हिंदी फिल्म इंडस्ट्री बी. आर. चोपड़ा की सदैव श्रृणी रहेगी। बीआर चोपड़ा का आज ही के दिन यानी 5 नवंबर को निधन हुआ था। उनके निधन से पूरा देश स्तब्ध था। बलदेव राज चोपड़ा (बीआर चोपड़ा) मूलरूप से पंजाब प्रांत के लुधियाना शहर के रहने वाले थे। 22 अप्रैल 1914 को उनका जन्म हुआ था। उनके पिता विलायती राम चोपड़ा कट्टर आर्य समाजी थे। बीआर चोपड़ा का प्रारंभिक जीवन उसी परिवेश में व्यतीत हुआ। उनके पिता को फिल्में देखना पसन्द न था अतः उन्होंने चोपड़ा को फिल्में न देखने की हिदायत दे रखी थी। किन्तु चोपड़ा कभी-कभार छिपकर फिल्में देख लेते थे एक बार वे पिता से छिपकर एक अंग्रेजी फिल्म देखने चले गए। वे देर से लौटे तो उनके पिता ने देर से लौटने का कारण पूछा। स्पष्टवादी बलदेव राज ने सच कह दिया कि फिल्म देखने गया था। उनके पिता ने यह सुनकर उन्हें डांटा नहीं बल्कि उनकी स्पष्टवादिता से खुश होकर उन्हें अच्छी फिल्में देखने की इजाजत दे दी।

कर्ज में डूब गए

बलदेवराज चोपड़ा ने 1938 से लेकर 1947 तक लाहौर यूनिवर्सिटी में पढ़ाई की और वहीं से उन्होंने एम. ए. (अंग्रेजी साहित्य) की डिग्री हासिल की। बाद में उन्होंने एक अंग्रेजी अखबार ‘सिने हेराल्ड’ निकला। उसके बाद एक फिल्म प्रोडक्शन कंपनी के पीआरओ रहे तथा बाद में लाहौर में ही अपनी प्रोडक्शन कंपनी खोल ली। उसी समय देश का विभाजन हो गया। त्रासदी में वह बिना किसी साजो सामान के लाहौर से मुम्बई चले आए। बड़ी दौड़-धूप और प्रयास के बाद बलदेव राज ने अपने पुराने मित्रों की सहायता से किसी प्रकार पैसे इकट्ठे करके बम्बई में एक फिल्म बनाई जिसका नाम था- करवट । फिल्म चली नहीं औरवे कर्ज में डूब गए। लेकिन चोपड़ा ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने एक और कहानी लिखी और उस कहानी को आईएस जौहर को सुनाया। आईएस जौहर को वह कहानी इतनी पसंद आई कि उन्होंने तत्काल उसे पांच सौ रुपयों में खरीद लिया। इतना ही नहीं जौहर ने उनसे यह वादा भी ले लिया कि चोपड़ा ही उस कहानी पर बनने वाली फिल्म का निर्देशन करेंगे। इस प्रकार जो फिल्म बनी उसका नाम था-अफसाना। यह फिल्म सुपरहिट साबित हुई और चोपड़ा सिने जगत् में चर्चित नाम बन गए।उसके बाद चोपड़ा ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। ‘अफसाना’ फिल्म के बाद उन्होंने ‘हीरा फिल्मस्’ के बैनर तले दो फिल्में और बनाई ‘शोले’ (1935) और ‘चांदनी चौक’ (1954)। उनकी इन दोनों फिल्मों में से ‘शोले’ को तो विशेष कामयाबी नहीं मिली लेकिन मीनाकुमारी और शेखर अभिनीत फिल्म ‘चांदनी चौक’ सफल रही। इस फिल्म का संगीत खूब चला। जमीं भी वहीं है, वहीं आसमां (रफी), बन्नों के हाथ भरे मेहंदी (लता-कोरस) और ‘इस दिन में तुम्हारी याद आई कभी चार बजे कभी पांच बजे’ बहुत मशहूर हुए। इस फिल्म के लिए संगीतकार रोशन ने बड़ी कर्णप्रिय धुनें तैयार की थीं।

बीआर फिल्मस की स्थापना

इसके बाद चोपड़ा ने ‘बी. आर. फिल्मस्’ के नाम से संस्था बना ली और एक के बाद सुपरहिट फिल्में बनानी शुरू कर दी। उनकी अपनी निर्माण संस्था के बैनर तले जो पहली फिल्म बनी, उसका नाम था – ‘एक ही रास्ता’। वर्ष 1956 में बनाई इस फिल्म के मुख्य सितारे थे सुनील दत्त एवं मीना कुमारी। संगीतकार हेमन्त कुमार के संगीत से सजी इस उद्देश्य पूर्ण फिल्म का संगीत की खूब हिट हुआ था-सांवले सलौने आए दिन बहार के (लता हेमन्त ) चली गोरी पी से मिलन को चली (हेमन्त ) चमका बनके अमन का तारा (लता- कोरस) आदि गीतों ने उन दिनों धूम मचा दी थी। तब से लेकर फिल्म आवाज (1992) तक बी. आर. फिल्मस ने कुल 37 फिल्में बनाई। फिल्मों में धूल का फूल, साधना, नया दौर, कानू”) धर्मपुत्र, वक्त, हमराज, निकाह, कर्मा, तवायफ आदि फिल्में सुपरहिट साबित हुई।

9 करोड़ में बनाई महाभारत

बलदेव राज चोपड़ा ने छह टीवी सीरियल भी बनाए थे। बहादुरशाह जफर, चुन्नी, सौदा, कानून, मैं दिल्ली हूं एवं महाभारत। जिसमें से महाभारत ने सफलता के सारे रिकार्ड तोड़ दिए थे। मीडिया रिपोर्ट की मानें तो बीआर चोपड़ा ने 9 करोड़ में महाभारत सीरियल बनाया। वो महाभारत में द्रौपदी का किरदार रुपा गांगुली की जगह जूही चावला से कराने वाले थे। किसी अन्य फिल्म की शूटिंग में व्यस्त होने के कारण जूही चावला ने मना कर दिया था।

बी. आर. चोपड़ा को वर्ष 1961 में ‘कानून’ फिल्म के लिए ‘फिल्म फेयर’ पुरस्कार मिला था। 1962 में उनकी फिल्म ‘धर्मपुत्र’ को सर्वोत्तम फिल्म का पुरस्कार मिला, तत्पश्चात 1963 में ‘गुमराह’ और 1968 में उनकी बनाई ‘हमराज’ फिल्म ने भी सर्वोत्तम फिल्म होने का पुरस्कार हासिल किया। अभी पिछले ही वर्ष उन्हें सिने जगत का सबसे बड़ा पुरस्कार ‘दादा साहब फाल्के’ दिया गया। 5 नवंबर 2008 को इनका निधन हो गया।

Spread the love

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here