-राज्यों के पुर्नगठन की पूरी कहानी

-भाषाई आधार पर राज्यों के पुर्नगठन के निर्णय के बाद राज्यों में प्रदर्शनों का शुरू हुआ सिलसिला

गृहमंत्री जीबी (govind ballabh pant) पन्त ने भाषाई आधार पर राज्यों का नक्शा बनाने का काम हा में लिया। पंडित जवाहर लाल नेहरू (Jawaharlal nehru) उन्हें इसीलिए दिल्ली लाए थे ताकि ये राज्य पुनर्गठन आयोग के सुझावों से जुड़े एक विधेयक पर काम करके उसे संसद के सामने रख सकें। आजादी से काफी पहले कांग्रेस (Congress) ने देश को यह वचन दिया था कि भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन किया जाएगा। नेहरू और पन्त का वश चलता तो वे इस वचन से पल्ला झाड़ लेते, क्योंकि यह मामला मधुमक्खियों के छत्ते को छेड़ने से कम न था। देश पहले ही इतनी सारी समस्याओं का सामना कर रहा था।

नेहरू, पन्त और कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष पट्टाभी सीतारमैया (Bhogaraju Pattabhi Sitaramayya) ने भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन का प्रश्न दस वर्ष के लिए आगे बढ़ाने का फैसला भी किया, ताकि बँटवारे के बाद माहौल में पैदा हुआ तनाव छँट जाए। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

नेहरू बार-बार भारत के नक्शे को बदलने की बात करके भाषायी दावों को खुद भी हवा देते रहे। मुझे याद आता है कि पोट्टी श्रीरामुलु नामक एक राजनीतिक कार्यकर्ता के आमरण अनशन ने सरकार को परेशानी में डाल दिया था। वे तत्कालीन मद्रास के तेलुगुभाषी के हिस्सों को मिलाकर एक अलग राज्य की स्थापना की माँग कर रहे थे। केन्द्र सरकार टाल-मटोल करती रही, लेकिन उनकी मौत से सरकार के हाथ-पाँव फूल गए। सरकार ने जल्दी से राज्य पुनर्गठन आयोग’ के गठन की घोषणा कर दी, जिसमें चेयरमैन फजल अली समेत के. एम. पणिकर और एच. एन. कुंजरू शामिल थे। हालाँकि तब आँध्र का गठन हुए कुछ ही समय

हुआ था। आयोग के गठन ने देश के विभिन्न हिस्सों में हो रहे आन्दोलनों को कुछ समय के लिए शान्त कर दिया। लेकिन, 1955 में आयोग की रिपोर्ट आते ही ये आन्दोलन फिर से शुरू हो गए। जिन्हें कुछ नहीं मिला था, उन्होंने विद्रोह का झंडा उठा लिया। ऐसा माना जा रहा या कि जो जितना ज्यादा शोर करेगा, उसकी मांग माने जाने की उतनी ही ज्यादा सम्भावना थी। स्थिति तब और भी बिगड़ गई जब नेहरू ने यह बयान दिया कि आयोग की सिफारिशों को माना जाना जरूरी नहीं था। पन्त उनके इस बयान से खुश नहीं थे, इसलिए नहीं कि वे खुद इन सिफारिशों के हिमायती थे, बल्कि इसलिए कि इस तरह के बयानों से भ्रांतियाँ पैदा होती थीं।

पन्त भी पटेल की तरह इतिहास में अपनी छाप छोड़ जाना चाहते थे, जिन्होंने लगभग 560 देशी रियासतों को भारत में मिलाने का करिश्मा कर दिखाया था। पन्त के घर पर हर रोज गृह मंत्रालय के अधिकारियों की बैठक होती थी, जिसमें आयोग की रिपोर्ट पर चर्चा की जाती थी। इन चर्चाओं में गृह मंत्रालय के संयुक्त सचिव हरि शर्मा की भूमिका काफी महत्त्वपूर्ण थी, क्योंकि वे आयोग के सचिव के रूप में काम कर चुके थे। इन बैठकों में में भी मौजूद रहता था। किसी भी रिपोर्ट को लेकर इतनी ज्यादा मगजपच्ची नहीं की गई जितनी कि आयोग की इस रिपोर्ट पर केबिनेट ने इस पर 14 बार चर्चा की। इसके अलावा संसदीय विशिष्ट समिति और संसद के दोनों सदनों में भी इस पर लम्बी चर्चाएं हुई।

