Modi_and_Trump_
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ट्रम्प की टैरिफ पॉलिसी और भारत-अमेरिका व्यापार का भविष्य”

Trump Tariff: अमेरिका ने 2025 में वैश्विक स्तर पर आयात शुल्क (टैरिफ़) बढ़ाकर व्यापार व्यवस्था को झकझोर दिया है। भारत के लिए स्थिति और जटिल है, क्योंकि कुछ भारतीय निर्यात श्रेणियों पर संयुक्त राज्य अमेरिका कुल मिलाकर 50% तक की प्रभावी दर लागू कर रहा है। यह कदम केवल काग़ज़ी कर-वसूली नहीं, बल्कि आपूर्ति शृंखलाओं, कंपनियों की लागत और कूटनीतिक समीकरणों को एकसाथ प्रभावित करता है। ऐसे परिदृश्य में भारत को शोर से ज़्यादा ठोस डेटा, सूक्ष्म रणनीति और शांत कूटनीति—की ज़रूरत है।

यह लेख उसी दृष्टिकोण से अमेरिकी टैरिफ़ की राजनीति, उसके आर्थिक असर और भारत के लिए संभावित रास्तों की परत-दर-परत समीक्षा करता है।

क्या बदल रहा है: टैरिफ़ का नया भूगोल

2025 की घोषणाओं के बाद अमेरिका ने कई साझेदार देशों पर अतिरिक्त आयात शुल्क लागू/विस्तारित किए हैं। भारत के संदर्भ में, दवा और स्मार्टफ़ोन जैसे रणनीतिक/उपभोक्ता-सेक्टर अपेक्षाकृत सुरक्षित दिखते हैं, जबकि वस्त्र, चमड़ा, रत्न-आभूषण और कुछ ऑटो-पुर्ज़े जैसी श्रेणियाँ उच्च दर के जोखिम क्षेत्र में हैं। औसत टैरिफ़ स्तर में व्यापक वृद्धि से वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएँ रास्ता बदल रही हैं—जहाँ संभव हो, कंपनियाँ स्रोत देशों, बिलिंग लोकेशनों और वैल्यू-एडिशन की भूगोलिका में त्वरित सुधार कर रही हैं।

यह बदलाव केवल व्यापारिक नहीं है; यह राजनीतिक अर्थशास्त्र का बयान है। टैरिफ़ को ‘राष्ट्रीय हित’ और ‘फेयर ट्रेड’ के नारे के साथ घरेलू राजनीति में पेश किया जा रहा है—भले ही उसकी वास्तविक लागत अमेरिकी उपभोक्ता तक पहुँचती हो।

ट्रंप की राजनीतिक अर्थव्यवस्था: बजट गणित बनाम टैरिफ़ की हक़ीक़त

वर्तमान अमेरिकी एजेंडा का एक बड़ा स्तंभ कर-कटौती (टैक्स कट्स) का विस्तार है, जिसका आकार ट्रिलियन डॉलर में आँका जा रहा है। उसके मुकाबले टैरिफ़-राजस्व सीमित है और वह भी कई ‘लीकेज’ (जैसे सप्लाई-चेन रीरूटिंग, टैरिफ़-शॉपिंग, मुद्रा-समायोजन) की वजह से कम पड़ जाता है।

  • राजस्व का भ्रम बनाम वास्तविकता: सार्वभौमिक/व्यापक टैरिफ़ से राजस्व बढ़ता है, लेकिन उतने पैसों से घरेलू कर-कटौती का पूरा बोझ उठाना संभव नहीं दिखता। नीति-निर्माताओं के लिए यह एक राजनीतिक ‘सेल्स पिच’ हो सकता है, मगर मैक्रो-लेवल पर बजट-घाटा और ऋण-प्रबंधन की चुनौती बनी रहती है।
  • घरेलू कीमतों पर असर: टैरिफ़ का एक हिस्सा कंपनियाँ सोख लेती हैं, पर बड़ा हिस्सा अंततः उपभोक्ताओं तक स्थानांतरित होता है। परिणाम: टिकाऊ उपभोक्ता सामान से लेकर किराने तक—कई श्रेणियों में चिपचिपी महँगाई का जोखिम।

निष्कर्ष यह कि टैरिफ़, अमेरिकी राजनीतिक विमर्श में ‘रेवेन्यू जेनरेटर’ और ‘जॉब-प्रोटेक्टर’ की तरह प्रस्तुत किए जा सकते हैं, पर आर्थिक दृष्टि से वे कर-कटौती का विकल्प नहीं, बल्कि अलग किस्म का कर हैं—जिसका बोझ अंततः उपभोक्ता और निर्यातक साझेदार उठाते हैं।

donald trump
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आपूर्ति शृंखला, मुद्रा और ‘टैरिफ़-शॉपिंग’ का गणित

