हाइलाइट्स

  • भारत के कुछ पुराने नक्शों में विवादित क्षेत्र चीन में दिखाए गए
  • भारत सरकार ने इन नक्शों को जलाने के दिए थे निर्देश
  • कुलदीप नैयर ने अपनी किताब में इस प्रकरण का किया है जिक्र

चीन ने पुराने नक्शों को मानने और उनके अनुसार परम्परागत सीमा-रेखाओं का पालन करने से इनकार करके अपने आक्रामक रवैये का इजहार कर दिया। भारत की एक और मुसीबत यह थी कि हमारे नक्शों में हमारे कुछ इलाकों को चीन में दिखाया गया था। गृह मंत्रालय ने राज्यों को इन नक्शों को जला देने या कम-से-कम चीन और असम की सीमा को धुंधला कर देने के लिए कहा, क्योंकि इनमें भारतीय सीमा का सही चित्रण नहीं था।। चीन ने हमारी दुविधा का लाभ उठाते हुए हमारे ही नक्शों से हमारे दावे पर प्रश्न-चिहन लगाना शुरू कर दिया। नेहरू तब भी अक्सई चिन सड़क को लेकर चीन के साथ समझौता करने के पक्ष में थे।

पन्त ने एक दीर्घकालीन लीज का प्रस्ताव रखा तो चीन ने इसका जवाब लद्दाख के खुर्नाक किले पर कब्जा करके दिया। बीजिंग के एक सरकारी प्रकाशन ‘चाइना पिक्टोरिया’ ने एक बार फिर एक नक्शा छापकर उत्तर-पूर्वी लद्दाख के एक बड़े हिस्से को चीन में दिखाया। नेहरू ने चीन के रवैये पर आश्चर्य प्रकट करते हुए चाउ एन लाई को लिखा कि यह 1949 से उन्हें दिलाए जा रहे विश्वास के उलट था।

नेहरू के लिए यह एक कठोर और व्यक्तिगत झटका था। कांग्रेस नेताओं की इन चेतावनियों के बावजूद कि चीन एक धोखेबाज देश था, नेहरू को पूरा भरोसा था कि वह उनके विश्वास को ठोस नहीं पहुंचाएगा और परम्परागत सीमाओं में हल्के फेरबदल के साथ मामला सुलझ जाएगा। उन्होंने चीन पर इस हद तक भरोसा किया था कि सुरक्षा परिषद ने वह सीट चीन को दिए जाने की सिफारिश की थी जो पश्चिमी देश भारत को देना चाहते थे। उनका खयाल था कि एक कम्युनिस्ट तीसरी दुनिया के किसी देश के साथ शत्रुता नहीं करेगा, खासकर एक ऐसे देश के साथ जो समाजवादी आदशों में विश्वास रखता हो।

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