Home दिल्ली कभी नल से पानी पीना अशुद्ध मानते थे दिल्लीवाले, जानिए क्यों

कभी नल से पानी पीना अशुद्ध मानते थे दिल्लीवाले, जानिए क्यों

दिल्ली वाटर वर्क्स दिल्ली में वाटर वर्क्स सन् 1889 में बनना शुरू हुआ और 1895 में बनकर तैयार हुआ। उसके बाद शहर में नल लगने शुरू हुए। शुरू-शुरू में नल का पानी अशुद्ध माना जाता था। पीने के काम में कुओं का पानी आता था। पुराने संस्कारों के लोग नल का पानी नहीं पीते थे।

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समरी

दिल्ली वाटर वर्क्स दिल्ली में वाटर वर्क्स सन् 1889 में बनना शुरू हुआ और 1895 में बनकर तैयार हुआ। उसके बाद शहर में नल लगने शुरू हुए। शुरू-शुरू में नल का पानी अशुद्ध माना जाता था। पीने के काम में कुओं का पानी आता था। पुराने संस्कारों के लोग नल का पानी नहीं पीते थे।

विभिन्न राजवंशों के दौर में दिल्ली में समुचित जल प्रबंधन देखने को मिलता है। इस वजह से भी राजधानी दिल्ली कम से कम पानी के मामले में आत्मनिर्भर थी। दिल्ली में बसे नौ या उससे अधिक शहर जल स्त्रोतों के बिल्कुल निकट थे और यदि शहर से पानी के स्रोत दूर होते थे तो बकायदा व्यवस्था की जाती थी।

कभी नदी, नहर, कुओं, तालाबों और बावलियों ने ना केवल दिल्लीवालों की प्यास बुझाई बल्कि खेती के लिए पानी उपलब्ध करवाया। तोमर राजपूत शासकों ने 8वीं सदी में सूरजकुंड बनवाया, जो कि दिल्ली में प्राचीन जल संचयन इंफ्रास्ट्रक्चर में से एक माना जाता है। तोमर शासकों की एक और उपलब्धि सिंचाई के लिए बड़खल झील बनाना भी रहा।

साल 1230 दिल्ली के लिहाज से महत्वपूर्ण रहा। गुलाम वंश के सुल्तान इल्तुतमिश ने हौज-ए-शम्शी बनवाया। दिल्ली में अब तक बचा हुआ यह सबसे बड़ा और प्राचीन जल स्रोत है। इतिहास की कहानियों से इतर महरौली में आज भी बावलियों और तालाबों की अधिकता है। इनमें से कुछ इल्तुमिश तो कुछ बाद के दौर में लोदी शासकों ने बनवाया था।

बात मध्य काल की करें तो उस समय यमुना से निकलने वाली नहरों से शहर में पानी की आपूर्ति होती थी। 13वीं शताब्दी में सबसे पहले नहर फिरोजशाह तुगलक ने बनवाई। इस नहर को और अधिक उन्नत किया मुगल बादशाह अकबर और जहांगीर ने। वर्ष 1643 में शाहजहां के फौजी सिपाहसालार अली मर्दन ने भी एक पुरानी नहर की मरम्मत कराई और उसका पानी दिल्ली की तरफ मोड़ा। यही बाद में रोहतक नहर के नाम से प्रसिद्ध हुई।

ब्रितानिया हुकूमत

1803 में ब्रितानिया हुकूमत की सत्ता दिल्ली पर काबिज हुई। अंग्रेजों के हिसाब से शहर में नहर से पानी की आपूर्ति सही नहीं था। इसके पीछे एक कारण यह भी था कि 18वीं सदी के मध्य तक दिल्ली की प्यास बुझाने वाली अली मर्दन नहर जीर्ण शीर्ण होकर सूख चुकी थी और जब 19वीं सदी के शुरुआती वर्षों में नहर की मरम्मत तो हुई पर नहरों को ताजा पानी उपलब्ध करवाने वाले सैकडों जल स्त्रोतों को उनके हाल पर ही छोड़ दिया गया।

दिल्ली पर काबिज होने के बाद मर्सर नामक एक अंग्रेज ने सूख चुकी अली मर्दन नहर को अपने खर्च पर दोबारा सफाई कराकर चालू करने की पेशकश की। हालांकि, उसने एक शर्त रखी। उसने कहा कि वो अगले बीस वर्ष नहर के पानी से मिलने वाले राजस्व की वसूली का अधिकार चाहता है। ब्रितानिया हुकूमत ने शहर में पानी की व्यवस्था दुरूस्त करने के मकसद से 1810 में सर्वेक्षण की योजना बनाई, जिस पर 1817 में अमल शुरू हुआ।