फिर भी, आयोग की रिपोर्ट एक अनचाहे बच्चे की तरह सरकार को परेशानी में डाले हुए थी। पन्त पणिकर की भूमिका से खासतौर से नाखुश थे, जो उनके गृह प्रान्त यू.पी. के तिहरे बँटवारे की वकालत कर रहे थे। पणिकर का कहना था कि किसी भी राज्य को इतना बड़ा नहीं होना चाहिए कि उसे दूसरों से ज्यादा और अनुचित प्रभाव प्राप्त हो। यह बात पन्त को बहुत ज्यादा चुभ रही थी।

दरअसल इन दोनों के रिश्तों में शुरू से ही खटास रही थी। पणिकर के साम्यवादी झुकाव के कारण पन्त उन पर भरोसा नहीं करते थे। वे भारत के राजदूत के रूप में चीन में उनकी नियुक्ति से भी खुश नहीं थे। उनका मानना था कि जब चीन ने सिंकियांग को तिब्बत से जोड़नेवाली सड़क बनाने के लिए भारतीय जमीन का इस्तेमाल किया था तो पणिकर ने जान-बूझकर नेहरू को अंधेरे में रखा था।

पन्त ने पणिकर के प्रस्ताव को ‘शरारतपूर्ण’ बताते हुए उसे सिरे से खारिज कर दिया और उस पर चर्चा करवाने की जरूरत भी नहीं समझी। हरि शर्मा ने उन दिनों को याद करते हुए बताया था कि फजल अली और कुंजरू दोनों ने ही पणिकर से अपने प्रस्ताव पर जोर न देने के लिए कहा था। लेकिन पणिकर का कहना था कि देश के संघीय संविधान को देखते हुए यू. पी. का इतना बड़ा आकार ठीक नहीं था। एक बार उन्होंने यह भी कहा था कि “मैं नहीं चाहता कि देश पर हमेशा यू.पी. का राज रहे।”

25 वर्ष बाद, तत्कालीन गृहमंत्री चौधरी चरण सिंह ने पणिकर के प्रस्ताव का समर्थन करते हुए उत्तर प्रदेश के तिहरे बँटवारे का सुझाव दिया, हालाँकि वे खुद भी यू. पी. (पहले युनाइटिड प्रॉविंस और फिर उत्तर प्रदेश) के थे। लेकिन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई समेट अधिकांश केबिनेट मंत्रियों के साथ उनकी बिलकुल नहीं पटती थी। 25 वर्ष और बीत जाने के बाद तत्कालीन गृहमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी उत्तर प्रदेश को दो हिस्सों में बाँटने में मुफ्त रहे, जब राज्य के पहाड़ी इलाकों को मिलाकर उत्तराखंड के नाम से एक अलग राज्य बना दिया गया।

पन्त पंजाबी सूबे की माँग को लेकर अकालियों द्वारा फिर से आन्दोलन शुरू करने की धमकी से बहुत ज्यादा परेशान थे। आयोग ने इस माँग को यह कहकर ठुकरा दिया था कि इससे हिन्दुओं और सिखों में साम्प्रदायिक कटुता पैदा होगी। आयोग की रिपोर्ट ने देश को भाषाई झगड़ों में झोंक दिया था। पन्त नेहरू को ठहरा रहे थे, जो पोट्टी श्रीरामूल की मौत से डगमगा गए थे। नेहरू भी इस बात को स्वीकार कर रहे थे कि आयोग को नियुक्त करते समय उनके दिमाग पर यही घटना हावी थी। त्रि