टैरिफ़ से बचने/उसका असर घटाने के लिए कंपनियाँ तीन प्रमुख रास्ते अपनाती हैं:

  1. रीरूटिंग एवं वैल्यू-एडिशन: मूल देश की ‘रूल्स ऑफ ऑरिजिन’ शर्तें पूरी करने हेतु तृतीय देशों में आंशिक प्रोसेसिंग/असेंबली कराई जाती है।
  2. मुद्रा-समायोजन (एक्सचेंज-रेट पास-थ्रू): निर्यातक देश अपनी मुद्रा को बाज़ार-बलों या नीतिगत संकेतों के ज़रिए प्रतिस्पर्धी बनाए रखने की कोशिश करते हैं, जिससे टैरिफ़ का कुछ हिस्सा ऑफ़सेट हो सके।
  3. लॉन्च-सीक्वेंस और प्राइसिंग स्ट्रैटेजी: नई प्रोडक्ट लाइनों/मॉडलों की अमेरिका-लॉन्च टाइमिंग या पैकेजिंग बदलकर टैरिफ़ के पीक-इम्पैक्ट को टाला जाता है।

इन तीनों का परिणाम यह है कि टैरिफ़ का अपेक्षित राजस्व और घरेलू संरक्षण का लक्ष्य पूरी तरह हासिल नहीं होता; जबकि आपूर्ति शृंखलाओं में अव्यवस्था और लागत-प्रशासन बढ़ जाता है।

श्रम-बाज़ार की पहेली: प्रवासन नीति, वेतन-लागत और उत्पादन

अमेरिकी श्रम-बाज़ार 2025 में विरोधाभासों से भरा है—एक ओर लंबे समय से चले आ रहे प्रवासन-सख्ती के सिग्नल, दूसरी ओर कुछ क्षेत्रों में प्रवर्तन-ढील की ख़बरें; एक ओर ‘मेड-इन-अमेरिका’ का जोर, दूसरी ओर कुशल/अकुशल श्रमिकों की उपलब्धता की वास्तविक चुनौतियाँ।

  • क़ीमतों का द्वंद्व: जब इनपुट-लागत (उच्च टैरिफ़ के कारण) और मज़दूरी-क़ीमतें दोनों बढ़ती हैं, तो निर्माता या तो उत्पादन घटाते हैं, या प्राइस-हाइक करते हैं, या फिर उत्पादन का कुछ हिस्सा पड़ोसी/मित्र देशों में शिफ्ट करते हैं।
  • उद्योग-विशिष्ट असर: कृषि-प्रसंस्करण, निर्माण, ऑटो-पुर्ज़े, रिटेल-लॉजिस्टिक्स—इन सेक्टरों में श्रम-उपलब्धता और लागत, मुनाफ़े तथा उपभोक्ता-मूल्य के बीच मुश्किल संतुलन पैदा करती है।

यह उलझन बताती है कि केवल टैरिफ़ बढ़ाना ही विनिर्माण-रोज़गार नहीं लौटा सकता; उत्पादकता, कौशल, पूँजी-निर्माण और श्रम-गतिशीलता जैसे स्ट्रक्चरल तत्वों पर भी बराबर काम ज़रूरी है।

उद्योग-विश्लेषण: ऑटो से फ़ूड तक—कौन कितना प्रभावित?

ऑटो और परिवहन: अमेरिकी ऑटोमेकर्स पर इनपुट-लागत का दबाव बढ़ा है। बैटरी, इलेक्ट्रॉनिक्स और धातु-संबंधित पुर्ज़ों पर ऊँचे टैरिफ़ ने लागत-वक्र ऊपर धकेला है। इसके समानांतर, यूरोप/जापान जैसे साझेदारों के लिए टैरिफ़-रेट अपेक्षाकृत कम रहने से प्रतिस्पर्धात्मक असंतुलन पैदा होता है। परिणाम—या तो प्राइसिंग बढ़ती है, या प्रॉडक्ट-मिक्स और सोर्सिंग में तेज़ बदलाव आते हैं।

खाद्यान्न और रोज़मर्रा की कीमतें: आयातित खाद्य, पैकेजिंग-इनपुट, और लॉजिस्टिक्स पर असर का समेकित परिणाम रिटेल-प्लेटफ़ॉर्म पर नज़र आता है। कई श्रेणियों में प्रतिस्पर्धी आयात महँगा पड़ने से उपभोक्ता के विकल्प घटते हैं और स्थानीय सप्लायर प्राइसिंग-पावर हासिल कर लेते हैं।

