1857 की क्रांति: दिल्ली पर ब्रिटिश फौज ने दोबारा कब्जा कर लिया था। अधिकारियों के आतंक से आम जनता दुखी थी। विलियम डेलरिंपल अपनी किताब आखिरी मुगल में लिखते हैं कि ब्रिटिश अफसर थियो मैटकाफ ने बहुत जल्द मुजरिमों को ढूंढ़ने और फांसी चढ़ाने में खुद को बहुत चुस्त और जोशीला साबित कर दिया। अपनी खानाबदोशी के बाद ब्रिटिश कैंप पहुंचने पर उसकी इंतकाम लेने की ख्वाहिश लगातार बढ़ती ही जा रही थी और अक्टूबर तक तो उसने मैटकाफ हाउस में ही एक फांसी का तख्ता लगवा लिया।

वहां के जले हुए शहतीरों से वह हर उस हिंदुस्तानी को लटकाता था, जिस पर उसे जरा भी शक हो कि उसने अंग्रेजों के खिलाफ कोई जुर्म किया है। यह इंतकाम की ख्वाहिश का खुला ऐलान था जो उसके खानदान के रुत्बे को तबाह करने और खुद उसको जाती रूप से दगा देने वालों के लिए था।

डेल्ही गैजेटियर में एक वाकेआ दर्ज है कि एक गांव ने उसके एक नौकर को क्रांतिकारियों के हवाले कर दिया था, तो उसने अपने हाथ से उस गांव के 21 बड़े लोगों को गोली मार दी।

जीनत महल की लाल कुएं वाली शानदार हवेली के अपने नए घर से, थियो ने दिल्ली के इर्द-गिर्द के लोगों को आतंकित कर रखा था। वह उन बेचारे लोगों पर एकदम टूट पड़ता, जिन्होंने मजारों और दरगाहों में पनाह ली हुई थी और अगर किसी के बारे में उसे जरा भी शक होता कि उसने बगावत में हिस्सा लिया था, तो उसे फांसी पर चढ़ा देता।

जनवरी 1858 में एक खत द टाइम्स में छपा था, जिसमें लिखा था कि ‘मैटकाफ हर रोज जिस किसी को भी पकड़ पाता है, उस पर मुकद्दमा चलाकर उसे फांसी पर चढ़ा देता है… सारे देसी लोग उससे बेहद खौफजदा हैं।’ जहीर देहलवी ने भी लिखा है कि ‘मैटकाफ गोलियां चलाने निकल पड़ता था। वह जब भी किसी नौजवान को देखता, तो उसे फौरन वहीं पिस्तौल से गोली मार देता, बगैर किसी वजह या सही-गलत की पूछगछ के।

थियो का आतंक इस हद तक फैल गया था कि वह दिल्ली का ‘हौआ’ सा बन गया था, जिसका नाम ही लोगों को डराने के लिए काफी था। मिसेज कूपलैंड लिखती हैः

“जब में दिल्ली में थी तो वह क्रांतिकारियों को ढूंढ़ने और फांसी पर चढ़ाने में मसरूफ थे। एक दिन वह जनरल पैनी के घर के सामने से गुजर रहे थे, तो उन्होंने उनके सवारों की गार्ड में एक शख्स को देखा और फौरन उसे बुलाया, उस पर मुकद्दमा चलाया और उसे सजा-ए-मौत दी। उन्होंने बेचारे मि. फ्रेजर के कातिल को भी ढूंढ निकाला और फांसी पर चढ़ा दिया। एक दिन एक हिंदुस्तानी जौहरी अपना सामान मिसेज गाटन को दिखाने आया, जिन्हें लगा कि वह बहुत ज़्यादा कीमत लगा रहा है। इसलिए उन्होंने कहा, ‘मैं तुमको मैटकाफ साहब के पास भेज दूंगी’ । वह बेचारा यह सुनकर सिर पर पांव रखकर ऐसा भागा कि अपने जवाहरात भी वहीं छोड़ गया और फिर कभी मुंह नहीं दिखाया।

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