अंग्रेज़ रेजिडेंट चार्ल्स मेटकाफ ने करीब चार से पांच साल बाद नहर का उद्घाटन किया। इस नहर के पुर्नोद्धार का मुख्य मकसद शहरवासियों को पीने के लिए स्वच्छ पानी उपलब्ध कराना था। जब नहर चालू हुई तो दिल्लीवालों ने घी और फूलों के प्रसाद के साथ बहकर आते जल का दिल से स्वागत किया। लेकिन समस्या तब उत्पन्न हुई जब किसानों ने नहर के पानी का इतना अधिक इस्तेमाल किया कि शहर में पानी की कमी महसूस की जाने लगी और अतत: नहर फिर से सूख गई।

साल 1832 में साउथ-ईस्ट के बाशिंदों को ताजे पानी की आपूर्ति हेतु एक भूमिगत चैनल के मरम्मत की योजना बनाई गई। हालांकि पैसों की कमी के चलते यह काम पूरा नहीं हो पाया। इस तरह की कोशिशों के तहत 1846 में एक बडा जलाशय बनाया गया लेकिन महज एक दशक के अंदर इसका पानी खारा हो गया।

उस समय पीने के पानी की क्या दिक्कत थी इसे उर्दू के मशहूर शायर मिर्जा गालिब द्वारा 1860-61 में लिखे खत से समझा जा सकता है। उन्होंने लिखा है कि “कारी का कुंआ सूख चुका है। लाल डिग्गी में सभी कुएं अचानक पूरी तरह से खारे हो गए हैं… अगर कुएं गायब हो गए और ताजा पानी मोती की मानिंद दुर्लभ हो जाएगा तो यह शहर कर्बला की तरह एक वीराने में बदल जाएगा।” दिल्ली शहर में पानी की आपूर्ति मांग के अनुरूप सही नहीं थी। पूरे शहर में बहुसंख्यक घरों में कुंए थे। जब नहरें सूखने लगी तो लोग एकबार फिर कुओं पर आश्रित हो गए। 1860 तक दिल्ली में 1,000 कुएं थे। इनमें से करीब 600 निजी और 400 सार्वजनिक उपयोग में थे। इनसे पानी भरने के लिए कहार या पानी की मशक ढोने वाले आदमी रखे जाते थे। खानदानी रईस घराने ने तो पानी ढोने के लिए आदमी रखा हुआ था जबकि बाकियों के लिए मश्क वाले सार्वजनि कुओं से पानी लेकर आते थे। ये चमड़े की मश्क में पानी भरकर घर-घर पहुंचाते थे।

वर्ष 1867 में यह नहर दोबारा 1820 के दशक की तरह फिर से बहने लगी और यहां के निवासी उसका इस्तेमाल नहाने के लिए भी करने लगे। बावजूद इसके दिल्लीवासियों के लिए पीने के पानी की समस्या का समाधान नहीं हो पा रहा था। यह समस्या आगे चलकर और विकराल होने वाली थी। साल 1867 में एक बार फिर 1846 की भांति दिल्ली के तीन चौथाई कुओं का पानी खारा हो गया। ये मुश्किल भरा दौर था। दिल्लीवाले मीठा पानी रिज पर मौजूद झरनों और दूर झंडेवाला से महंगी कीमत पर खरीदकर ले आते थे।

वर्ष 1870 में अंग्रेजों ने एक बडी पहल की। उस जगह बांध बनाया जहां यमुना पहाड़ियों से निकलकर मैदानों में उतरती है। इसकी मदद से नहरों को फिर से पानी से लबालब भरा किया। आज भी पश्चिमी यमुना नहर हरियाणा के मैदानों से दिल्ली तक पानी पहुंचा रही है और रास्ते में कई हेक्टेयर भूमि को सिंचित भी कर रही है। जबकि दिल्ली के दक्षिण के क्षेत्रों में अंग्रजों द्वारा 1875 में यमुना नदी पर बनाए ओखला बैराज से सिंचाई हेाती थी, यह नहर आज भी प्रयोग में है।

दिल्ली वाटर वर्क्स दिल्ली में वाटर वर्क्स सन् 1889 में बनना शुरू हुआ और 1895 में बनकर तैयार हुआ। उसके बाद शहर में नल लगने शुरू हुए। शुरू-शुरू में नल का पानी अशुद्ध माना जाता था। पीने के काम में कुओं का पानी आता था। पुराने संस्कारों के लोग नल का पानी नहीं पीते थे।

इस तरह, 1896 में पंजाब के सैनिटरी कमीशनर ने यमुना के पानी के इस्तेमाल के लिए जलदाय विभाग बनाने और इस काम पर आने वाली लागत की वसूली के लिए कर लगाने का सुझाव दिया।

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