रिटेल और ई-कॉमर्स: दे-मीनीमिस (छोटे मूल्य के पार्सल पर कर-छूट) जैसे नियमों में कसावट से क्रॉस-बॉर्डर ई-कॉमर्स की लागत बढ़ती है। ब्रांड और प्लेटफ़ॉर्म अब शिपिंग-सेंटर्स और फुलफ़िलमेंट-नेटवर्क को नए सिरे से डिज़ाइन कर रहे हैं।

भारत-विशेष: जोखिम, अवसर और तात्कालिक कदम

(क) जोखिम का मानचित्र

  • वस्त्र और परिधान: अमेरिका भारत के लिए बड़ा बाज़ार है। ऊँचे टैरिफ़ का सीधा असर ऑर्डरबुक, मुनाफ़े और रोजगार पर पड़ सकता है—खासकर सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSME) क्लस्टरों में।
  • रत्न-आभूषण: उच्च मूल्य-वर्धित लेकिन पतले मार्जिन—50% तक की प्रभावी दर मांग को झटका दे सकती है। वैकल्पिक बिलिंग-लोकेशन (जैसे यूएई) के ज़रिए वैल्यू-एडिशन की वैध रणनीतियाँ तलाशनी पड़ सकती हैं।
  • चमड़ा और फ़ुटवेयर: पर्यावरणीय अनुपालन/ट्रेसेबिलिटी की वैश्विक मांग के साथ ऊँचे टैरिफ़ मिलकर प्रतिस्पर्धा और कठिन बना देंगे।
  • ऑटो-पुर्ज़े: खासतौर पर कमर्शियल-व्हीकल पार्ट्स—यदि उच्च दर के दायरे में रहे—तो B2B एक्सपोर्ट ऑर्डर्स पर दबाव संभव है।

(ख) कहाँ ‘राहत’ दिखती है

  • फ़ार्मास्यूटिकल्स और स्मार्टफ़ोन/इलेक्ट्रॉनिक्स की कुछ श्रेणियाँ: वर्तमान संकेतों में ये अपेक्षाकृत सुरक्षित हैं; भारत की ‘फ़ार्मा-सप्लाई’ और स्मार्टफ़ोन वैल्यू-चेन में वैकल्पिकता बनाए रखना अमेरिकी बाज़ार के लिए भी उपयोगी है।
  • ऊर्जा और नवीकरणीय: ऊर्जा-सुरक्षा एवं हरित-लक्ष्यों की वजह से यहाँ अपेक्षाकृत प्रोटेक्शन कम देखने को मिल सकता है।

(ग) तुरंत (0–6 माह) उठाने योग्य कदम

  1. एक्सपोज़र ऑडिट: HS-कोड स्तर पर अमेरिकी बिक्री, मार्जिन, और टैरिफ़-पास-थ्रू की क्षमता का आकलन—क्लाइंट/डिस्ट्रिब्यूटर के साथ मिलकर।
  2. ऑर्डर-रीनेगोशिएशन: इन्कोटर्म्स, री-प्राइसिंग और ‘टैरिफ़-शेयरिंग क्लॉज़’ जोड़ना; जहाँ संभव हो, आंशिक लागत ग्राहकों तक पास-थ्रू।
  3. रूल्स ऑफ ऑरिजिन अनुपालन: वैध वैल्यू-एडिशन को तीसरे देशों में शिफ्ट करने पर स्पष्ट दस्तावेज़ीकरण; किसी भी प्रकार की ‘राउंड-ट्रिपिंग’ से बचें।
  4. मुद्रा-हिजिंग: निर्यातकों/आयातकों के लिए फॉरवर्ड/ऑप्शंस; विशेषकर उन श्रेणियों में जहाँ डॉलर-इनवॉयसिंग है।
  5. विकल्प बाज़ारों की टेस्टिंग: EU, UK, खाड़ी, अफ्रीका और ASEAN के बड़े खरीदारों के साथ ‘पायलट शिपमेंट’ और ‘टेस्ट-मार्केटिंग’।
  6. ट्रेड फ़ाइनेंस: वर्किंग कैपिटल पर टैरिफ़-सम्बन्धी दबाव के कारण फैक्टोरिंग/पोस्ट-शिपमेंट क्रेडिट की अग्रिम व्यवस्था।

