बहादुर शाह जफर कैसे मनाते थे हिंदू त्योहार

अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर के शासन में हिंदूओं की स्थिति कैसी थी! उनका रहन सहन कैसा था। यह जानने के लिए लाल किले की डायरी की तरफ रुख करना होगा। किले की डायरी में दर्ज है कि जफर बहुत शौक से होली खेलते और अपने दरबारियों, बीवियों को रंगों में भिगो देते।

इस जश्न का आरंभ वह सात कुंओं के पानी में नहाने के बाद शुरू करते थे। दशहरे के त्योहार पर जफर के सब हिंदू अफसरों को नजर और तोहफे मिलते थे और शाही अस्तबल में घोड़ों को रंगा जाता था। शाम को जफर रामलीला का जश्न देखते जिसमें हिंदू भगवान राम बुराई यानी रावण को शिकस्त देते और फिर रावण और उसके भाईयों के पुतले जलाये जाते।”

जफर ने रामलीला के जुलूस का रास्ता बदल दिया था ताकि वह पूरे किले की चारदीवारी से गुजरे और सब उसकी शान देख सकें। दीवाली के दिन जफर को सात किस्म के अनाजों और सोने और चांदी में तौला जाता था और फिर सब गरीबों में बांट दिया जाता था।

फूलवालों की सैर का मेला हर साल महरौली में कुतुब साहब की दरगाह पर और पुराने जोग माया मंदिर में मनाया जाता था। जफर ने ऐलान कर दिया कि अगर वह पंखों के साथ जोग माया मंदिर में न जा सके तो दरगाह पर भी नहीं जाएंगे।”

गालिब की तरह जफर भी संकीर्ण मौलवियों को नापसंद करते थे। एक शाम किले में कादिर बख़्श नाम के एक अभिनेता ने बादशाह की मौजूदगी में एक मौलवी की ऐसी नकुल की कि उन्होंने बहुत लुत्फ लिया और अपने ख़्वाजासरा महबूब अली खां से कहा कि उसको इनाम दिया जाए।

दिल्ली के उलमा ने भी दरबार की नफरत का जवाब दिया। सर सैयद अहमद खां कहते हैं कि दिल्ली के मौलवी और उनके मानने वाले बादशाह हो बेदीन समझते थे।

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