chandani chowk
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खंडहरों की जुबानी, दिल्ली की कहानी

दी यंगिस्तान, नई दिल्ली।

दिल्ली का इतिहास केवल राजाओं की जीत और हार की कहानी नहीं है; यह उन पत्थरों और यमुना की रेती के जर्रों की दास्तान है, जो अगर बोल सकते तो दफ्तर के दफ्तर काले कर देते। 16वीं सदी से 19वीं सदी के मध्य तक, यानी लगभग ढाई सौ साल, दिल्ली मुगलों और राजपूतों के राजनैतिक उतार-चढ़ाव का केंद्र रही। आज हम जिस दिल्ली को देखते हैं, वह 1857 के ‘गदर’ के बाद के मलबे पर खड़ी एक नई इमारत है। पुराने बुजुर्ग जब भी दिल्ली का जिक्र करते थे, तो उनके पास दो ही शब्द होते थे— “शहर बसे में” या “शहर उजड़ने के बाद”। उनके लिए 1857 की क्रांति केवल एक युद्ध नहीं था, बल्कि एक पूरी सभ्यता का अंत था।

1857 से पहले की दिल्ली: जहाँ रसोई में नहरें बहती थीं

आज की भीड़भाड़ वाली दिल्ली को देखकर कल्पना करना मुश्किल है कि कभी यह शहर दुनिया के सबसे सुंदर बागों और नहरों का शहर था। गदर से पहले की दिल्ली के रईसों और साहूकारों की हवेलियों के पीछे शानदार बाग होते थे, जहाँ नहरें और फव्वारे चलते थे। आश्चर्य की बात तो यह है कि उस समय दिल्ली के घरों की रसोइयों तक में नहरों का पानी पहुंचता था।

चांदनी चौक के बीचों-बीच एक नहर बहती थी, जिसके दोनों तरफ घने पेड़ों के झुरमुट थे। जहाँ आज ‘घंटाघर’ खड़ा है, वहाँ कभी एक बड़ा हौज (तालाब) हुआ करता था। शाहजहाँ की बनाई ‘नहर-ए-बहिश्त’ (स्वर्ग की नहर) न केवल लाल किले को सींचती थी, बल्कि पूरे शहर को जीवन देती थी। फेज बाजार की नहर, पनचक्कियों की नहर और लाल डिग्गी—ये सब उस पुरानी दिल्ली के वैभव के प्रतीक थे जिसे 1857 के बाद उजाड़ दिया गया।

विनाश का तांडव: गद्दारोंको सजा या शहर का कत्ल?

1857 की क्रांति के बाद, अंग्रेजों ने दिल्ली पर जो कहर ढाया, वह रोंगटे खड़े कर देने वाला है। जामा मस्जिद और लाल किले के बीच बसे हुए विख्यात कूचे और बाजार, जो कभी नगर की शोभा थे, उन्हें पूरी तरह जमींदोज कर दिया गया। भव्य हवेलियाँ, गरीबों की झोपड़ियाँ और यहाँ तक कि कई धार्मिक स्थलों को गिराकर ‘चटियल मैदान’ बना दिया गया। अंग्रेजों ने इसे “गद्दारों को सजा” का नाम दिया।

आज हम जिन मैदानों को पीपलपार्क, चांदमारी का मैदान या एडवर्ड पार्क के नाम से जानते हैं, वे कभी घनी आबादी वाले व्यापारिक और सांस्कृतिक केंद्र थे। कैलाश घाट से काबली दरवाजे तक का एक बड़ा हिस्सा रेल की पटरियों की भेंट चढ़ गया। बुजुर्गों की आँखों ने वह मंजर देखा था जब नगर के बसे हुए हिस्सों पर कुदाल और फावड़े चल रहे थे और हज़ारों लोगों को बेघर कर मैदान बना दिया गया था।

राजनैतिक अस्थिरता: चौगान की गेंद बनी दिल्ली

औरंगजेब आलमगीर की मृत्यु के बाद से ही मुगल सत्ता की पकड़ ढीली होने लगी थी। दिल्ली की राजनैतिक स्थिति उस समय ‘चौगान की गेंद’ जैसी हो गई थी, जिसे हर स्वार्थी अपनी ओर खींचना चाहता था। देश में छोटी-छोटी पार्टियाँ बन रही थीं और ‘आपाधापी’ का दौर था। बहादुरशाह जफर के समय तक आते-आते बादशाह की ताकत केवल ‘पालम’ तक सीमित रह गई थी, जिसके लिए जनता में मशहूर था— सल्तनते शाह आलम, अज़ दिल्ली ता पालम”

ईस्ट इंडिया कंपनी, जो केवल एक व्यापारिक इकाई बनकर आई थी, उसने देश के कुप्रबंधन का लाभ उठाया और धीरे-धीरे सत्ता की डोर अपने हाथ में ले ली। मुगल बादशाह केवल खिताबों और जागीरों के वितरण का एक ‘सांकेतिक केंद्र’ बनकर रह गए थे।

