ब्रिटिश अधिकारी जॉन निकल्सन निकल्सन को आदेश न मानने की आदत थी। उसका एक अफसर उसके बारे में लिखता है:

“उनकी शख्सियत बहुत रोबदार थी। छह फुट दो इंच का कुद, लंबी काली दाढ़ी, सुरमई आंखें जिनकी पुतलियां काली थीं। जोश में उनकी पुतलियां शेर की आंख की तरह फैल जाती थीं। उनका चेहरा बेरंग था, जिस पर कभी मुस्कुराहट दिखाई नहीं देती थी। उनके लिए फर्ज अदा करने का मतलब था कि “दया” का शब्द अपनी शब्दावली से निकाल दिया जाए। वह हिंदुस्तान के बेहतरीन तलवारबाज भी माने जाते थे।

वह एक ख़ामोश मिजाज और रूखा अल्स्टर प्रोस्टैंट था। कहा जाता है कि जब वह रावलपिंडी में था, तो उसने खुद अपने हाथों से एक कबीले के सरदार लुटेरे का सिर काटा था और वह यह सिर यादगार के रूप में अपनी मेज पर रखता था।” वह शब्दों के प्रयोग में बहुत सावधान था, जिसकी मिसाल उसका एक ख़त है जिसमें उसने लॉरेंस को सिर्फ इतना लिखा कि: “सर, मैं आपको सूचना देता हूं कि मैंने अभी एक आदमी को गोली मार दी है, जो मुझे कत्ल करने आया था। आपका थानेदार जॉन निकल्सन।”

किसी नामालूम वजह से उसका एक पूरा धार्मिक संप्रदाय बन गया था, जो अपने आपको निकल सेन कहता था और उसे विष्णु का अवतार मानता था। निकल्सन अपने श्रद्धालुओं को उसी वक्त तक बर्दाश्त करता था, जब तक वह ख़ामोश रहते थे। लेकिन अगर वह उनके सामने ज़मीन पर झुक जाते या जाप करना शुरू कर देते, तो वह उन्हें कोड़े लगवाते। यह सजा कभी बदलती नहीं थी। तीन दर्जन गांठ कोड़े।

इसके बावजूद या शायद आंशिक रूप से इसी वजह से निकल्सन को हिंदुस्तान से सख्त नफरत थी। (‘हिंदुस्तान और इसके निवासियों से मेरी नफरत हर रोज बढ़ती जाती है) और उसका कहना था कि हिंदुस्तानियों से बदतर सिर्फ अफगानी ही हो सकते हैं (‘दुनिया की सबसे ज़्यादा जालिम और खूंखार नस्ल’)। उसकी यह राय 1842 के अफगान युद्ध में गिरफ्तार होने से पहले ही बन चुकी थी। जब उसको रिहा किया गया, उसके बाद उसे अपने छोटे भाई की लाश देखना पड़ी, जिसको बेरहमी से कत्ल करके उसका गुप्तांग काटकर उसके मुंह में ठूंस दिया गया था, तब से उनकी अफगानी बल्कि हिंदुस्तानी लोगों और ख़ासकर मुसलमानों के बारे में राय और भी पुख्ता हो गई थी। वह कहता था कि उसके दिल में उन सबके लिए नफरत की कोई इंतहा नहीं है। लेकिन उसको सिर्फ यह ख़्वाहिश यहां रहने पर मजबूर कर रही थी कि वह अंग्रेज़ों के ईसाई साम्राज्य को इस परधर्मावलंबी इलाके में फैला सके। उसका मानना था कि उसका अफगान युद्ध के खूनखराबे से बच निकलना, उनके लिए तकदीर का एक दिव्य संदेश था। अगर प्रभु ने उसे ऐसे हालात में भी बचा लिया है जबकि और बहुत से ईसाई मारे गए थे, तो ऐसा जरूर किसी महान उद्देश्य के लिए ही हुआ होगा।

और इसी धार्मिक जुनून की वजह से निकल्सन के साथ बड़ी समझदारी के साथ बर्ताव करना जरूरी था। लेकिन लॉरेंस इतना स्पष्ट और खरा आदमी था कि वह इस काम के लिए बिल्कुल उपयुक्त नहीं था। पिछले साल जब उसने उसे एक ऐंगलो-इंडियन मातहत देकर उसका ‘अपमान’ किया था, तो उसने लॉरेंस को मार डालने की धमकी दी थी। यह उनके ख्याल में ‘तर्कसंगत’ कत्ल होता। जैसा उसने एडवर्ड्स को लिखाः

“हर इंसान के वही अधिकार हैं, जो मुल्कों के होते हैं और एक इंसान की हैसियत से मेरे पास लॉरेंस के ख़िलाफ़ ‘सही वजह’ मौजूद हैं, जैसे इंग्लैंड को एक राष्ट्र की हैसियत ईरान और चीन के खिलाफ थी। मुझे लगता है कि उन्होंने मुझे पूरे पंजाब के सामने बेइज़्ज़त किया है। मुझे यकीन है कि दुनिया में नाइंसाफी और ज़ोर-ज़बर्दस्ती कम हो जाएगी, अगर मेरी तरह के हालात के शिकार लोग अपना न्याय खुद अपने हाथ में ज़्यादा से ज़्यादा लेने लगें। मैं उनके लिए यह दुआ भी नहीं कर सकता कि ख़ुदा उनको माफ कर दे। यह बिल्कुल मक्कारी होगी कि मैं उनके लिए दुआ के अल्फाज़ कहूं, जबकि मेरे दिल में बिल्कुल भिन्न भावनाएं हों।

