भारत में अध्ययन-अध्यापन की परंपरा आरंभ से ही चली आ रही है। दिल्ली में भी शिक्षा संस्थानों का इतिहास बहुत पुराना है। भारत में सभ्यता के इतिहास का आरंभ आर्यों के आगमन से होता है और यह तीन हजार वर्ष पहले की बात है। आर्यों का समय वैदिक काल कहलाता है और उसी काल में संस्कृत फली फूली। उस जमाने में शिक्षा वेदों के अध्ययन तक सीमित थी और बचपन से नौजवानी तक विद्यार्थी वेद पढ़ते थे।

इसी अध्ययन को, जीवन को सार्थक बनाने के लिए पर्याप्त समझा जाता था। उस युग में ब्राह्मण विद्वान दर्शन, संगीत, गणित और इतिहास आदि विषयों की खोज कर चुके थे। पढ़ने-पढ़ाने के लिए आश्रम स्थापित किए जा चुके थे, जहां विद्यार्थी रहते थे और बड़ी सादगी से जीवनयापन करते थे। गुरु-शिष्य परंपरा थी और गुरु की सेवा परम धर्म समझा जाता था। उसकी आज्ञा न मानने का प्रश्न ही नहीं उठता था। शुरू-शुरू में वृक्षों की छाल और रुई से बने कपड़े को कागज के रूप में इस्तेमाल किया जाता था।

तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में प्राचीन भारत में तक्षशिला ज्ञान-विज्ञान का एक बहुत बड़ा केन्द्र था। जिसकी तुलना एक विश्वविद्यालय से की जा सकती है। उच्च वर्गों के सभी बच्चे, जिनमें राजा-महाराजाओं के लड़के भी शामिल थे, इसमें भारतीय विद्याएं, कलाएं और आयुर्वेद की शिक्षा प्राप्त करते थे। उस युग में शिक्षा का माध्यम प्राकृत या मागधी था, मगर लगभग दो सौ वर्ष बाद महाराज विक्रमादित्य के काल में संस्कृत का उत्कर्ष हुआ और कालिदास जैसे महान कवि जन्मे।

बाद में बौद्ध धर्म के अनुयायियों ने शिक्षा के प्रसार में बड़ा योगदान दिया और नालंदा के आश्रम में एक बड़ा शिक्षा केन्द्र स्थापित किया जो समस्त पूर्व में सबसे बड़ा विश्वविद्यालय समझा जाता था। इसमें अठारह विद्यालय थे जिनमें दस हजार विद्यार्थी उपासना करते थे और आयुर्वेद, दर्शनशास्त्र और धर्म की शिक्षा प्राप्त करते थे। चीनी यात्री फाह्यान ने भी चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के काल में आश्रमों में तीन वर्ष संस्कृत के अध्ययन में लगाए थे। उसने उस युग का वर्णन इस प्रकार किया है-“बौद्ध धर्म के पंडितों को बड़ा आराम था और अपनी धार्मिक पुस्तकों को पढ़ने की बहुत फुरसत थी। मदरसे और पाठशालाएं जगह-जगह थीं। पशुओं की बलि बहुत कम होती थी। मांस केवल चांडाल जाति के लोग बेचते थे। जब वे बाज़ारों में निकलते थे तो हाथ में डंडे बजाते थे ताकि वे किसी का स्पर्श न कर बैठें। कौड़ियों का चलन था और लोग संपन्न, दयालु और न्यायप्रिय थे।

दिल्ली में तोमर और चौहान राजाओं के जमाने में भी शिक्षा का बड़ा महत्व था। बड़े-बड़े मठों में पाठशालाएं बनी हुई थीं जिनमें धार्मिक शिक्षा दी जाती थी। पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु के बाद मुसलमानों का राज आया और मदरसे और मक्तब कायम हुए। सुल्तानों के शासन में मस्जिदों के साथ मदरसे कायम हुए जहां शिक्षा दी जाने लगी।

