राजभवन की सीमा रेखा लांघने की कोशिश

आज दिल्ली देश की राजधानी है। कभी हस्तिनापुर की राजधानी इंद्रप्रस्थ हुआ करता था, जो अब दिल्ली के नाम से जाना जाता है। महारथियों से भरे हस्तिनापुर के राजभवन में द्रौपदी का चीरहरण हुआ था। उसी इंद्रप्रस्थ दिल्ली के राजभवन में उच्च पदस्थ अधिकारियों के बीच मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता पर जानलेवा हमला हुआ। न तो उस “द्रौपदी” ने पापियों को माफ किया था, न ये “द्रौपदी” षडयंत्र में शामिल अधर्मियों को कभी माफ़ करेगी। इतिहास में कई घटनाए कुछ कालखंड के बाद समानांतर चल पड़ती हैं। बस समय के साथ पात्र और परिस्थितियां बदल जाती है।
राजभवन की सीमा रेखा लांघने की कोशिश
शरीर पर लगे घाव, वक़्त के साथ भर जाते हैं, पर आत्मा पर लगे घाव…ताउम्र नहीं भरते। समय के साथ रिसते रहते हैं। बाद में यही घाव, महाभारत का कारण बनते हैं। दिल्ली की मुख्यमंत्री पर हमला मतलब…सीधा राजधानी पर हमला!… संविधान पर हमला!… कानून पर हमला!… दिल्ली की जनता पर हमला!…सुरक्षा में तैनात दिल्ली पुलिस की साख़ पर हमला! यह मर्यादा की “लक्ष्मण रेखा”पर हमला था… नारी की लाज़ पर हमला था… उसकी अस्मिता पर हमला था। यह महिला के गौरव पर हमला था, जो दिल्ली की लाज़ बचाने के लिए रोज़ाना राजधानी का दौरा कर रही थी। सीएम हाउस में बैठकर ख़ुद जनता की फ़रियाद से रूबरू हो रही थी। प्रजा को राजा से जोड़ रही थी। विधानसभा में अपने विरोधियों को बड़े ही सलीके से पटखनी देकर, उनके दुस्साहस को चकनाचूर कर रही थी। उसकी यश-कीर्ति बढ़ रही थी। राजधानी में जय-जयकार हो रही थी। पर विधर्मियों को यह सबकुछ कांटे की तरह चुभ रहा था और उन्होंने एक नए दुशासन के साथ मिलकर भरे राजभवन में इस “रेखा” को मिटाने की जी तोड़ कोशिश की। पर ये ‘रेखा’ मिट न सकी अमिट हो गई!
साज़िश-षडयंत्र की अनसुलझी दास्तां…
आख़िरकार ये हिमाकत किसने की? ये किसकी मंशा थी? इसके पीछे कैसा षडयंत्र छुपा था? जिस मुख्यमंत्री पद की गरिमा को पिछली सरकार ने नशे में डुबो दिया था। उस पद की गरिमा को ऊंचा उठाने में जुटी, इस महिला से भला किसकी दुश्मनी हो सकती थी? धूर्तता के इस चौपड़ पर पासे फेंकने वाला वो शकुनि कौन था, जिसने द्रौपदी के इस चीरहरण की नींव रखी? क्या वो भूल गया था कि अपमानित स्त्री, काली नागिन से ज़्यादा ख़तरनाक होती है?

डोल उठा सिंहासन…छोड़ गया कुछ सवाल
अफ़वाहों के ब़ाज़ार में ख़बरों के पीछे की सच्चाई कई बार छुप जाती है। जो बाहर निकलकर आतीं हैं, उसमें सच ढूढ़ना बड़ा मुश्किल होता है। हमलावर को उसी दिन गिरफ़्तार कर लिया गया था। उसका नाम राजेश खिमजी सकारिया है, जो गुजरात के राजकोट का हिस्ट्रीशीटर है। उसकी लंबी अपराधिक फेहरिस्त है। इस मामले में हमलावर राजेश के दोस्त तहसीन को भी पकड़ लिया गया। उसे भी सीएम को मारने की साज़िश रचने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। पहले तो राजेश को शिवभक्त और डॉग लवर बताया गया। वह आवारा कुत्तों को शेल्टर होम में बंद करने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले से दुखी था। पर अब कहा जा रहा है कि उसकी मंशा मुख्यमंत्री को चाकू मारने की थी, लेकिन सिक्योरिटी को देखते हुए उसने अपना प्लॉन बदल दिया था। हंसी आती है, ऐसी सूचनाओं पर। फिर तो उसे कोर्ट में जाकर हमला करना चाहिए था? उस जज को पीटना चाहिए, जिसने यह फैसला दिया था। उसने रेखा गुप्ता पर हमला क्यों किया? कुत्तों के लेकर हमला ही करना था, तो उसने गुजरात के सीएम पर हमला क्यूं नहीं किया? उसे दिल्ली आने की क्या जरूरत थी? पशु प्रेमी और शिवभक्त वाली थ्यौरी पब्लिक को भटकाने जैसी लगती है। असल बात कुछ और है। आइने के सामने कोई और था, पीछे कोई और है।
सुरक्षा में बड़ी सेंध! गुटबाजी–भीतरघात का विभीषण कौन?
