कई घंटे में लाल किले से दरियागंज पहुंची मुगल शहजादे मिर्जा जवांबख्त की बारात

शाहज़ादे जवांबख्त की बरात 2 अप्रैल 1852 की एक गर्म रात को दो बजे लाल किले के लाहौरी दरवाज़े से बाहर निकली। किले की दीवार पर मौजूद तोप गोले दाग कर सलामी दी। इसी वक्त आतिशबाज़ी और पटाखों का एक दायरा किले के मीनारों को रौशन करता हुआ उभरा और फिज़ा में बिखर गया। इसके साथ ही चांदनी चौक के सामने वाले दोनों दरवाज़े खुल गए।

सबसे पहले चोबेदार सामने आए। जुलूस के सारे रास्ते दोनों तरफ लोगों को रोकने के लिए बांस की रुकावटें थीं जिसमें जगह-जगह लैंप रौशन थे जो जुलूस के रास्ते को उजागर कर रहे थे। दिल्ली के लोगों को इस हिसारबंदी के पीछे खड़ा होना बिल्कुल नापसंद था, लिहाज़ा उन चोबेदारों का काम तमाम तमाशाबीनों को दूर रखना था ताकि शाही हाथियों के लिए रास्ता साफ हो जाए जो आतिशबाज़ी से भड़ककर बेकाबू हो सकते थे।

जुलूस की शुरुआत दो घुड़सवार शाही अफ़सर कर रहे थे, जिनके घोड़ों की गर्दन के बालों में सीपियों के ज़ेवर पिरोये गए थे। उनके गले और टखनों में चांदनी की घंटियां बंधी हुई थीं। दोनों के दाएं-बाएं किले के ख़िदमतगार हाथ में पंखे लिए चल रहे थे। उनके पीछे मुगलिया प्यादा फौज का एक दस्ता था जो चमकती हुई काली ढालें लिए, एक हाथ में घुमावदार तलवार और लंबे-लंबे बरछे और दूसरे हाथ में अपना हरा और सुनहरी झंडा लहराते आहिस्ता-आहिस्ता मार्च कर रहे थे।

अब छह हाथी सामने आए जिनकी गर्दन पर भारी सुनहरी काम किया। हुआ ज़ाफ़रानी रंग का कपड़ा झूल रहा था जिस पर बादशाह का अलामती निशान सोने के तारों से कढ़ा था। हर हाथी के हौदे पर एक शाही अफसर हाथ में बादशाह के शाही खानदान का झंडा लिए थे। यह रिवायत पिछली तीन सदियों से चली आ रही थी जबसे मुग़ल हिंदुस्तान आए थे। पहले निशानी झंडे पर किरणों वाला सूरज बना था। दूसरे पर दो सुनहरी मछलियां जो एक सोने की कमान के दोनों सिरों पर लटक रही थीं। तीसरे पर एक शेर जैसे जानवर का सिर बना था और चौथे पर हज़रत फ़ातिमा का हाथ, यानी पंजतन का निशान था। पांचवें पर एक घोड़े का सिर और आखिरी झंडे पर सोने के तारों से कढ़ी शाही छतरी । यह सब सोने के थे और सोने के काम के झंडों पर लहरा रहे थे जिनसे रेशमी सिल्क की पतली-पतली पट्टियां झूल रही थीं।

