मुगल खानदान का यह तीसरा बादशाह था। इसने 1556 ई. से 1605 ई. तक 50 साल हुकूमत की। गद्दी पर बैठने के वक्त इसकी उम्र 13 वर्ष की थी। अकबर खुद पढ़ा-लिखा नहीं था, मगर दूसरों से पुस्तकें पढवाकर सुना करता था। उसने एक बहुत बड़ा पुस्तकालय बनवाया था. जिसमें 24,000 हस्तलिखित पुस्तकें जमा थीं।

इनकी कीमत का अनुमान साढ़े पैसठ लाख रुपये किया गया था। इसको चित्रकारी का भी बड़ा शौक था और गायन विद्या का भी विख्यात गायनाचार्य तानसेन इसी के काल में हुए हैं। अकबर को इमारतें तामीर करवाने का भी बड़ा शौक था। फतेहपुर सीकरी की इमारतें और आगरा का लाल किला तथा सिकंदरा में इसका मकबरा खास इमारतें हैं जो इसके शौक को बताती हैं। दिल्ली में इसने कोई खास इमारत नहीं बनवाई। वो इमारतें इसके काल में बनीं, वे हैं- (1) हुमायूँ का मकबरा, (2) खैर-उल-मनाजिल, (3) ऊधम खां का मकबरा, और (4) अफसर खां का मकबरा ।

अकबर के दरबार के नौ रत्न तो विक्रम के नौ रत्नों की तरह ही जगत विख्यात हैं। इनमें राजा मानसिंह, टोडरमल, भगवान दास और राजा बीरबल, जिनका असल नाम महेश दास था, फैजी और अबुल फजल, जो दोनों भाई थे. खास मशहूर हैं। बीरबल का नाम किसने नहीं सुना होगा। उसके नाम से सैकड़ों किंवदंतियां मशहूर हैं। यह जात के ब्राह्मण थे और काल्पी के रहने वाले थे। शुरू में यह भाट का पेशा करते थे। फिर रामचंद्र भट्ट की सरकार में नौकर हो गए।

 भाग्य उदय हुआ, अकबर से मुलाकात हो गई और बादशाह के प्रिय बन बैठे। बादशाह इन पर इस कदर मेहरबान थे कि कोई हिसाब ही न था। एक बार 1586 ई. में काबुल की तरफ मदद भेजनी थी। दरबार में यह तजवीज पेश थी कि किसको भेजा जाए। अबुल फजल ने अपने को पेश किया और बीरबल ने अपने को। अकबर ने परची डाली जो बीरबल के नाम की निकली। अकबर उसे अपने से जुदा करना नहीं चाहता था, मगर इजाजत दे दी। वहां जाकर यह मारे गए। दूसरे नौ रत्नों में फैजी और अबुल फजल मशहूर हैं, जो अकबर के बड़े वफादार और विश्वसनीय थे। सलीम इस बात को पसंद नहीं करता था। वह इनसे द्वेष करता था। आखिर सलीम ने अबुल फजल को कत्ल ही करवाकर छोड़ा। फैजी बड़ा विद्वान था। फारसी और संस्कृत- दोनों भाषाओं में निपुण था। उसने कई पुस्तकों का भाषांतर किया है। उसने रामायण और महाभारत के कुछ भागों का फारसी में अनुवाद किया है। अकबर के जमाने में नौरोज का मेला हुआ करता था और मीना बाजार लगा करता था। इस प्रकार पचास वर्ष की बड़ी शानदार हुकूमत के बाद अक्टूबर 1605 ई. में अकबर की मृत्यु हुई और आगरा से बारह मील सिकंदर मुकाम पर, जिसे अकबर ने खुद बनवाया था और जिसका नाम बहिश्ताबाद रखा था, उसे दफन किया गया।

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