भी, पन्त सार्वजनिक तौर पर कभी भी नेहरू-जिन्हें वे स्नेहपूर्वक ‘पंडितजी’ कहते थे, आलोचना नहीं करते थे।

कांग्रेस को यह उम्मीद नहीं थी कि यह समस्या इतना विकराल रूप धारण कर लेगी। ऐसा लगता था जैसे पूरा देश टूटने के कगार पर हो। बँटवारे के बाद भारत ने कभी-भी इतने बड़े संकट का सामना नहीं किया था। ऐसी परिस्थितियों में प्रसिद्ध वायलिन वादक मेनुहिन द्वारा लिखा गया एक पत्र नेहरू को हवा के एक ताजे झोंके की तरह महसूस हुआ होगा। इस पत्र की कुछ पंक्तियाँ थीं.

में भारत के बारे में सोचता हूँ तो मैं एक ऐसी खूबी की कल्पना करता हूँ जो पूरी तरह से एक भारतीय है। इसमें लोकथाओं और गार्डन ऑफ ईडन जैसी मासूमियत है। मेरे लिए भारत का मतलब उसके गाँव वहाँ के लोगों का भोलापन और एक तुभावनी सादगी भरा उनका जीवन में गांधी, बुद्ध और मन्दिरों के बारे में सोचता हूँ, जहाँ विनम्रता और धैर्य-शक्ति के साथ संकल्प और कर्मठता भी दिखाई देते हैं। भोलेपन के साथ-साथ विद्वता भी। और में बैलों और बन्दरों से लेकर चन्दन और आमों तक जीवन की प्रचुर समृद्धता के बारे में सोचता हूँ। मैं हिन्दुओं और उनकी परम्परा में अन्तर्निहित गरिमा और सहिष्णुता के बारे सोचता हूँ। सादगी के बावजूद जीवन के सभी सुखों और दुखों का जी भरकर और भरपूर रस लेने की क्षमता, और सीधेपन के बावजूद सृष्टि के परम रहस्यों की गहरी जानकारी इन गाँवों की अपनी अनोखी विशिष्टता है।

नेहरू और पन्त ने भाषाई राज्यों की बढ़ती माँग को देखते हुए इसके विरोध में एक आन्दोलन शुरू करने का फैसला किया। पन्त ने पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बी. सी. राय और बिहार के मुख्यमंत्री ए. एन. सिन्हा (अनुग्रह बाबु) से फोन पर बात की और उन्हें बिहार और पश्चिम बंगाल को मिलाकर एक बड़ा और द्विभाषी ‘पूर्व प्रदेश’ नामक राज्य बनाने का प्रस्ताव सामने लाने के लिए कहा। सिन्हा ने इस सम्बन्ध में राम को एक औपचारिक पत्र लिखा, जिस पर राय ने अपनी सहमति व्यक्त की। इसके बाद इस प्रस्ताव को प्रेस को जारी कर दिया गया। मुझे इस तरह का प्रचार करने के लिए कहा गया कि दोनों राज्यों के लोग एक भाषा की बजाय दो भाषाओं वाले राज्य की सम्भावना से बहुत उत्साहित थे। जैसाकि तय था, नेहरू ने इस प्रस्ताव को एक महान पहल’ बताते हुए इसकी सराहना

की। “पिछले कुछ हफ्तों से हम देश में काफी नादानियां देख चुके हैं। अब इन्हें छोड़कर दूसरी तरफ देखने का समय आ गया है,” उन्होंने कहा। बंगालियों और बिहारियों के एक ‘संयुक्त परिवार’ के विचार ने बहुतों का मन मोह लिया था। लोग राय का समर्थन करते. हुए कह रहे थे कि रोटी कपड़ा भाषा से अधिक महत्त्वपूर्ण है। लेकिन जब पश्चिम बंगाल की विधानसभा में पूरे विपक्ष ने इस मुद्दे पर सदन का बहिष्कार कर दिया, तो यह प्रस्ताव औंधे मुँह गिर पड़ा।