गदर की नींव: धर्म, कारतूस और जन-आक्रोश

1857 का विद्रोह अचानक नहीं हुआ था। इसका मवाद 1757 (बक्सर और प्लासी की लड़ाइयों) के बाद से ही जमा होना शुरू हो गया था। दूरदर्शी लोग समझ रहे थे कि अंग्रेज जल्द ही मुगलों की ‘धोखे की टट्टी’ (दिखावे का आवरण) हटाकर सीधे सत्ता हथिया लेंगे।

इस आंदोलन के पीछे नाना साहेब, अजीमुल्ला, रानी झाँसी, तांतिया टोपी और मौलवी अहमदशाह जैसे संचालकों का एक बड़ा जाल था। उन्होंने महसूस किया कि हिन्दुस्तानियों को केवल ‘धर्म’ के नाम पर एकजुट किया जा सकता है। कारतूसों में गाय और सूअर की चर्बी की खबर ने वह चिंगारी सुलझाई, जिसने 10 मई 1857 को एक महाविस्फोट का रूप ले लिया।

लाल किले में आखिरी मुकदमा और दिल्ली का पतन

दिल्ली इस क्रांति का केंद्र बन गई। 6 महीने की भीषण लड़ाई के बाद अंततः अंग्रेजों की विजय हुई। वह क्षण इतिहास का सबसे दुखद क्षण था जब लाल किले के उसी ‘दीवान-ए-खास’ में, जहाँ कभी मुगलिया शान चमकती थी, बहादुरशाह जफर को एक ‘अपराधी’ की तरह पेश किया गया। अपने ही नौकरों और दरबारियों की गवाहियों के आधार पर उन्हें देश निकाला देकर रंगून भेज दिया गया।

विजयी अंग्रेजी फौज जब दिल्ली में घुसी, तो उसने लूटमार और कत्लेआम की सारी हदें पार कर दीं। चश्मदीदों के अनुसार, कई दिनों तक मुख्य बाजारों के पेड़ों का इस्तेमाल ‘फांसी’ देने के लिए किया गया। शहर लाशों और मलबे का ढेर बन गया। एडवर्ड टामसन की किताब The Other Side of the Medal इस बर्बरता पर रोशनी डालती है, जो उस समय के कई सरकारी दस्तावेजों में दबा दी गई थी।

एक सभ्यता की राख पर खड़ी आधुनिक दिल्ली

1857 के बाद दिल्ली की शक्ल ही बदल गई। जामा मस्जिद के पास के ‘दारुल-सफा’ (अस्पताल) और ‘दारुल-बका’ (मदरसा) जैसे शिक्षा और चिकित्सा के केंद्र नष्ट कर दिए गए। लाल किला और जामा मस्जिद के अलावा उस वैभवशाली शाहजहानाबाद का अब कुछ ही हिस्सा बाकी है।

आज की दिल्ली को देखकर हम अक्सर उसकी आधुनिकता पर गर्व करते हैं, लेकिन यह भूल जाते हैं कि इसके नीचे एक ऐसी दिल्ली दफन है, जहाँ रसोइयों में नहरें बहती थीं और जिसके कूचे दुनिया के लिए इल्म और अदब के केंद्र थे। 1857 की क्रांति ने दिल्ली को एक राजनैतिक केंद्र से बदलकर एक ‘मकतल’ (कत्लगाह) बना दिया था, जिसके जख्म भरने में दशकों लग गए।

Q&A Section

Q- 1857 से पहले दिल्ली में पानी की व्यवस्था कैसी थी?

उत्तर: गदर से पहले दिल्ली में नहरों का जाल बिछा था। चांदनी चौक के बीच में नहर बहती थी और रईसों के घरों की रसोइयों तक में नहरों का पानी पहुँचता था।

Q- अंग्रेजों ने 1857 के बाद दिल्ली के किन हिस्सों को नष्ट किया?

उत्तर: लाल किले और जामा मस्जिद के बीच की घनी आबादी, बाजारों और हवेलियों को पूरी तरह गिराकर मैदान बना दिया गया, ताकि विद्रोह की कोई गुंजाइश न रहे।

Q- बहादुरशाह जफर के खिलाफ मुकदमा कहाँ चला था?

उत्तर: बहादुरशाह जफर के खिलाफ मुकदमा दिल्ली के लाल किले के ‘दीवान-ए-खास’ में चलाया गया था, जहाँ उन्हें देश निकाला की सजा दी गई।

Q- 1857 के विद्रोह का मुख्य कारण क्या था?

उत्तर: मुख्य कारण कारतूसों में गाय और सूअर की चर्बी का उपयोग था, जिसे हिन्दुओं और मुसलमानों के धर्म को भ्रष्ट करने की साजिश माना गया।

Q- एडवर्ड टामसन की किताब “The Other Side of the Medal” क्यों महत्वपूर्ण है?

उत्तर: यह किताब एक अंग्रेज लेखक द्वारा न्यायप्रिय दृष्टिकोण से लिखी गई है, जो 1857 के दौरान अंग्रेजों द्वारा किए गए अत्याचारों और कत्लेआम का सच्चा विवरण देती है।

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