हर गली-कूचे-कटरे में अलग तरह के खेलों का शौक

पुरानी दिल्ली (old delhi) वालों के शौक निराले हैं। कोई कबूतर पालने का शौक रखता है, तो कोई इन्हें उड़ाने का। कोई कैरम खेलने का शौकीन है, तो कोई शतरंज की बाजी में अपनी शामें बसर कर रहे हैं, तो कोई चौपड़ की बाजी में तनाव को दूर कर लेते हैं। वक्त बिताने के ये शौक राजा महाराजाओं के समय से चले आ रहे हैं। सबसे खास बात यह है कि ये शौक फायदे-नुकसान की सोच से भी परे हैं, बस शौक है जो इनके लिए बड़ी चीज है।

सदर बाजार की तंग गलियों में बेशक इंसानों के रहने के लिए जगह छोटी पड़ती दिखाई देती हो लेकिन इन्हीं गलियों में लोगों के शौक के लिए बेइंतहा जगह है। तीस गज के चार मंजिला मकान के आखिरी मंजिल में कुछ दड़बे हैं, तो कुछ छतरी लगी हुई है और कुछ दानों के डिब्बे इन सब के बीच कबूतरों की गुटर गू की आवाजें। विजेन्द्र के लिए कबूतर पालना, उनकी देख रेख करने का शौक सिर्फ शौक ही नहीं बल्कि इनकी जिंदगी है। विजेन्द्र जहां भी जाते हैं वहां से कबूतर खरीद लाते हैं। इनके खाने का भी खास ख्याल रखते हैं। इन सब के बीच अपना व्यापार भी संभालते हैं। लेकिन बचे हुआ समय इन कबूतरों की देख रेख पर लगाते हैं। वे बताते हैं कि कबूतरों को देख कर उनका तनाव छू मंतर हो जाता है। इन कबूतरों के फैले हुए पंखों और इनकी आवाजों से सुकून मिलता है। इनके लिए खासतौर पर घी की रोटी, बादाम, काजू और पिस्ता के दाने तैयार किए जाते हैं। इनके रहने के लिए दड़बे और कुछ एंटीना की छतरी भी रखी जाती है।

तीन तरह के कबूतर

पुरानी दिल्ली में तीन तरह के कबूतर पाले जाते हैं। पहली कबूतर की प्रजाति काबूली और निसाबरा कहलाती है, जो बाज से ऊंची उड़ती है और एक बार उड़ने के बाद पांच-छह घंटे के बाद ही वापस लौटते हैं। इसके बैठने के लिए खासतौर पर लड़की और बांस की छतरी बनाई जाती है। दूसरे प्रजाति का कबूतर लका होता है। इसके पंख बेहद खूबसूरत होते हैं और ये मोर की तरह नाचते भी हैं। तीसरी कबूतर की प्रजाति गोला कबूतर कहलाती है जिसे खूब पसंद किया जाता है। गोला कबूतर अपने मालिक की आवाज पहचानते है और उसकी आवाज पर उड़ता और वापस लौट भी आता है। इसमें भी कई तरह की वरायटी है जिसे लोग पालते हैं, इसमें पिल्का, लालबंद, कलपोटिया, हैदराबादी कबूतर शामिल है। तीनों किस्मों के कबूतरों को उड़ाया जाता है। इस काम में कई बार पूरा पूरा दिन बीत जाता है। पुरानी दिल्ली में कई लोगों के घरों में कबूतर है और कुछ लोग इन्हें उड़ाने का भी काम करते हैं।

बल्ब की रौशनी में कैरम की बाजी

कूंचा पंडित की सड़क गली वकील की तरफ जाती है। चौड़ी गली से होकर गुजरते हुए धीरे धीरे गली संकरी होने लगती है। मकान के छज्जे एक दूसरे से मिल जाते हैं इसलिए दिन में भी यहां रौशनी कम होती है। लेकिन अबरार कैरम क्लब दिन और रात दोनों ही समय रौशनी और कैरम की खट खट की आवाजें गूंजती रहती है। बल्ब की रौशनी से जगमगाती कैरम टेबल में चार लोग 15 रुपए प्रति घंटा के हिसाब से खेलते हैं। यह रिवायत यहां कई साल पुरानी है। पहले तो हर मोहल्ले में कैरम क्लब हुआ करते थे।