” सच्चाई यह थी कि अब बहुत देर हो चुकी थी। राज्यों के पुनर्गठन का तूफान इतना और पकड़ चुका था कि उसे अब रोकना मुश्किल था। घोड़े के छूट निकलने के बाद नेताओं को अस्तबल का फाटक बन्द करने की सूझी थी। भाषाई राज्यों के रूप में लोगों को अपनी एक विशिष्ट पहचान दिखाई दे रही थी। पन्त छोटे राज्यों की स्थापना के खिलाफ थे, जिनका विचार सीधे प्रजातंत्र के हिमायती जयप्रकाश नारायण ने व्यक्त किया था। फिर भी, पन्त ने केन्द्र-शासित हिमाचल प्रदेश को एक पूरे राज्य का दर्जा देने के फजल अली के सुझाव को स्वीकार कर लिया था। उनका खयाल था कि पंजाब के साथ उसके विलय को स्थानीय समर्थन नहीं मिल जाएगा।

महाराष्ट्र के पुनर्गठन को लेकर बहुत ज्यादा वहस हुई और इस सिलसिले में लम्बे आन्दोलन भी चले। पन्त विदर्भ के पक्ष में नहीं थे, लेकिन उन्होंने आयोग का यह सुझाव स्वीकार कर लिया कि बम्बई राज्य के मराठी-भाषी और गुजराती भाषी क्षेत्रों को साथ-साथ रहने देना चाहिए, ताकि एक उत्साही और एक व्यापारिक समुदाय साथ-साथ रहें-एक फुर्तीला तो दूसरा चतुर ।

लेकिन नेहरू एक दूसरी सम्भावना पर सोच-विचार कर रहे थे कि क्यों न मराठी-भाषी और गुजराती भाषी क्षेत्रों को अलग-अलग करके बम्बई सिटी को सीधे केन्द्र के अधीन ले आया जाए, जैसाकि दिल्ली के साथ था? बम्बई भारत का सबसे बड़ा वित्तीय केन्द्र था। नेहरू पर धन कुबेरों के प्रभाव में आने का आरोप लगाया गया तो नेहरू ने पलटकर कहा, “हम क्रान्ति की सन्तानें हैं, न कि धन-कुबेरों की।”

शायद यह अच्छा ही रहता कि बम्बई शहर को एक केन्द्र शासित प्रदेश का दर्जा दे दिया जाता। तो फिर इस शहर को बाल ठाकरे और उनके परिवार और उनकी शिवसेना का क्षेत्रवाद न झेलना पड़ता, जो गैर-मराठियों को महाराष्ट्र से बाहर निकालने की बात करते रहते हैं। शिवसेना ने न सिर्फ हमारे धर्म-निरपेक्ष मूल्यों को क्षति पहुँचाई है, बल्कि वह एक बहुमुखी समाज में भाषा और संस्कृति के नाम पर हिंसा भड़काने के लिए भी जिम्मेदार रही

नेहरू से बात करने के बाद पन्त ने केबिनेट के सामने यह प्रस्ताव रखा कि बम्बई राज्य को महाराष्ट्र, गुजरात और बम्बई सिटी के नाम से तीन राज्यों में बाँट दिया जाए। महाराष्ट्र से जुड़े तत्कालीन वित्त मंत्री सी. डी. देशमुख इस प्रस्ताव से सहमत थे। लेकिन जब नेहरू -ने बम्बई सिटी को केन्द्रीय प्रशासन के अधीन रखे जाने की घोषणा की तो देशमुख ने सरकार से इस्तीफा दे दिया।