महिला मुख्यमंत्री की सादगी और उनकी विनम्र मुस्कान विरोधियों को कांटे की तरह चुभ रही थी। उनकी लोकप्रियता को पचा पाना उनके लिए नागवार था। दशकों तक सत्ता का सुख भोगने के बाद अचानक शासन से बेदखली, उनकी रातों की नींद उड़ा दी थी। उधर दिल्ली चुनाव का रिजल्ट आने के बाद मुख्यमंत्री के नाम को लेकर हो रही देरी से बीजेपी के भीतर की गुटबाजी उजागर हो चुकी थी। कोई तो विभीषण था, जिसके भेद से यह घिनौता कांड अंजाम दिया गया। पुरुष प्रधान समाज में आज भी महिला नेतृत्व सहज़ स्वीकार नहीं है। इतिहास गवाह है गुलाम वंश की शासक रज़िया सुल्तान की हत्या उसी के अपने सैनिकों ने की थी। लेकिन रेखा… रज़िया सुल्तान नहीं हैं। ये कलयुग की द्रौपदी हैं! जिसके केश बंधे हैं, आंखों में प्रतिशोध की ज्वाला है और अभी भी शासन की बागडोर उन्हीं के हाथों में है।
धर्म का घंटा बांधने की बजाय न्याय का घंटा बांधने की जरूरत
यह कटु सच है कि किसी को जितना ज़लील करने और गिराने के षड़यंत्र हुए हैं, वह व्यक्ति समय के साथ उतना ही मज़बूत योद्धा साबित हुआ है। जनता ने उसे दिल से चाहा है और अपने आशीष से नवाज़कर दोब़ारा सत्ता की बागडोर सौंपी है। राजमुकुट के शाही दरबार में हर युग में गुटबाज़ी हुई हैं। राजा की ताकत छीनने, उसके आत्मसम्मान को गिराने, उसका मनोबल तोड़ने के लिए कई पैंतरे आज़माए गए हैं। वो पहले जितने धारदार थे, अभी भी वो उतने ही तीक्ष्ण हैं। यह राजनीति का ही एक मनोवैज्ञानिक अस्त्र है। सामने वाले व्यक्ति को इतना डरा दो कि वो सही से अपना काम ही न कर पाए। मन की शक्ति डगमगा जाए और पांव के नीचे की ज़मीन खिसक जाए। लेकिन राजशाही शासन में कठोर दंड का प्रावधान था। जनता अपराध करने से डरती थी। राजदंड ही राजा के शासन का इक़बाल बुलंद करता था। आज यह दंड कोर्ट-कचहरी और तारीखों में उलझकर कमजोर पड़ चुका है।
विगत कई वर्षों से धर्म का घंटा मंदिरों में ख़ूब ज़ोरोंशोरों से बांधा जा रहा है। लेकिन आज़ देश के हर चौराहों पर क़ानून का डंडा और न्याय का घंटा बांधने जरूरत है। जब तक सरकार का इक़बाल… फ़रमान बनकर लागू नहीं होगा, तबतक शोहदों के ज़िस्म के भीतर डर से सिहरन पैदा नहीं होगी। दो टके के लफंगे… कानून को अपने हाथों में लेते रहेंगे। दुर्योधन-दु:शासन के रक्तबीज फिर से ज़ी उठेंगे। ऐसी घिनौनी घटनाएं बार-बार दोहराई जायेंगी और देश में किसी न किसी नए महाभारत के युद्ध की नींव रखी जाएगी।
(नोट: यह लेखक के निजी विचार हैं)
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