यूपी सरकार मोटे अनाज की खेती के लिए किसानों को करेगी प्रोत्साहित

जलवायु परिवर्तन अब अपना असर दिखाने लगा है। कई देश बेमौसमी गतिविधियों से प्रभावित हैं। भारत भी इससे अछूता नहीं हैं। जलवायु परिवर्तन से प्रभावित होने वाले देशों की सूची में भारत पांचवें नंबर पर हैं। तापमान में बढ़ोत्तरी, असमय बारिश, मानसून के बदलते चक्र और चरम मौसमी घटनाओं का असर खाद्यान्न सुरक्षा पर भी पड़ना लाजमी है। इससे खाद्यान्न सुरक्षा के लिए खतरा बढ़ रहा है। जनरल वन अर्थ की एक रिपोर्ट चिंता बढ़ाने वाली है। रिपोर्ट में आशंका जताई गई है कि तापमान में 2 डिग्री सेल्सियस बढ़ोत्तरी होने पर भारत में गेंहू की पैदावार में 7 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है। ऐसे में यह निश्चित है कि 140 करोड़ से अधिक की आबादी वाले भारत के लिए अगामी वर्ष चुनौतियों भरे होंगे। जलवायु परिवर्तन से उपजने वाली चुनौतियों को ध्यान में रखकर मोदी सरकार कई कदम उठा रही है। मोटे अनाजों के उत्पादन पर जोर देना भी इसमें एक है। मोटे अनाज की तुलना में चावल, गेंहू जलवायु परिवर्तन के प्रति अधिक संवेदनशील हैं। इसलिए जलवायु परिवर्तन के चलते उत्पन्न होने वाली खाद्य आपूर्ति की समस्या से निपटने में मोटे अनाज बेहतर विकल्प साबित हो सकते हैं।

भारत की पहल पर संयुक्त राष्ट्र ने 2023 को मोटा अनाज वर्ष घोषित किया है। विश्व खाद्य संगठन के आंकड़ों के मुताबिक भारत, नाइजर, सुडान सरीखे देशों के साथ मोटे अनाज के अग्रणी उत्पादकों में शामिल हैं। भारत कुल मोटे अनाज का 41 प्रतिशत उत्पादित करता है। 2020 में मोटे अनाजों का विश्‍व उत्‍पादन 30.464 मिलियन मीट्रिक टन (एमएमटी) हुआ और भारत का हिस्‍सा 12.49 एमएमटी था, जो कुल मोटा अनाज उत्‍पादन का 41 प्रतिशत है। हालांकि उत्पादन में अग्रणी होने के बावजूद भारत इसके निर्यात में 5वें नंबर पर है। भारत अपने कुल उत्पादन का एक केवल प्रतिशत निर्यात करता है। भारत मोटे अनाज का निर्यात बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। इसके लिए मोटे अनाजों की खरीद भी बढ़ाई जा रही है। यहीं उत्तर प्रदेश की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। उत्तर प्रदेश सरकार अगामी वर्षों में मोटे अनाज का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य बनने के लिए कार्यायोजना बना रही है।

क्लस्टर आधारित खेती

भारत के शीर्ष पांच मोटा अनाज उत्‍पादक राज्‍य हैं – राजस्‍थान, महाराष्‍ट्र, कर्नाटक, गुजरात और मध्‍य प्रदेश, उत्तर प्रदेश। मोटे अनाजों में ज्वार और बाजरा दो प्रमुख अनाज हैं। राजस्थान, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र अग्रणी बाजरा उत्पादक राज्य हैं। बाजरे की खेती राजस्थान में 43.48 लाख हेक्टेयर, उत्तर प्रदेश में 9.04 लाख हेक्टेयर और महाराष्ट्र में 6.88 लाख हेक्टेयर जमीन पर होती है। बाजरे की उपज के लिहाज से यूपी अव्वल है। राजस्थान के प्रति हेक्टेयर 1049 किलोग्राम उपज के मुकाबले यूपी में 2156 किलोग्राम उत्पादन होता है। उत्तर प्रदेश में रकबा और उपज दोनों बढ़ाने की खासी संभावना है। योगी सरकार ने 2021 में 1.71 लाख हेक्टेयर की तुलना में 2023 में ज्वार के रकबे का आच्छादन क्षेत्र 2.24 लाख हेक्टेयर करने का लक्ष्य रखा है। सावां, कोदो का लक्ष्य भी करीब-करीब दोगुना कर दिया है। पहली बार राज्य में मोटे अनाज की “क्लस्टर आधारित खेती” को बढ़ावा दिया जा रहा है।

किसानों को जागरूक करना जरूरी

देश की आजादी के समय मोटे अनाज का उत्पादन गेंहू से अधिक था। लेकिन बाद के वर्षों में गेंहू और चावल की तरफ पूरी दुनिया दौड़ पड़ी। भारत भी इस दौड़ में शामिल हुआ। जिसका नतीजा यह निकला कि मोटे अनाज के उत्पादन में अपेक्षाकृत वृद्धि नहीं हुई। स्वास्थ्य के लिहाज से मोटा अनाज बहुत लाभदायक है। यदि इसका उत्पादन बढ़ाना है तो ना केवल खरीद बढ़ानी होगी बल्कि किसानों को जागरूक करना होगा। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार 51 जिलों में मोटे अनाज की खूबियों के प्रति किसानों को जागरूक करने की योजना बना रही है। जिला स्तर पर सप्ताह में दो दिन संगोष्ठी आयोजित की जाएगी। किसानों को 5000 क्विंटल बाजरा, 7000 क्विंटल ज्वार, 200 क्विंटल कोदो और 200 क्विंटल सांवा के बीज नि:शुल्क उपलब्ध कराए जाएंगे।

बुंदेलखंड, पूर्वांचल और पश्चिमी यूपी के 51 जिलों में रोड शो करने की योजना है। हालांकि सरकार को केवल रोड शो तक सीमित नहीं रहना चाहिए। न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर इसकी खरीद भी की जानी चाहिए तभी किसान मोटे अनाज की खेती के लिए प्रोत्साहित होंगे। इसके अलावा खरीद की प्रक्रिया को सुलभ बनाने की जरूरत है। जब तक किसानों के अंदर यह भरोसा नहीं पैदा होता कि ज्वार, बाजरा आदि मोटे अनाजों की खरीद के लिए सरकार तत्पर है तब तक वो इसकी खेती के लिए प्रेरित नहीं होंगे। क्योंकि यह सत्य है कि मोटे अनाजों की तुलना में गेंहू और चावल बेचना अपेक्षाकृत आसान है। अन्य के मुकाबले ज्वार की फसल कम बारिश में आसानी से उपजाई जा सकती है। मोटे अनाज की वैज्ञानिक खेती पर ध्यान देना चाहिए। कृषि विश्वविद्यालयों के शोधार्थी, वैज्ञानिक इसमें काफी मददगार साबित हो सकते हैं।

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