ब्रितानिया हुकूमत द्वारा दिल्ली में आयोजित तीन दरबार की दिलचस्प कहानी

दिल्ली के दरबार दिल्ली में अंग्रेजी शासन काल में तीन दरबार हुए। पहला दरबार सन् 1877 में हुआ, जब मलका विक्टोरिया को सम्राजी की पदवी दी गई। लार्ड लिटन 23 दिसंबर 1876 को दिल्ली में दाखिल हुए रेलवे स्टेशन से उनका जूलूस रवाना हुआ, जो क्वीन्स रोड, लाहौरी दरवाजा, आदि सड़कों से गुजरकर सिविल लाइन में रिज पर जाकर समाप्त हुआ था। वहां कैंप लगाया गया था। दरबार ढाका दहीपुर के नजदीक वाले मैदान में लगा था।

दूसरा दरबार सन् 1903 में हुआ। यह लार्ज कर्जन का दरबार कहलाता है। एडवर्ड सप्तम की जब ताजपोशी हुई, उस वक्त यह दरबार हुआ था। यह भी पुरानी छावनी में, जहां ढाका दहीपुर गांव है, मौजूदा हरिजन कालोनी से आगे हुआ था। उसकी याद में एक पार्क बना हुआ था। उसी वक्त कर्जन के ठहरने के लिए एक कोठी बनी थी। वहां अब विश्वविद्यालय है। यह कर्जन हाउस कहलाती थी।

1911 से 1947 तक की दिल्ली

तीसरा दरबार 1911 में हुआ, जो सबसे मशहूर है। यह जार्ज पंचम का दरबार कहलाता है। इंगलिस्तान का यह पहला बादशाह था, जो हिंदुस्तान आया था। यह सलीमगढ़ पर उतरा था और लाल किले से इसकी सवारी रवाना हुई थी, जो 8 दिसंबर को निकली थी। लाल किले से जामा मस्जिद होती हुई उसकी सवारी परेड मैदान, चांदनी चौक, आदि दिल्ली के बड़े-बड़े बाजारों में से गुजरी थी। राजाओं और नवाबों के शिविर सिविल लाइन में माल रोड पर लगे थे, जहां किंग्सवे कैंप है।

जहां अब तपेदिक का अस्पताल है, वहां रेल का स्टेशन था। सम्राट कर्जन हाउस में ठहरा था। 12 दिसंबर को उसने ढाका से आगे जाकर जो मैदान है। वहां दरबार किया था। वहां 170 मुरब्बा फुट का चबूतरा बना हुआ है, जिसकी 31 सीढ़ियां हैं। इसी चबूतरे पर बैठकर जार्ज पंचम ने दरबार किया था। चबूतरे पर पचास फुट ऊंची एक लाट उस दिन की याद में खड़ी है। सारा चबूतरा और सीढ़ियां संगवासी की हैं। लाट के पांच हिस्से हैं। निचले हिस्से में अंग्रेजी जुबान में उस दिन को घटना का वर्णन लिखा हुआ है।

इसी चबूतरे पर बैठकर जार्ज पंचम ने कलकत्ता की बजाय दिल्ली को राजधानी बनाने की घोषणा की थी। तभी से दिल्ली की काया फिर से पलटनी शुरू हुई और अंग्रेजों ने दिल्ली के प्रति जो लापरवाही अब तक दिखाई थी, उसमें परिवर्तन आया। सबसे बड़ी बात यह हुई कि दिल्ली वाइसराय के रहने और काम करने का स्थान बन गया और दिल्ली को एक अलग सूबा बना दिया गया। बल्लभगढ़ और पानीपत की तहसीलों को दिल्ली में से निकाल दिया गया। उसकी जगह यमुना पार के गाजियाबाद तहसील के गांव दिल्ली में शरीक कर दिए गए। 17 सितंबर 1912 से दिल्ली अलहदा सूबा बनाया गया। महरौली, जो बल्लभगढ़ तहसील में थी, वह दिल्ली में ही रही। दिल्ली का कुल रकबा 573 मौल हो गया।.

पहला वाइसराय लार्ड हार्डिंग था। वह 1921 में दिल्ली आया और उसने कर्जन हाउस में रिहाइश अख्तियार की। दिल्ली जब राजधानी बनी तो अंग्रेजों के लिए चंद अपशकुन हुए, बताते हैं। सबसे पहले तो जब जार्ज पंचम विलायत से चले तो कुछ दुर्घटना हुई। दिल्ली में दरबार करके आए तो उनके खेमे में आग लग गई। जब लार्ड हार्डिंग स्टेशन से चलकर हाथी पर जुलूस में निकल रहे थे तो चांदनी चौक में धूलिया वाले कटरे के सामने उन पर बम फेंका गया, जिससे वह बाल-बाल बच गए। उनके पीछे जो छतरधारी दरबान बैठा था, वह मारा गया। हार्डिंग के भी थोड़ी चोट आई।

हार्डिंग 1912 से 1916 तक दिल्ली में रहा। उसके बाद 1916 से 1921 तक लार्ड चेम्सफोर्ड, 1921 से 1926 तक लार्ड रीडिंग, 1926 से 1931 लार्ड इर्विन, 1931 से 1936 तक तक लार्ड विलिंगडन, 1936 से 1943 लार्ड लिनलिथगो, 1943 से 47 लार्ड वेवल, अप्रैल से अगस्त 1947 तक लार्ड माउंटबेटन वाइसराय रहे।

लार्ड माउंटबेटन आखिरी वाइसराय थे, जो स्वतंत्र भारत के पहले गवर्नर जनरल बने। फिर राजगोपालाचार्य को गवर्नर जनरल पद सौंपकर और हिंदुस्तान से अंग्रेजी सत्ता की निशानी खत्म करके वह इंग्लैंड चले गए।

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