1700 ई. में कराया गया था निर्माण

कुतुब साहब का झरना उनकी दरगाह के पास है। पहले-पहल फीरोज शाह ने यहां एक बंध बनवाया था। चुनांचे झरने की दीवार वही बंध है, जो अब तक मौजूद है। हौज शम्सी का पानी रोककर नौलखी नाले में डाला गया। वहां से यही पानी तुगलकाबाद के किले में पहुंचाया गया था। कुछ अर्से के बाद वह किला वीरान हो गया और पानी वहां जाना बंद हो गया। हौज शम्सी का पानी इस बंध से निकलकर जंगल में बेकार जाने लगा तो 1700 ई. में नवाब गाजीउद्दीन खां फीरोजजंग ने इस बंध के आगे हौज और नहर, चादरें और फव्वारे बनवा दिए। बरसात के मौसम में अब भी हौज में पानी भर जाता है और चादर छूटने लगती है। फूल वालों की सैर के मौके पर यहां खूब बहार रहती है।

पश्चिम की ओर बंध की दीवार से लगा लाल पत्थर का एक सैदरा दालाल 17 फुट 3 इंच * 3 फुट 8 इंच का बना हुआ है। झरना इसी मकान को कहते हैं। दालान की छत लदाओ की है, जो साढ़े ग्यारह फुट ऊंची है। इसके आगे एक हौज बना हुआ है।

छत पर से लोग कूदते हैं और हौज में तैरते हैं। इस दालान की छत अंदर से खाली है, जिसके छज्जे के नीचे तेरह फव्वारे लगे हुए हैं। इस छत पर भी पानी चढ़ता था और फव्वारों में से धारें छूटकर हौज में गिरती थीं। इसके नीचे चिराग जलाने के ताक बनाए गए हैं। हौज 26 फुट मुरब्बा और साढ़े सात फुट गहरा है। इसका दहाना 1 फुट 7 इंच का है, जिसमें से इस हौज में पानी आता है। हौज के सामने एक नहर बाइस फुट लंबी, छह फुट चौड़ी और साढ़े तीन फुट गहरी बनी हुई है।

इस नहर का पानी चादर पर जाकर गिरता है। यही बड़ी चादर है। दो छोटी चादरें उत्तर और दक्षिण में आमने-सामने और हैं, जो ढाई फुट चौड़ी हैं और दो फुट की ऊंचाई से गिरती हैं। इन चादरों के आगे साढ़े तीन फुट लंबे मुनब्बतकारी के सलामी पत्थर लगा दिए गए हैं, जिनके खारों में मछली की तरह पानी जाता है। इन तीनों चादरों के सामने नहरें हैं।

बड़ी चादर के सामने की नहर बत्तीस फुट लंबी, छह फुट चौड़ी और फुट भर गहरी है। इस नहर के सामने लाल पत्थर का एक बारहदरा मंडवा 12 फुट X 9 फुट 6 इंच का बना हुआ है। सहन में कई प्रकार के वृक्ष लगे हुए हैं। छोटी नहरों के सामने की नहरें 151 फुट लंबी, 2 फुट 9 इंच चौड़ी और आठ इंच गहरी हैं। अब चादरें और फव्वारे टूट-फूट गए हैं और इस स्थान की एक कहानी ही शेष रह गई है।

उत्तर की और एक दोहरा दालान पुख्ता और संगीन बना हुआ है, जो 31 फुट 8 इंच लंबा और 24 फुट चौड़ा है। इस दालान को अकबर शाह सानी ने अपने जमाने (1806-37 ई.) में बनवाया था, जो अब भी मौजूद है। इससे मिला हुआ एक सैदरा 33 फुट 9 इंच x 11 फुट 9 इंच का और है।

दक्षिण की ओर एक सैदरा दालान है, जिसकी बगल में दो दर और हैं। इसे शाह जी के भाई सैयद मोहम्मद ने शाह आलम सानी (1759-1806 ई.) के काल में बनवाया था, जिसका निशान अब नहीं है। अलबत्ता बहादुर शाह ने (1837-57 ई.) में जो बारहदरी बनवाई थी, वह मौजूद है। पूर्व की ओर कोई मकान नहीं है, उधर पहाड़ है। मगर मोहम्मद शाह (1719-48 ई.) ने एक फिसलवां पत्थर जिस पर लोग फिसलते थे, वहां रखवा दिया था। यह पत्थर 18 फुट 3 इंच x 7 फुट 6 इंच का है। यह भी अब टूट गया है। यहीं पास में बहुत-से आम के वृक्ष हैं, जो ‘अमरखा’ मशहूर है। सैरे गुलफरोशों के वक्त इसमें झूले पड़ते हैं।

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