(घ) 6–24 माह की रणनीतिक दिशा

  • उत्पाद-विविधीकरण: उच्च-टैरिफ़ श्रेणियों से अधिक वैल्यू-ऐडेड/निच कैटेगरी में संक्रमण—फ़ंक्शनल टेक्सटाइल्स, ब्रांडेड ज्वेलरी, सर्टिफ़ाइड लेदर गुड्स, प्रीमियम ऑटो-पार्ट्स।
  • मार्केट-रीबैलेंसिंग: अमेरिका-केंद्रित पोर्टफ़ोलियो में यूरोप/यूके/एशिया-पैसिफ़िक की हिस्सेदारी बढ़ाना; लॉन्ग-टर्म कॉन्ट्रैक्ट्स के ज़रिए वॉल्यूम-स्टेबिलिटी।
  • डिजिटल-प्रोक्योरमेंट और ट्रेसबिलिटी: ESG और अनुपालन को प्रतिस्पर्धात्मक लाभ बनाना—ब्लॉकचेन-आधारित सप्लाई-ट्रेस, रीसायक्ल्ड मैटेरियल प्रमाणन, लेबर-स्टैंडर्ड्स।
  • नीतिगत संवाद: अमेरिकी उद्योग-एसोसिएशन्स, रिटेल-लॉबी और स्टेट-स्तरीय चैंबर्स के साथ एविडेंस-बेस्ड एंगेजमेंट, ताकि मैक्रो-स्तर की सख़्ती में सूक्ष्म-स्तर के अपवाद (carve-outs) सम्भव हों।

कूटनीति बनाम अर्थशास्त्र: संकेत, प्रतीक और वास्तविकता

टैरिफ़ केवल आर्थिक उपकरण नहीं, कूटनीतिक संकेत भी है। 19वीं सदी के ‘टैरिफ़ युग’ की याद ताज़ा करने वाली बयानबाज़ी घरेलू राजनीतिक आधार को सुदृढ़ करती है, पर बाहरी दुनिया को यह संकेत भी देती है कि अमेरिका बहुपक्षीय नियमों से अधिक ‘राष्ट्र-हित’ को प्राथमिकता दे रहा है।

भारत का विकल्प:

  • अतिप्रतिक्रिया से बचाव: tit-for-tat कदमों से दोनों ओर की लागत बढ़ेगी—और वैश्विक निवेशक-भावना को नुकसान होगा।
  • वैकल्पिक साझेदारियाँ: यूरोपीय संघ, यूके, खाड़ी, अफ्रीका और एशिया में द्विपक्षीय/क्षेत्रीय सहभागिताएँ—जहाँ टैरिफ़ जोखिम कम और बाज़ार बढ़ते हुए।
  • विवाद-निपटान और संवाद: WTO/FTA फ्रेमवर्क के भीतर शांति-पूर्वक समाधान की कोशिश; साथ ही अमेरिकी पॉलिसी-सिस्टम के ‘वेटो-पॉइंट्स’—कांग्रेस, राज्य-स्तर, उद्योग-समूह—के साथ लक्षित संचार।

क्या रूस-तेल कम करने से टैरिफ़ टल जाएंगे?

यह एक कठिन प्रश्न है। व्यवहार में, भारतीय रिफ़ाइनर रूस-उत्पत्ति कच्चे तेल पर निर्भरता घटा भी दें, तो भी यह सुनिश्चित नहीं कि अमेरिकी टैरिफ़-रणनीति शिथिल हो जाएगी—क्योंकि टैरिफ़ अब केवल ‘ऊर्जा’ का सवाल नहीं, बल्कि व्यापक ‘जियोपॉलिटिकल सिग्नलिंग’ का उपकरण बन चुका है। अतः भारत को ऊर्जा-सुरक्षा, लागत-लाभ और कूटनीति—तीनों के बीच संतुलन साधते हुए चरणबद्ध/डेटा-चालित समायोजन करना होगा।

अमेरिकी राजनीति का ऐतिहासिक संदर्भ: ‘टैरिफ़-मैन’ की विरासत

अमेरिकी इतिहास में भी उच्च टैरिफ़ के दौर रहे हैं—जिन्हें बाद में ‘वैश्वीकरण’ की धार ने पतला कर दिया। आज जब ‘सुरक्षा’, ‘रोज़गार’ और ‘रेवेन्यू’—तीनों की बहस नए सिरे से उठी है, तो यह समझना ज़रूरी है कि 19वीं सदी के टैरिफ़-युग ने कुल मिलाकर कीमतें बढ़ाईं, संसाधनों का पुनर्वितरण किया और अंततः अमेरिका को खुले बाज़ारों की ओर लौटना पड़ा। यही कारण है कि आज भी ऊँचे टैरिफ़ किसी स्थायी नीति-समाधान के बजाय, अक्सर एक ‘राजनीतिक औज़ार’ के रूप में सामने आते हैं।

