गुरु हरिकिशन राय जी के नाम से दूसरा स्थान गुरुद्वारा बाला साहब माना जाता है, जो शीशगंज से पांच मील भोगल में निजामुद्दीन स्टेशन के पास पड़ता है। यह स्थान कई कारणों से पवित्र समझा जाता है। पहले यह कि गुरु हरिकिशन जी के जब ‘माता’ निकली तो उन्हें यहां लाकर रखा गया और यहीं उनका शरीरांत हुआ। जहां उनकी चिता जलाई गई थी, वह स्थान अब भी वहां मौजूद है।

माता साहिब कौर और माता सुंदरी की, जो गोविंद सिंह की पत्नियां थीं, मृत्यु के बाद उनका दाह संस्कार इस गुरुद्वारे में किया गया। प्रत्येक पूर्णिमा के दिन यहां गुरु हरिकिशन जी की याद में मेला लगता है, खासकर चैत्र पूर्णिमा के दिन।

यह गुरुद्वारा भी खुले मैदान में बना हुआ है। यह 1945 में नया ही बना है। सीढ़ियां चढ़कर दालान आता है, जो लगभग 65 फुट 60 फुट का है। बीच में चबूतरा है, जहां गुरु महाराज की समाधि है। उस पर छतरी बनी हुई है। दोनों ओर बालकनी है। मुख्य द्वार के पास कमरे में वह स्थान है, जहां माता साहिब कौर की समाधि है। बाहर एक दूसरा दालान है, उसमें माता सुंदरी की समाधि है।

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