अपने इस्तीफे का कारण बताते हुए देशमुख ने संसद में कहा कि केबिनेट में ऐसे मंत्री थे जिनके बेटे कॉर्पोरेट सेक्टर से हुड़े हुए थे। जब उन्हें कोई नाम बताने के लिए कहा गया तो देशमुख ने नेहरू के नाम एक पत्र लिखकर गोविन्द बल्लभ पन्त के इकलौते बेटे के. सी. पन्त का नाम लिया। यह बात पता चलते ही में सीधा पन्त के पर जा पहुंचा। व ? कुछ उच्च अधिकारियों के साथ कमरे में बन्द थे मुझे दरवाजे पर देखकर उन्होंने के सबको बाहर भेज दिया। उन्होंने बहुत दुख भरे स्वर में मुझसे कहा कि देशमुख अपने बेटे राजा (के.सी. पन्त) का नाम सुनने से पहले वे पर क्यों नहीं गए। मैं इस ढलती शाम में यह दिन न आता तो अच्छा था,” उन्होंने एक आह भरते अखबारों ने देशमुख के आरोप की खबर नहीं छापी। मुझे नहीं मालूम कि

इसका कारण यह था कि राजा गृहमंत्री के घर में रहते थे, जहाँ जर्मनी से लौटने से वे कंसल्टेंसी का काम कर रहे थे? नेहरू ने कानून मंत्री अशोक सेन के ससुर और न्यायालय के चीफ जस्टिस एस. आर. दास से इस मामले की जाँच करने के लिए राजा को निर्दोष पाया गया और पन्त ने राहत की सांस ली। बहुत बरस बाद, जब में 19 में भारत के हाई कमिश्नर के रूप में लन्दन में था तो में अशोक सेन के परिवार में मि उनके घर गया था। में अशोक सेन की पत्नी के मुँह से यह सुनकर दंग रह गया कि रा‍ को निर्दोष सिद्ध करवाने के लिए उन्हें अपने पिता की बहुत मिन्नतें करनी पड़ी थीं।

• बम्बई सिटी को केन्द्र के अधीन लाए जाने के फैसले के खिलाफ संयुक्त महाराष्ट्र समिति ने वृहत महाराष्ट्र का आन्दोलन छेड़ दिया। यह समिति संयुक्त महाराष्ट्र परिषद का ही नया रूप थी। इसने सभी मराठी-भाषी क्षेत्रों को महाराष्ट्र राज्य में शामिल करने के लिए संघर्ष करने की घोषणा की।

पश्चिम महाराष्ट्र के लोग स्थानीय कांग्रेस नेताओं के ढुलमुल रवैये से खीजकर दो गैर-कांग्रेसी नेताओं एस. एम. जोशी और एस. ए. डांगे की तरफ मुड़ने लगे थे। ये दोनों सत्याग्रह कर रहे थे। कभी-कभी जन आक्रोश काफी हिंसक रूप ले लेता। पन्त ने दो सर्वोदय नेताओं विनोबा भावे और जयप्रकाश नारायण से विभिन्न नेताओं से बात करके मामले को सुलझाने का अनुरोध किया। संयुक्त महाराष्ट्र समिति अपना लक्ष्य प्राप्त करने में सफल रही। मई 1960 को बम्बई के द्विभाषी राज्य को मराठी-भाषी महाराष्ट्र और गुजराती-भाषी गुजरात के रूप में दो अलग-अलग राज्यों में बाँट दिया गया।

राज्य पुनर्गठन आयोग को विशाल आंध्र की बजाय तेलंगाना बनाने का प्रस्ताव ज्यादा तर्कपूर्ण लग रहा था। इसमें कोई शक नहीं था कि विशाल आन्ध्र में तेलंगाना के बहुत सारे हिस्से पड़ रहे थे। इसलिए आयोग का खयाल था कि तेलंगाना बनाना प्रशासनिक दृष्टि से बेहतर रहेगा। उस समय इसका नाम ‘हैदराबाद स्टेट’ सोचा गया था। आयोग का खयाल था कि ‘वर्तमान स्थितियों में’ हैदराबाद स्टेट बनाते समय यह प्रावधान