मोहम्मद अबरार बताते हैं कि वकील गली में ही कई लोगों के क्लब थे लेकिन अब वो बंद हो गए। इस खेल में लोगों को नौकरी तो मिलती नहीं इसलिए भी युवा कम ही इसे प्रोफेशन की तरह लेते हैं। नेशनल स्तर के कैरम खिलाड़ी सलमान बताते हैं कि उन्होंने कई जगहों पर कैरम खेला है और ट्राफी जीती है लेकिन दुख है कि उनका शौक उनका प्रोफेशन नहीं बन सका है। बाकी खेलों की तरह उन्हें कोई नौकरी नहीं दी गई। इन सबके बावजूद भी वे हर शाम कैरम खेलने आते हैं। वे बताते हैं कि उनके नाना भी कैरम खेला करते थे और वो भी क्लबों में जाया करते थे। क्लबों से कई नेशनल स्तर के खिलाड़ी निकल कर गए हैं। इन क्लबों में कुछ नामी गिरामी खिलाड़ी भी कैरम खेलने आते हैं। शाम को दुकानें और बाजार बंद होने के बाद लोग यहां कैरम खेलने पहुंचते हैं। आठ टेबलों में खेलने के लिए कई बार लोग लाइन में भी लगते हैं। दिन भर में करीब 70 लोग कैरम खलने आ जाते हैं। इस शौक का क्रेज थोड़ा कम जरूर हुआ है लेकिन चांदनी चौक, चावड़ी बाजार, जामा मस्जिद के पास कई क्लब आज भी चल रहे हैं जहां रोज शाम को कैरम की बाजी होती है।

शय मात देने की जुगत में रातें होती हैं बसर

लालकुआं के पीपल के पेड़ के नीचे पिछले साठ सालों से रोजाना शतरंज का खेल खेला जाता है। यहां खेलने वाले लोग शतरंज के खेल में इस कदर रम जाते हैं कि आधी रात गुजर जाने का पता ही नहीं चल पाता। साठ साल से चले आ रहा सिलसिला आज भी कायम है। फुरकान, मुस्ताक अली और उनके दोस्तों को वो दिन आज भी याद है जब 1984 में यहां लाल कुआं के पास कर्फयू लग गया था। लेकिन शतरंज खेलने वाले इस बात से बेखबर शतरंज की चाल चलने में मशरूफ थे। मुस्ताक अली बताते हैं कि शतरंज की चालों में सारी चिंताएं काफूर हो जाती है। आज के दौर मनोरंजन के कई माध्यम आ गए हैं लेकिन शतरंज की बाजी तो रोजाना यहां लगती है। इस खेल में जीत और हार का ज्यादा मतलब नहीं होता लेकिन एक दूसरे को हराने की ललक जरूर रहती है। अब पांच छह दोस्त रोजाना काम के बाद यहां जमा होते हैं और शतरंज खेलते हैं। वे बताते हैं कि जामा मस्जिद के पास शतरंज का क्लब भी हैं जहां लोग काम की थकान को मिटाने के लिए रोजाना जमा होते हैं।

जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर लगती है चौपड़ बाजी

चौपड़ खेल की आड़ में जुआं होने की वजह से अब यह खेल काफी कम हुआ है लेकिन अब भी कभी कभार लोग चौपड़ खेल लेते हैं। जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर चौपड़ खेलने वाले पुराने शौकीन मिल जाते हैं तो एक बाजी भी हो जाती है। जामा मस्जिद के नीचे मजार के साथ शतरंज क्लब अब भी है। मीना बाजार और जामा मस्जिद के सामने बनीं दुकानों के लोग अपने काम से फारिक हो कर यहां जमा होते हैं और खेल के बीच हल्के फुल्के किस्सों पर ठहाके भी लगा लिए जाते हैं।


परिंदे समझते हैं हमारी जुबां

इरफान मीर बताते हैं कि कबूतर बाजी का शौक अब दूसरे देशों में भी फरमा रहे हैं। पुरानी दिल्ली में तो यह शौक मुगलों के जमाने से चला आ रहा है। पहले यह शौक सिर्फ राजा महाराजाओं का हुआ करता था, अब आम लोग भी इससे जुड़ चुके हैं। पुरानी दिल्ली में लोग बड़े चाव से कबूतर पाल रहे हैं। दरअसल, इस शौक में लोगों का तनाव दूर हो जाता है। लोग इन कबूतरों की देख रेख में इस कदर रम जाते हैं कि दिन रात का इल्म तक नहीं रहता। इन कबूतरों को उड़ता और स्वस्थ्य देख मन को सुकून मिलता है। प्यार से इन कबूतरों का नाम भी रखा जाता है। इन्हें बुलाने के लिए और वापस आने तक की बातें कबूतर बखूबी समझते हैं। आओं, जाओं की भाषा के साथ सीटी की आवाज से कबूतर उड़ते हैं और वापस लौट कर आ जाते हैं। जनवरी में आगरा में कबूतरों की रेस भी होती है जिसे कुलकुले कहा जाता है। आगरा से छोड़े गए कबूतर दिल्ली तक पहुंच जाते हैं। इन्हें रास्ता का पता सूरज की रौशनी से हो जाता है। बरेली, बदाऊं, आगरा, पंजाब में कबूतर बाजी की बाजी लगती है। जनवरी में होने वाली प्रतियोगिता में कुछ इनाम भी रखा जाता है। कबूतर उड़ाने के दौर में कई कबूतर दूसरे के पास भी चले जाते हैं। दिल्ली में कनॉट प्लेस, जामा मस्जिद के पास कबूतर उड़ाने का खेल होता है। इस खेल में कई खलीफा होते हैं जो मास्टर के शार्गीद होते हैं। ये शौक अब दूसरे देशों में भी काफी लोकप्रिय है।

Spread the love

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here