1857 में 12 मई की सुबह दिल्ली अंग्रेज़ों से लगभग पूरी तरह खाली थी। वह अंग्रेज़ जो 1803 से वहां हुकूमत कर रहे थे जब उन्होंने मराठों को हराया था। विद्रोहियों के हाथों जख्मी दिल्ली के रेजिडेंट थियो की आंख खुली और उसने अपने आपको अजीब बेनाप कपड़े पहने किसी अजनबी के घर के एक कमरे में छिपा हुआ पाया।

जब टाइटलर ने करनाल में और जॉर्ज ने पानीपत में अपने को पेट भरकर नाश्ता करता पाया, जब मोर्ली बैलगाड़ी पर बैठा हिचकोले खाता अपनी आइंदा जिंदगी बगैर अपने बीवी-बच्चों के गुज़ारने के तरीकों के बारे में सोच रहा था, जब एडवर्ड वाइबर्ट और उसका ग्रुप झाड़ियों में छिपा मेरठ के रास्ते में बैठा था, ताकि वह उन सिपाहियों की टोलियों से बच सकें जो फरार अंग्रेज़ों की तलाश में थीं, जब ग़ालिब बहुत नाराज़गी से अपने मुहल्ले बल्लीमारान में अपनी हवेली की जालियों के पीछे से अकड़ते हुए सिपाहियों को घूमते देख रहे थे, जब मौलवी मुहम्मद बाकर अपने देहली उर्दू अख़बार के लिए उन सब अजीबो-गरीब घटनाओं और संकेतों के बारे में लिख रहे थे जो उनको पिछले दिन दिखाई दिए थे, जब नौजवान शायर मुहम्मद हुसैन आज़ाद बगावत के बारे में अपनी कविता मुकम्मल कर रहा था, और जब जहीर देहलवी और हकीम अहसनुल्लाह ख़ां सिपाहियों को किला-ए-मुअल्ला के कमरों से निकालने की कोशिश कर रहे थे, उस वक्त ज़फ़र भी परेशानी के साथ अपने भविष्य के बारे में सोच रहे थे।

पिछली रात उन्होंने कोई चालीस अंग्रेज़ों को पनाह दी थी जिनको मुईनुद्दीन लेकर आए थे। उनमें से कुछ उनके तस्बीहखाने में थे, महल का वह हिस्सा जो अभी तक उनके कब्ज़े में था। जीनत महल के मशवरे पर उन्होंने एक खुफिया खत एक ऊंटसवार के हाथ ब्रिटिश गवर्नर को आगरा भी भेजा जिसमें उन्होंने सब हालात बयान किए थे और उनसे मदद मांगी थी। ज़फर देख रहे थे कि सिपाही सिर्फ भरोसेमंद नहीं हैं बल्कि जालिम भी हैं, और उन्हें दरबारी तौर-तरीकों की कतई जानकारी नहीं है। और ज़फर को सबसे ज्यादा शिकायत यह थी कि वह उनकी इज़्ज़त नहीं करते थे और गुस्ताख़ी भरी बर्ताव करते थे। एक संवाददाता का कहना था कि ‘कुछ तिलंगे किले में जूते पहने खड़े रहते जिसकी वजह से वह बहुत नाखुश थे।

लेकिन फिर भी, अपनी सारी हिचकिचाहट, खौफ और अंदेशों, और लुटे हुए शहर के हंगामों और तंग आ चुके दरबारियों के विरोध के बावजूद, ज़फ़र का ख्याल था कि बागियों का आना पूरी तरह से एक अभिशाप नहीं है, बल्कि हो सकता है कि इसमें ख़ुदा का हाथ हो और यह एक ऐसा मौका हो जिसका उन्होंने कभी ख़्वाब भी नहीं देखा था। यानी उनकी आला मुगल नस्ल को फिर से कायम करने का एक ज़रिया ! आधी रात को उन्होंने 21 तोपों की सलामी की मंजूरी भी दे दी जो एक नए दौर की शुरुआत का ऐलान था। ज़फ़र का बगावत के बारे में अस्पष्ट लेकिन इससे संबंध रखता हुआ अंदाजा मोहन लाल कश्मीरी ने महसूस किया जो दिल्ली कॉलेज का एक बड़े संपर्कों वाला भूतपूर्व छात्र था। जिसने अपने आपको अंग्रेज़ों के साथ जोड़ लिया था और जिसके नतीजे में उसे बगावत के फौरन बाद दिल्ली छोड़कर फ़रार होना पड़ा।