धार्मिक शिक्षा के लिए इन मदरसों में अरबी पढ़ाई जाने लगी। इतिहास की पुस्तकों में एक मदरसा-ए-ग़ाजी का उल्लेख मिलता है जिसे सुल्तान शम्सुद्दीन अल्तुतमिश ने स्थापित किया था उसने इसका नाम सुल्तान मुहउद्दीन के नाम पर रखा था। मालूम होता है कि इस मदरसे की देखभाल अच्छी तरह न हो सकी और मरम्मत पर भी ध्यान नहीं दिया गया, जिसके कारण फिरोजशाह तुगलक के काल में सिर्फ इसके खंडहर शेष रह गए फीरोजशाह तुगलक ने इसे नए सिरे से बनवाया और चंदन के दरवाजे लगवाए। दूसरा मदरसा दिल्ली में नासिरिया के नाम से कायम हुआ। यह मदरसा अल्तुतमिश के बेटे सुल्तान नासिरुद्दीन के नाम पर बनवाया गया था जो बड़ा संयमी, परहेज़गार और इबादत करने वाला बादशाह था। मदरसा-ए-नासिरिया के व्यवस्थापक मशहूर विद्वान और ‘बुज़ुर्ग अबू उमर मिनहाजुस्सिराज थे।

दिल्ली के घरों में भी तालीम देने का रिवाज था जब हजरत निजामुद्दीन औलिया दिल्ली तशरीफ़ लाए तो उन्होंने मस्जिद-ए-हिलाल तश्तदर में कायम किया। ख्वाजा शम्सुद्दीन ख्वामी उस समय अपने कमरे में पढ़ाया करते थे और वह मदरसा दर्सगाह-ए-ख़्वाजा शम्मसुद्दीन ख्वारज़्मी कहलाता था। हजरत निजामुद्दीन भी उसी मदरसे में तालीम पाने लगे। उनके साथ ही मौलाना कुतबुद्दीन हज़रत और मौलाना बुराहनुद्दीन अब्दुल बाक़ी भी इसी मदरसे में पढ़ते थे हजरत निजामुद्दीन औलिया खानकाह में भी आध्यात्मिक शिक्षा देते थे और कुरान शरीफ़ की शिक्षा पर ज़्यादा ध्यान दिया जाता था।

मुहम्मद तुगलक के शासन काल में दिल्ली में एक हजार मदरसे और मक्तब थे। ज़्यादातर मदरसे मस्जिदों के साथ जुड़े हुए थे। फीरोजशाह तुगलक के जमाने में भी शिक्षा की बहुत उन्नति हुई। बहुत से नए मदरसे कायम हुए और मौलवियों, उस्तादों और विद्वानों के रहने के लिए आलीशान मकान भी बनवाए गए। फ़ीरोज़शाह ने अपनी पुस्तक फुतूहात-ए-फ़ीरोज़शाही में मदरसों की संख्या 30, खानकाह 20 और शिफ्राखाने 5 लिखे हैं। दूसरे इतिहासकारों ने 50 मदरसे लिखे हैं। इनमें सबसे बड़ा मदरसा मदरसा-ए-फीरोजशाही एक विश्वविद्यालय का दर्जा रखता था। इस मदरसे के प्रबंधक और सदर मुदर्रिस मौलाना जलालुद्दीन रूमी थे।

तुगलकों और लोधियों के काल में सरकारी भाषा फ़ारसी थी। सुल्तान सिकंदर लोधी ने हिन्दुओं को भी फ़ारसी सीखने की प्रेरणा दी मगर शुरू में कायस्थों के सिवाय और किसी ने बादशाह की बात नहीं मानी। बाद में धीरे-धीरे हिन्दुओं ने भी फ़ारसी सीखनी शुरू कर दी और मुसलमानों ने हिन्दी कविता और गद्य में बड़ा नाम पैदा किया।

मुगलों के काल में हुमायूं ने दिल्ली में एक मदरसा कायम किया जिसमें शेख हुसैन सदर मुदर्रिस थे। इस मदरसे में गणित, ज्योतिष और भूगोल की शिक्षा दी जाती थी। हुमायूँ के मक़बरे की छत पर भी एक मदरसा था जिसमें दूर-दूर से विद्यार्थी आकर विद्याध्ययन करते थे। यह उस समय की महत्त्वपूर्ण संस्था थी। शहंशाह अकबर की धात्री अन्ना माहिम अंगा ने भी 1561 ई. में पुराने क़िले के सामने एक मदरसा बनवाया था जिसके खंडहर अभी तक मौजूद हैं। शाहजहाँ ने दिल्ली में जामा मस्जिद के पास एक शाही मदरसा कायम किया मगर वह 1857 ई. की तबाही से बहुत पहले ही नेस्तोनाबूद हो गया। मगर शाहजहाँ के जमाने में बहुत से मदरसे बड़ी कामयाबी से चल रहे थे। शाहजहां के शाही मदरसे का नाम दारुल बक़ा था और उसके व्यवस्थापक मौलाना सदुद्दीन थे।

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