बहादुर शाह जफर को रात के खाने में मिर्च पसंद थी, जो वह साढ़े दस बजे रात को खाते थे जब ज़्यादातर अंग्रेज़ अपने बिस्तरों में लेट चुके होते। बटेर का कोरमा, हिरन का गोश्त, शीरमाल, यखनी, मछली के कबाब और संतरों का सालन उनके पसंदीदा थे।

दावत के मौके पर लाल किले के बावर्ची तरह-तरह के मुग़लई खाने बड़ी तादाद में तैयार करते। बज़्मे आखिर में एक दावत का जिक्र है जिसमें पच्चीस किस्म की रोटियां, पच्चीस पुलाव और बिरयानी, पैंतीस किस्म के सालन और कोरमे और पचास तरह की मिठाईयां और साथ में घी अचार, चटनियां और मुरब्बे शामिल थे। और यह सब गजलों की तान और साजों की झंकार के साथ खाया जाता और संदल, जाफरान और इत्र से महकी फिजा में।  

जफर जो भी खाते थे उसको खूब मसालेदार और चटपटा पसंद करते। वह बहुत खफा हुए जब उनके दोस्त और वजीरे-आजम अहसनुल्लाह खां ने उनके लाल मिर्च खाने पर पाबंदी लगा दी। जब अगस्त 1852 में उनको बराबर खाना हज़म न होने की शिकायत हुई और ज़फ़र को अपना खास पसंदीदा आम का मुरब्बा भी खाना मना हो गया क्योंकि हकीम साहब का कहना था कि उसे ज़्यादा खाने से दस्त आने लगते हैं।”

जफर ने उनकी राय को नरअंदाज कर दिया और उसी तरह मुरब्बा खाते रहे और फिर उनको दस्तों का दौरा पड़ा तो हकीम बहुत खफा हुए और उन्होंने कहा कि अगर जफर इसी तरह उनकी बात नहीं मानेंगे तो उनको बर्खास्त कर दिया जाए। जफर ने माफी चाही और वादा किया कि आगे से वह ज़्यादा परहेज करेंगे।

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