जंतर-मंतर से टॉलस्टॉय मार्ग(jantar mantar to tolstoy marg) शुरू होता है जो केजी मार्ग चौक तक जारी रहता है। गालिब और द़ाग के शहर में टॉलस्टॉय मार्ग? सुनकर और देखकर कई बार दिल्लीवाले भी चकित होते हैं। लेकिन यह मार्ग जितना शानदार है, उससे कहीं ज्यादा खूबसूरत वह भावना है, जिसके तहत यह मार्ग बनाया गया था। यह मार्ग दरअसल भारत और रूस की परस्पर दोस्तीका परिचायक है। अगर प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी के शब्दों में समझें तो महात्मा गांधी और टॉलस्टॉय की दोस्ती से भारत और रूस को भी प्रेरणा लेनी चाहिए।

गांधी (mahatma gandhi) रूसी लेखक-दार्शनिक टॉलस्टॉय (Leo Tolstoy) से काफी प्रेरित और प्रभावित थे। हालांकि, अपने जीवन में वे दोनों कभी एक-दूसरे से व्यक्तिगत तौर पर नहीं मिले लेकिन पत्रों के जरिए उनके बीच एक अनोखा रिश्ता था और वे विचारों का आदान-प्रदान करते थे। अपनी आत्मकथा में गांधी ने लिखा है कि कैसे टॉलस्टॉय की किताब द किंगडम ऑफ गॉड इज विदइन यू ने उनकी जिंदगी बदल दी। यह किताब उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में जोहांसबर्ग से डरबन की ट्रेन यात्रा के दौरान एक अक्टूबर 1904 को पढ़ी थी। वह इस किताब से इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने एक अक्टूबर 1909 को टॉलस्टॉय को पत्र लिखा। इसके बाद उनका पत्र व्यवहार चलता रहा।

गांधी ने जो किताब लिखी उसने भी टॉलस्टॉय पर गहरा प्रभाव छोड़ा और उसने वैश्विक प्रेम की अनंत संभावनाओं को लेकर उनके विचारों पर काफी असर डाला। दिल्ली और रूस का यह रिश्ता बहुत पुराना भी है। स्वतंत्रता से पहले भी रूसी भाषा दिल्ली में पढ़ाई जाती थी, लेकिन रूसी में शिक्षा 1965 में रूसी अध्ययन केंद्र की स्थापना के साथ शुरू हुई, जिसे आईआईटी दिल्ली परिसर में जगह दी गई थी।

रूस ने दिल्ली के इंटलेक्चुअल वर्ग को 60-70 के दशक में प्रभावित किया। उस समय के दिल्ली में पले-बढ़े वामपंथी झुकाव वाले लोगों को रूसी सांस्कृतिक केंद्र में साहित्यिक कार्यक्रमों में देखा जा सकता था। 1980 के दशक तक 40 भारतीय विश्वविद्यालयों ने रूसी भाषा के विभागों की स्थापना की थी। यहां यह जानना दिलचस्प होगा कि पढ़ाने वाले ज्यादातर जेएनयू के ही डिग्री धारक थे। यह मार्ग आज भी भारत और रूस की दोस्ती के प्रगाढ़ होने का संकेत है।

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