जफर के रिश्तेदार इलाही बख्श ने झूठ बोलकर रोका

1857 की क्रांति: 17 सितंबर की आधी रात बहादुर शाह जफर लाल किले से निजामुद्दीन की दरगाह गए। यहां से वो महरौली में कुतुब साहब की मजार जा रहे थे। लेकिन वह अभी थोड़ी दूर ही गए थे कि मिर्जा इलाही बख्श घोड़ा दौड़ाते उनके पास पहुंचे और कहा कि गूजरों का एक गिरोह रास्ते में हर एक को लूट रहा है, जैसा उन्होंने पहले अंग्रेजों के साथ किया था। यह वही इलाही बख्श थे, जिनकी बेटी की शादी जफर के बेटे से हुई थी।

हालांकि, जो इलाही बख्श ने कहा था वह सच था। लेकिन जो जफर को मालूम नहीं था, वह यह था कि इलाही बख्श अंग्रेज अफसर होडसन का तंख्वाहदार था। वह होडसन के कहने पर वहां आया था और यह वादा करके आया था कि वह अपने रिश्तेदार को बाहर नहीं जाने देगा।

होडसन ने किसी ऊंचे अफसर से इस बारे में बात नहीं की थी कि वह किन शर्तों पर यह समझौता कर रहा है, लेकिन वह दरअसल इस तरह बादशाह को गिरफ्तार करके और उन पर मुकद्दमा चलवाकर बहुत बड़ा हीरो बनना चाहता था, ताकि उसका खोया हुआ नाम और इज्जत वापस मिल जाए।

इसी मकसद से उसने जीनत महल और उनके पिता मिर्जा कुली खां से भी जो अब तक लाल कुएं वाली जीनत महल की हवेली में थे, साजबाज की थी। उन्होंने भी कुछ हिचकिचाहट के बाद वादा कर लिया था कि वह जफर को हथियार डालने पर आमादा कर लेंगे, लेकिन उसके बदले उसे जीनत और उनकी जिंदगी में जो तीन आदमी थे-उनके बाप, बेटा जवां बख्त और उनके शौहर जफर-की जिंदगी की गारंटी देनी पड़ेगी। इस गारंटी में जो जीनत और उनके पिता ने ली थी, कहीं भी उनके पति के बाकी बेटों का जिक्र नहीं था, जो दूसरी बीवियों से थे।

बहुत मनाए जाने के बाद जफर ने अपना इरादा बदल दिया और आदेश दिया कि पालकी को वापस निजामुद्दीन लौटाया जाए, जहां वह जीनत महल के आने का इंतजार करते रहे। फिर दोनों साथ जफर के महान पूर्वज, दूसरे मुगल बादशाह हुमायूं के मकबरे पर गए जो करीब ही था।

यह पहला आलीशान मकबरा था, जो मुगलों ने लगभग तीन सौ साल पहले, सोलहवीं सदी के मध्य में बनवाया था, और अभी भी यह दिल्ली का सबसे शानदार स्मारक था। यहां पहुंचकर जफर ने पैगाम भेजा कि उनके हाथी हकीम अहसनुल्लाह की हवेली पर भेज दिए जाएं और उनसे कहा जाए कि वह शाही खानदान के पास मकबरे पर आ जाएं। फिर जफर अपने पूर्वज के मकबरे के अंदर के तहखाने में इंतजार और दुआ करने चले गए।

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