हो सकता है कि निकल्सन ‘हिंसा का अवतार’ हो, लेकिन उसका पागलपन इन मौजूदा हालात के लिए बहुत उपयुक्त था। जहां एंसन और विल्सन सोचते और देर करते रहे, वहां निकल्सन ने हर तरफ फौरन मार्च करना शुरू कर दिया। कहीं वह विभिन्न रेजिमेंटों के सिपाहियों के हथियार छीनता, तो कहीं बगावतों को कुचलता और उनके लीडरों को सूली पर चढ़ाता। उसने बागियों को तोप के मुंह से उड़ाना बंद कर दिया था। इसलिए नहीं कि यह मुग़लों की पुरानी परंपरा थी या उसके दिल में कोई दया की भावना थी बल्कि सिर्फ इसलिए कि उसका ख़्याल था कि ‘जो बारूद इस काम में इस्तेमाल किया जाता है, वह किसी बेहतर काम के लिए खर्च हो सकता है’।” उसकी कार्रवाईयां बहुत जल्द विक्टोरियन दास्तानें बन गई और चूंकि उनको जानने के जरिए सिर्फ उसके अपने ख़त या भेजे हुए संदेश के कागजात हैं, इसलिए मिथक और वास्तविकता में अंतर करना मुश्किल है। कहा जाता है कि वह कभी सोता नहीं था और उसे किसी चीज़ का खौफ नहीं था। उसने लगभग अकेले ही ऐटक का किला जीता था और वहां के कई बागी दस्तों के सिपाहियों को चंद अनियमित पठानों की मदद से कत्ल किया था। इस मौके पर उसने एक आदमी को तलवार के एक ही बार से दो टुकड़े कर दिया था और उसके बाद सिर्फ इतना कहा कि “बुरी धार नहीं है तलवार की” वह कभी किसी को गिरफ्तार करके कैदी नहीं बनाता था। एक अफसर ने जो उसके जंगम दस्ते में था, यह बातचात सुनीः

” जैक, जनरल आ चुके हैं।”

“तुम्हें कैसे मालूम?”

उधर देखो, वहां उनके संकेत हैं।”

‘उधर’ जहां जैक को देखने के लिए कहा गया था, दो सूलियां लगी हुई थीं, जिनमें से हर एक पर छह बाग़ी लटक रहे थे और करीब ही कई बैलगाड़ियां खड़ी थीं, जिनमें बागी सिपाही भरे हुए अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे। निकल्सन बहुत कम कोर्ट मार्शल करता था।

जब सर जॉन लॉरेंस ने उसे लिखा कि ‘देसी बागियों के कोर्ट मार्शल बहाल होने चाहिए, दी गई सजाओं की फेहरिस्त बननी चाहिए’ तो संगदिल निकल्सन ने सिर्फ उस आदेशपत्र के पीछे एक लाइन लिखकर उसको वापस भेज दिया कि ‘बगावत की सजा मौत है’।

दिल्ली के सफर में वह पूरे वक़्त सुरक्षा की देखभाल करता रहा। मई की एक गर्म शाम को जालंधर के करीब निकल्सन के जंगम दस्ते के कुछ भूखे अंग्रेज़ सिपाही खाने के खेमे में डिनर के इंतज़ार में बैठे थे। खाना आने में घंटा भर की देर हो गई थी। पकाने वाले खेमे में संदेश भेजा गया, तो जवाब आया कि अभी कुछ और वक़्त लगेगा। आखिरकार थोड़ी देर बाद पत्थरदिल निकल्सन वहां आया और लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए खंखारा और बोला, “माफ करना, जैंटलमेन कि मैंने आपको खाने पर इंतज़ार करवाया, लेकिन मैं आपके खानसामाओं को फांसी पर चढ़ाने मसरूफ था।”

निकल्सन का कहना था कि उसे अपने जासूसों से ख़बर मिली थी कि खानसामां उसके साथी अफसरों के सूप में जहर मिला रहे थे। उसने पहले उनको दावत दी कि थोड़ा सूप उसके सामने पिएं और जब उन्होंने इंकार किया, तो उसने ज़बर्दस्ती वह सूप एक बदनसीब बंदर को पिलाया। वह कुछ देर एड़ियां रगड़ता रहा और फिर उसने दम तोड़ दिया। और उसके कुछ देर बाद ही जैसा रेजिमेंट के एक अफसर ने बयान किया “हमारी रेजिमेंट के खानसामां पास के एक पेड़ की ज़ीनत बने हुए थे। “28

इस मुश्किल दौर में ऐसे ही गुणों वाले एक और अंग्रेज़ अफसर को भी काफी महत्व मिला।

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