रखना ठीक रहेगा कि 1961 के आम चुनावों के बाद इसे आन्ध्र में शामिल किया जा सकता है। इसके साथ यह शर्त जुड़ी हुई थी कि यह प्रस्ताव हैदराबाद स्टेट की विधान सभा में दो-तिहाई बहुमत से पास किया जाना जरूरी है।

लेकिन पन्त हैदराबाद स्टेट के पक्ष में नहीं थे। नेहरू भी इसके खिलाफ थे। वे मद्रास के बँटवारे के बाद पैदा हुई समस्याओं को और बढ़ाना नहीं चाहते थे, जब आन्ध्र को मद्रास से अलग करके नया राज्य बनाया गया था। गृह मंत्रालय में तेलंगाना के गठन को लेकर विचार-विमर्श शुरू हुआ। बहुमत तेलंगाना को एक अलग राज्य बनाए जाने के पक्ष में था, जैसाकि आयोग का भी सुझाव था। फिर भी, पन्त के दिलो-दिमाग पर पोट्टी श्रीरामुलु द्वारा खुद को आग लगाकर आत्मदाह करने की घटना हावी थी। नेहरू मी पन्त से सहमत थे। कि यह एक ऐसी चिन्गारी थी जिसे हवा देने से आन्ध्र प्रदेश के दूसरे हिस्सों में आग भड़क सकती थी।

राज्य पुनर्गठन आयोग का एक दुष्परिणाम असम के विभिन्न क्षेत्रों में व्याप्त निराशा की भावना थी। वहाँ पूरे छह क्षेत्र ऐसे थे जो केन्द्र-शासित प्रदेशों के रूप में अपना अलग अस्तित्व चाहते थे। अगर ऐतिहासिक दृष्टि से देखा जाए तो असम और उत्तर-पूर्वी पहाड़ी जिलों को प्रकृति ने विभिन्न जनजातियों और नस्लों का मिलन-स्थल बना रखा था, जहाँ भिन्न-भिन्न क्षेत्रों के लोग आकर बसते रहे थे। भाषाई आँकड़ों के अनुसार भी 1931 तक असमी वहाँ के बहुसंख्यक लोगों की भाषा नहीं थी।

असम के एक भूतपूर्व ब्रिटिश गवर्नर ने ब्रह्मपुत्र घाटी की तुलना एक बहुत चौड़े गलियारे या हॉल कमरे से की थी, जिसके दोनों तरफ छोटे-छोटे कमरों की शृंखलाएँ थीं। इन कमरों में दोनों तरफ खुलने वाले दरवाजे थे और दूसरा दरवाजा किसी पहाड़ी जिले की तरफ खुलता था। कमरों के बीच आपस में कोई रास्ता या दरवाजा नहीं था यानी कि एक पहाड़ी जिले से दूसरे पहाड़ी जिले में जाने के लिए गलियारे से गुजरना जरूरी था। आज भी इन छह पहाड़ी प्रदेशों में जाने के लिए गुवाहाटी होकर जाना पड़ता है। इन सभी प्रदेशों के नेताओं की महत्त्वाकांक्षाएँ केन्द्र के लिए एक चुनौती थीं।

पन्त की उलझन यह थी कि असम को एक रखते हुए भी पहाड़ी जिलों को स्वराज की भावना का अहसास कैसे कराया जाए। वे शिलांग के राजभवन में लगभग एक हफ्ते तक पड़ाव डाले रहे थे। नेहरू ने उनसे पहाड़ी राज्यों के दावों को नजरअन्दाज करने के लिए कहा था, क्योंकि इससे असम और उसकी जनजातियों के बीच दूरियाँ पैदा हो सकती थीं। इस पूरे मामले की सबसे महत्त्वपूर्ण कड़ी रेवरेंड माइकल निकोलस थे। मुख्यमंत्री बी. पी. चेलिया उन्हें नाराज कर बैठे थे, लेकिन पन्त के लिए माइकल निकोलस के मन में आदर की भावना थी। मेरा काम पन्त की दैनिक बैठकों के बारे में प्रेस रिलीज जारी करना था।