उनके पीछे एक बड़ा जत्था किले के सेवकों का था जो वर्दी के लाल कोट पहने हाथ में ख़्वानपोश से ढकी थालियां लिए हुए थे जिसमें दुल्हन के खानदान के लिए तोहफे, फल, मेवे और मिठाइयां थीं। उनके फौरन बाद ढोल पीटता और हवा में बंदूकों से निशाना लगाता ऊंटसवारों का एक दस्ता बाहर आया जिसके ऊंट जेवरात से सज़े थे और फिर अंग्रेज़ सिपाहियों की एक रेजिमेंट जिसका नेतृत्व किले के गार्ड के कमांडिंग अफसर कैप्टन डगलस कर रह थे। यह सब सिर पर ऊंचे परों की टोपी और चुस्त ज़ाफ़रानी और नीला यूनिफार्म पहने बड़ी शान से मार्च कर रहे थे। उनके साथ दो हल्की तोपें भी शामिल थीं। फिर स्किनर के घुड़सवार, पीले कोट और चौरी लाल पेटी पहने और कवच और सिर पर मध्यकालीन से दिखते हेल्मेट लगाए, उनके पीछे कई सजी हुई बैलगाड़ियां बाहर आई जिन पर शहनाई और नक्कारे बजाने वाले और मंजीरे वाले बैठे थे। और आखिर में एक घोड़ों की बग्घी, जो नीलकंठ के रंग की थी और जिसमें कई शाहजादे सवार थे, जिनके ज़री से सजे लिबास आतिशबाज़ी की चमक में जगमगा रहे थे।

हर जत्थे के बाद मशालबरदार अपनी मशालें ऊंची उठाए रास्ता रौशन करते चल रहे थे। उनके साथ-साथ शीशे के विलोरों में जलती हुई शमएं उठाए कुछ लोग थे और साथ में कुछ भिश्ती जो मश्कों में पानी भरे सड़क पर छिड़काव करते चल रहे थे ताकि जलुस गुज़रने से उस गर्म शाम की धूल दब जाए।

बग्घी के पीछे नौजवान शहजादे घोड़ों पर सवार बाहर निकले। उनके बीचों-बीच दूल्हा का घोड़ा था। मिर्ज़ा जवांबख्त सिर्फ ग्यारह साल के थे। उस ज़माने में भी जब जल्द शादी कर देने का रिवाज था यह उम्र बहुत कम थी। दूल्हा के पीछे ही बादशाह का हाथी झूमता हुआ बाहर निकला। बादशाह सोने के हौदे में बैठे थे और भीषण गर्मी के बावजूद अपने पूरे शाही लिबास और ज़ेवरात में सजे थे। उनके पीछे उनका ख़ास खिदमतगार हाथ में मोरछल लिए खड़ा था। दरबार के बाकी लोग बादशाह के पीछे पैदल चल रहे थे। और इस तरह यह लंबा जुलूस छटा चौक और किले के बाज़ार से लेकर नक्कारखाना दरवाज़ा जहां ढोल रखे जाते थे, तक फैला था।’

इससे कुछ दिन पहले ही बादशाह और जवांबख़्त की एक तस्वीर आस्ट्रियन चित्रकार ऑगस्ट शोफ्ट ने बनाई थी। अपनी तस्वीर में उन्होंने ज़फ़र को एक गरिमापूर्ण, शांत और बहुत खूबसूरत बुजुर्ग दिखाया था, वक्र नाक और खूबसूरती से तराशी हुई दाढ़ी वाले लंबे कद और चौड़े शानों के बावजूद उनकी भूरी और लंबी पलकों से ढकी आंखों में एक गहरा अहसास और मेहरबानी नज़र आती है। अपनी जवानी की तस्वीरों में ज़फ़र काफी भद्दे और ढुलमुल, मोटे और परेशान पतली सी दाढ़ी वाले लड़के लगते हैं। लेकिन जैसे-जैसे उनकी उम्र बढ़ती गई वह ज़्यादा खूबसूरत होते गए और अब इस उम्र में वह और भी ज़्यादा शानदार हो गए। अब उनके गाल भूरे, नाक ज़्यादा उठी हुई और अंदाज़ बहुत शाहाना हो गया है, लेकिन इस बूढ़े बादशाह की जो अपनी तस्बीह के दानों को गिनते हुए बैठा है आंखों में एक अजीब हसरत और उदासी है। और उनके होंठों पर एक शांति और उदासी। शोफ्ट ने ज़फ़र को सुनहरी जर्क बर्फ कपड़े पहने और याकूत और मोतियों और जवाहिरात के जेवर पहने दिखाया है जिसकी माला का हर याकूत खून के रंग का और हर मोती तीतर के अंडों जितना बड़ा है। लेकिन वह इन सबके बोझ से दबे हुए लगते हैं। यह एक ऐसे शख्स का अक्स है जो अपनी जिम्मेदारियों के सुनहरी बोझ में कैद है।