भारत के लिए 12-सूत्री नीति-रोडमैप

  1. HS-कोड माइक्रो-मैपिंग: प्रत्येक उत्पाद-लाइन का अमेरिकी टैरिफ़-इम्पैक्ट (ड्यूटी + नॉन-टैरिफ़) कोड-स्तर पर मैप करें।
  2. कॉन्ट्रैक्चुअल क्लॉज़ेज़: नए/रिन्यू हो रहे अनुबंधों में ‘टैरिफ़-एडजस्टमेंट’ और ‘फोर्स मेज़र’ जैसे प्रावधान जोड़ें।
  3. मूल-नियम (RoO) मास्टरी: वैध वैल्यू-एडिशन के लिए तीसरे देशों के साथ उत्पादन-साझेदारी; कंप्लायंस दस्तावेज़ मज़बूत करें।
  4. वित्तीय-हिजिंग: डॉलर-एक्सपोज़र, कमोडिटी और फ़्रेट—तीनों पर हिजिंग टूलकिट।
  5. लॉजिस्टिक्स-रीडिज़ाइन: ‘नियर-शोरिंग’/‘फ्रेंड-शोरिंग’ पार्टनर्स के साथ मल्टी-नोड सप्लाई-नेटवर्क।
  6. बाज़ार-विविधीकरण: EU/UK/ASEAN/खाड़ी/अफ़्रीका में की-डिस्ट्रीब्यूटर्स के साथ दीर्घकालीन करार।
  7. ESG-एज़-ए-स्ट्रैटेजी: कार्बन-फ़ुटप्रिंट, श्रम-अनुपालन और ट्रेसबिलिटी को सेलिंग-पॉइंट बनाएं।
  8. नीतिगत एंगेजमेंट: अमेरिकी उद्योग-संघों और स्टेट-गवर्नमेंट्स के साथ डेटा-समर्थित संवाद; जहाँ संभव हो, कार्व-आउट्स और छूट के लिए केस बनाएं।
  9. एक्सपोर्ट-क्रेडिट/PLI सिंक: घरेलू प्रोत्साहनों (PLI/ECGC/EXIM) को जोखिमग्रस्त श्रेणियों के साथ बेहतर सिंक करें।
  10. एमएसएमई-क्लस्टर सपोर्ट: वर्किंग-कैपिटल, अपस्किलिंग और क्वालिटी-अपग्रेड के लिए लक्षित योजनाएँ।
  11. कूटनीतिक संतुलन: सार्वजनिक बयानबाज़ी में संयम; बैक-चैनल पर प्रगमैटिक सौदेबाज़ी।
  12. समय-खंड रणनीति: निकट-काल (0–6 माह) में नुकसान सीमित करना; मध्यम-काल (6–24 माह) में री-ओरिएंटेशन; दीर्घ-काल (2028 तक) में अवसरों की नई परिभाषा।

संचार-रणनीति: ‘सामरिक प्रशंसा’ और व्यावहारिक समाधान

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अनेक बार ‘टोन’ ही संदेश होता है। उग्र सार्वजनिक प्रतिक्रिया से अधिक लाभ अक्सर ठोस, शांत और तथ्यों-आधारित संवाद से मिलता है। नीति-संदेशों में ‘सामरिक प्रशंसा’—जहाँ उचित हो—शामिल करने से बातचीत की खिड़की खुली रहती है, जिससे व्यापार-विशेष अपवाद (sectoral exemptions) पाने की संभावना बढ़ती है।

विवेक, धैर्य और डेटा ही ढाल

ऊँचे टैरिफ़ अमेरिका के लिए भी महँगे सौदे साबित हो सकते हैं: उपभोक्ता-मूल्य, कंपनियों की लागत और बजट-घाटा—तीनों पर दबाव पड़ता है। भारत के लिए सर्वश्रेष्ठ रणनीति भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि सुविचारित, चरणबद्ध और डेटा-समर्थित नीति-मिश्रण है—जहाँ व्यापार-विविधीकरण, वैध वैल्यू-एडिशन, अनुबंध-प्रबंधन, वित्तीय-हिजिंग और लक्षित कूटनीति साथ-साथ चलें। निकट-काल में उद्देश्य नुकसान घटाना है; मध्यम-काल में अवसरों को पुनर्परिभाषित करना; और दीर्घ-काल में नई वैश्विक व्यवस्था में ऐसी जगह बनाना जहाँ भारतीय उद्योग अधिक प्रतिस्पर्धी, लोचदार और नवोन्मेषी हो।

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