इसमें कोई शक नहीं था कि चेलिया और पहाड़ी नेताओं की बातचीत ठप्प पड़ चुकी थी। लेकिन पन्त में सबसे बड़ा गुण यह था कि वे कभी हाथ खड़े नहीं करते थे। उनमें अद्भुत धैर्य था। कई बार मुझे लगता था कि वे इसीलिए जीत जाते थे क्योंकि दूसरे धककर हार मान लेते थे। उन्होंने असम राज्य के भीतर ही इन प्रदेशों को स्वायत्तता देने का तरीका सोच लिया। वे इसे ‘स्कॉटिश नमूना’ कहते थे। पहाड़ी जिलों को विधानसभा की तरह एक परिषद और स्वास्थ्य और सड़कों जैसे विषयों पर खुद के नियंत्रण का प्रस्ताव दिया गया।

यह व्यवस्था ज्यादा देर नहीं चल पाई, क्योंकि इसमें सत्ता में भागदारी की भावना का अभाव था। पन्त द्वारा पहाड़ी जिलों को दिए गए आश्वासन कागजों पर ही घरे रह गए। उन्हें सबसे ज्यादा शिकायत असमी भाषा थोपे जाने को लेकर थी। हालाँकि यह भाषा किसी-न-किसी रूप में पूरे क्षेत्र में बोली जाती थी, फिर भी यह असमी क्षेत्रवाद की प्रतीक बन गई थी। यह बिलकुल साफ था कि अगर असम सरकार ने अपने तौर-तरीके नहीं बदले तो राज्य का बँटवारा निश्चित था। दूसरी तरफ, चेलिया लोकप्रियतावादी रवैया अपनाते हुए ये घोषणाएँ कर रहे थे कि जमीन की कीमत भाषा से नहीं चुकाई जा सकती। राज्य को इसका फल भी भुगतना पड़ा। असम का न सिर्फ बँटवारा हो गया, बल्कि पूर्वी पाकिस्तान से एक बड़ी आबादी के वहाँ आ बसने के कारण खुद असम में भी असमी-भाषी अल्पसंखाद्ध होकर रह गए।

इस गैर-कानूनी घुसपैठ को चेलिया से भी ज्यादा कांग्रेस में उनके वरिष्ठ नेता फखरुददीन अली अहमद ने शह दी थी, जो बाद में भारत के राष्ट्रपति भी बने। बल्कि पूरी पार्टी ही दोषी थी। सीमा पार से आ रहे ये गैर-कानूनी प्रवासी कांग्रेस को असम में चुनाव जीतने का एक आसान तरीका प्रतीत हो रहे थे।

पन्त को भी सरहद पार से लोगों के आने की जानकारी थी। आखिर उनकी पार्टी आजादी। के बाद से ही इसे बढ़ावा देती रही थी। लेकिन पन्त सही आँकड़े जानना चाहते थे। उन्होंने जनगणना आयुक्त अशोक मित्र को यह जिम्मेदारी सौंपी। मित्र ने असम और पश्चिम बंगाल में लघु जनगणना करके पता लगाया कि लगभग असम में 2,50,000 और पश्चिम बंगाल में 1,16,00 लोग गैर-कानूनी तरीके से घुसपैठ कर चुके थे।

पन्त ने उन्हें उसी गुपचुप तरीके से निकाल देने का फैसला किया जिस तरह वे आए थे। कुछ को निकाला भी गया। लेकिन पाकिस्तान में असम और पश्चिम बंगाल से मुसलमानों को निकाले जाने का विरोध होने लगा तो बात खुल गई। असम के कई मुस्लिम नेताओं ने इसका कड़ा विरोध किया। कुछ भारतीय मुसलमानों को निकाले जाने से मामला और भी बिगड़ गया था इसलिए इस प्रक्रिया को रोक देना पड़ा। नेहरू को भी कहना पड़ा कि “इस तरह की जल्दबाजी भरी कार्रवाई से बात बनने की बजाय बिगड़ सकती है।”

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