इसके विपरीत उनका चहेता बेटा जवांबख्त मोतियों और जवाहिरात के हार पहने, जड़ाऊ खंजर और तलवार लगाए, अपने पिता की तरह शानदार लिबास में बहुत खुश नज़र आता है। ग्यारह बरस की उम्र के लिए वह बहुत गर्वीला और आत्मविश्वासी लगता है। उसको अपने पर उतना ही विश्वास है, जितना उसके पिता दुलमुल दिखाई देते हैं । ‘

एक व्यक्ति जो इस तस्वीर और बरात दोनों से गायब थीं, वह थीं जिनकी कोशिशों से यह शादी तय हुई थी। ज़फ़र की चहेती बेगम जीनत महल महीनों से इस दिन की तैयारी कर रही थीं। मुगलों के दस्तूर के मुताबिक औरतें बरात में शामिल नहीं होती थीं। चाहे वह मां हो या मलिका, लेकिन जुलूस की हर बारीकी उनकी तय की हुई थी। मिर्ज़ा जवांबख्त उनका इकलौता बेटा था और उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी ख़्वाहिश ज़फ़र के इस पंद्रहवें बेटे को ज़फ़र की मौत के बाद हिंदुस्तान के तख्त पर बैठा देखना थी ।

इस ठाठदार शादी की योजना जीनत महल ने मुगलिया सल्तनत में अपने बेटे की जगह मज़बूत करने के लिए बनाई थी। जवांबख्त की दुल्हन नवाब शाहजुमानी बेगम जो सिर्फ दस बरस की थीं ज़ीनत महल की भांजी थीं । उनके बाप, वलीदाद खां, जो मालागढ़ से थे, उनके ख़ास सलाहकार थे। हालांकि दूल्हा-दुल्हन इतने कमउम्र थे कि न वह साथ रह सकते थे और न ही दांपत्य संबंध बना सकते थे लेकिन सियासी चालों का तकाज़ा था कि शादी फौरन कर दी जाए, उनके बालिग होने का इंतज़ार किए बगैर ।

इसीलिए जीनत महल ने उस शादी का इंतज़ाम इतनी शानो-शौकत से किया था जो ज़फर के किसी और बेटे की शादी में या दिल्ली वालों की यादगार में भी कभी न देखा गया था। साठ साल के बाद भी एक नौजवान दरबारी ज़हीर देहलवी जिनका काम शाही मरातिब की देखभाल था, लिखते हैं कि आज तक मुझे उन खानों की ख़ुशबू और जायका याद है जो शाही बावर्चीखाने से किले के हर अफसर को भेजे गए थे। और वह शानदार मनोरंजन की महफिलें जो शादी से पहले किले में आयोजित की गई, कभी पहले नहीं देखी गई। ‘कम से कम मेरी जिंदगी में यह एक ऐसी शादी थी, जिसे मैं कभी नहीं भूल सकता।”

यह जश्न शादी से तीन दिन पहले से शुरू हुआ था। पहले दिन वलीदाद खान के घर से किले तक एक जुलूस शादी के तोहफे लेकर आया। दिल्ली गजट’ के अनुसार ‘इसमें सजे हुए हाथी, घोड़े, ऊंट और तरह-तरह की गाड़ियां शामिल थीं। सारे रास्ते आतिशबाज़ी छूटती रही।’ इसके बाद मेहंदी की रस्म हुई जिसमें दूल्हा, दुल्हन, सारे मेहमानों और किले की सब औरतों को मेहंदी लगाई गई। यह जश्न शादी के दिन के बाद सात रोज़ और जारी रहेगा।

ख़ास शादी के दिन, रतजगे और बरात के जुलूस की रवानगी से पहले जफर ने जवाबख्त को एक सच्चे मोतियों का सेहरा नज़र किया। किले में हर अफसर के लिए उनके रुत्वे के मुताबिक बादशाह की तरफ से दावत का इंतज़ाम था जिसमें खाने के अलावा हरेक के लिए नाच और गाने का भी इंतज़ाम था। किले के एक सहन में शहर के प्रतिष्ठित मेहमान आमंत्रित थे। दूसरे में किले के नौजवान और बच्चे, तीसरे में शाहजादे और चौथे में किले के आला अफसर।”