उसका कहना है:

“मैंने दिल्ली में किसी से कभी यह नहीं सुना कि बादशाह बहादुर शाह का गदर से पहले किसी भी बागी से संबंध था। लेकिन जब उन बदमाशों ने किले और शहर पर कब्जा कर लिया… तो उन्होंने जोड़-तोड़ करके बादशाह सलामत को एक शाही जुलूस में बाहर निकाला ताकि शहरियों में भरोसा पैदा हो सके। बादशाह ने अब पहली बार यह देखा कि वह शानदार और प्रशिक्षित सिपाहियों से घिरे हुए हैं जो उनका समर्थन करने को तैयार हैं। उन्होंने यह भी देखा कि जो लोग उनका जुलूस देखने खड़े थे वह उनकी तरफ मायूसी से नहीं देख रहे थे। उनको महसूस हुआ कि जो हालात उनके पक्ष में बदले हैं वह लोगों को पसंद हैं। उन्होंने अंग्रेज़ों की तबाहियों की दास्तान सुनी और उनको लगा कि अब पलटन दर पलटन सिपाही उनके तावेदार हैं। उनको यह गलत खबरें भी मिलीं कि सब अंग्रेज़ी फौजें ईरान में मसरूफ हैं और यूरोप की असंतोष भरी राजनीतिक स्थिति की वजह से अंग्रेज़ और फौजें हिंदुस्तान नहीं भेज सकेंगे। और उनसे यह भी कहा गया कि दकन और बंबई में भी बगावत हो गई है। इन सब बातों ने बहादुशाह को यकीन दिलाया कि वह अपनी जिंदगी के आखिर में फिर से तैमूरे-आजम के दौर को वापस लाने के लिए पैदा हुए हैं।

अनमने ढंग से ही सही, लेकिन बगावत के प्रति ज़फ़र के लगातार बढ़ते खुलेपन ने ग़दर का पूरा नक्शा ही बदल दिया। इससे पहले भी ब्रिटिश हिंदुस्तान में बग़ावतें हुई थीं ख़ासकर 1806 में वेल्लोर में। इसके अलावा भी अंग्रेज़ों की बढ़ती हुई ताकत के खिलाफ कई हथियारबंद हिंदुस्तानी विरोध हुए, लेकिन इससे पहले कभी किसी फ़ौज ने इतनी ताक़त में जमा होकर अंग्रेज़ हुकूमत के राज को नहीं ललकारा था।

अब कंपनी की अपनी फ़ौज और मुग़लों की अभी तक प्रभावशाली और रहस्यमयी कशिश की ताकत मिल गई थी। और ज़फ़र के झिझकते और नाममात्र के नेतृत्व ने इस बग़ावत को महज फौजी बगावत से बदलकर – जिसमें दिल्ली के शहरी भी, चाहे लूटमार के इरादे से ही सही, शामिल हो गए थे-एक ऐसी ज़बर्दस्त जंग बना दिया जिसका उन्नीसवीं सदी में दुनिया में कहीं भी किसी पश्चिमी हुकूमत ने सामना नहीं किया। फिर भी ज़फ़र के सामने सबसे अहम सवाल यह था कि यह सब होने के बावजूद कहीं उन्होंने एक मालिक के बजाय अपने आपको दूसरे मालिक के हवाले तो नहीं कर दिया है।

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