाला था कि उसने देखा कि वह परिन्दा अचानक फड़फड़ाया और जमीन पर गिरने लगा, क्योंकि इर्द-गिर्द कोई भी आदमी नज़र नहीं आया जिसने परिन्दे को गोली मारी हो। उसने हुक्म दिया कि उस आदमी की तलाश की जाए जिसने परिन्दे को मारकर नीचे गिराया है।

बादशाह के आदमी चारों तरफ दौड़े मगर उन्हें सिर्फ एक घसियारा उससे पूछने पर उसने स्वीकार किया कि उसने ही परिन्दे को मारा था। उसे शहजादे के पास ले जाया गया। शहजादे ने उसे हैरानी से देखा और पूछा, “लेकिन तुमने इसे कैसे मार गिराया, तुम्हारे पास न बंदूक है, न तीर-कमान ?” घसियारे ने हाथ जोड़कर जवाब दिया, “जनाब-ए-वाला, परिन्दों को मारने के लिए बंदूक या तीर-कमान की क्या जरूरत है ? उनके लिए तो सिर्फ एक गुलेल काफी है और यह रही मेरी गुलेल।

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