ज़फ़र के वित्तीय स्रोत उनके खर्च और उनकी मलिका की फिजूलखर्ची बहुत कम थे, इसलिए शादी से पहले का ज़्यादातर काम दिल्ली के साहूकारों से से कर्ज लेने का था। जो अपने अनुभव से जानते थे कि इस रकम की वापसी की कितनी उम्मीद है। जीनत महल क्रूरता के लिए बदनाम ख़्वाजासरा महबूब अली ख़ान की मदद से काफी कर्ज की रकम मुहैया करने में कामयाब हो गई।’ महल की मरम्मत, सफ़ेदी और सजावट का इंतज़ाम किया गया। झाड़-फानूस लगाए गए और मुल्क के कोने-कोने से आतिशबाज़ी बनाने वालों को बुलावा भेजा गया कि वह किले में आकर अपनी कला का प्रदर्शन करें।”

लाल किले की दीवारों से अभी फुलझड़ियां, अनार, हवाइयां और पटाखे छूट रहे थे। जब शादी का जुलूस आहिस्ता-आहिस्ता चांदनी चौक से होता हुआ जहां पेड़ और नहर रौशनियों से जगमगा रही थी, आगे बेगम समरू की हवेली से होता हुआ जो अब नई दिल्ली बैंक ने ले ली है–दरीबे से गुज़रा जहां दस हज़ार शम्में ज़मीन में गड़ी थीं, और बाई ओर मुड़ा और कूचा बुलाकी बेगम में तवायफों के झरोखों के नीचे से चलता हुआ बढ़ता गया।

सामने चांदनी में जगमगाती जामा मस्जिद के संगमरमर के गुंबद नज़र आ रहे थे। वहां से और आगे खास बाज़ार से गुज़रते हुए सुनहरी मस्जिद के खूबसूरत सुनहरी, रौशनी से सजे हुए गुंबद दिखाई दे रहे थे और फिर फैज़ बाज़ार से होता हुआ जुलूस दरियागंज पहुंच गया। यहां दिल्ली के सबसे बड़े अमीरों की कोठियां थीं। नवाब झज्जर की मशहूर कोठी, जो कलकत्ते के पादरी हीबर की राय में मॉस्को की हर इमारत से ज्यादा शानदार थी। इन्हीं इमारतों के बीच वलीदाद खां की हवेली भी मौजूद थी जो इस बरात की मंज़िल थी । “

किले की डायरी में दर्ज है कि जैसे-जैसे ‘बादशाह उन हवेलियों के आगे से गुज़रते और रोशनियों का मुआयना करते थे, उनके मालिक और बादशाह के अफसरान नज़र पेश करते जाते थे।” यह स्पष्ट रूप से वैभवपूर्ण सड़कें जहां से यह जुलूस गुज़रा था, ज्यादातर मुगलों की ही बनाई हुई थीं। 1852 में, डेढ़ सौ साल के पतन और सियासी करतबों के बावजूद भी दिल्ली हिंदुस्तान में उस जमाने का सबसे बड़ा शहर था। जो हाल ही में लखनऊ पर भी बाज़ी ले गया था। और दारुलमुल्क यानी मुग़लों की राजधानी होने की हैसियत से मुगलिया शान का नमूना था। मीर इसके बारे में लिखते हैं:

दिल्ली के न कूचे थे औराके मुसव्विर

जो शक्ल नज़र आई तस्वीर नज़र आई ?

और इसी तरह का ख्याल दिल्ली के किसी और लेखक ने भी ज़ाहिर किया है जिसने दिल्ली के बागों की नहरों को एक चमचमाती किताब के पन्नों के सजावटी हाशिये की उपमा देते हुए लिखा है कि उनका पानी पिघले पारे की तरह पत्थर के हर पन्ने पर असली चांदी का जादूल (हाशिया) बनाता है ।

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